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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

अमेरिका-चीन तकनीक युद्ध

  • 22 Jul 2020
  • 10 min read

प्रीलिम्स के लिये

5G तकनीक, चीन की हुआवे कंपनी 

मेन्स के लिये

अमेरिका और चीन के तकनीक युद्ध का वैश्विक भू-राजनीति पर प्रभाव, इस संबंध में भारत की स्थिति

चर्चा में क्यों?

बीते कुछ वर्षों में उद्योग विकास और तकनीक के मुद्दे पर अमेरिका तथा चीन के मध्य तनाव में काफी तेज़ी से बढ़ोतरी हो रही है, बीते एक दशक में वैश्विक प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में दो दिग्गज देशों के बीच यह एक द्वंद्वयुद्ध के रूप में परिवर्तित होता दिखाई दे रहा है। 

प्रमुख बिंदु

  • उल्लेखनीय है कि इसी वर्ष मई माह में चीन की दिग्गज टेक्नोलॉजी कंपनी हुआवे (Huawei) द्वारा अमेरिकी प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किये जाने पर अंकुश लगाते हुए अमेरिका ने उस पर कई प्रतिबंध अधिरोपित किये थे। 
  • चीन के लिये यह कार्रवाई ऐसे समय में आई है, जब वैश्विक स्तर पर लगभग सभी देशों में 5G को शुरू करने की तैयारी की जा रही है, जिसमें सामान्यतः यह माना जा रहा है कि हुआवे 5G की इस इस प्रतियोगिता में सबसे आगे है।
  • गौरतलब है कि विश्व के अधिकांश देशों को व्यावहारिक तौर पर 5G शुरू करने के लिये चीन की तकनीक की आवश्यकता होगी।
  • किंतु चीन में 5G नेटवर्क अमेरिका से आए प्रमुख घटकों पर निर्भर करता है और चिपमेकिंग टूल के उपयोग पर नए अमेरिकी प्रतिबंध का अर्थ है कि हुआवे विशिष्ट प्रकार की चिप्स की आपूर्ति में कमी का सामना कर सकती है।

अमेरिका-चीन तकनीक युद्ध

  • अमेरिका में चीन की कंपनी हुआवे (Huawei) को लेकर सदैव से ही सुरक्षा संबंधी मुद्दे उठते रहे हैं। वर्ष 2011 में हुआवे कंपनी ने अमेरिकी सरकार को एक खुला पत्र प्रकाशित किया था, जिसमें कंपनी या उसके उपकरणों के बारे में उठाई गई सुरक्षा चिंताओं से स्पष्ट तौर पर इनकार करते हुए अपने कॉर्पोरेट संचालन में संपूर्ण जाँच का अनुरोध किया गया था।
  • इस संबंध में प्रतिक्रिया देते हुए अमेरिकी प्रशासन ने नवंबर 2011 में अमेरिका में व्यापार कर रही चीन की दूरसंचार कंपनियों के कारण उत्पन्न खतरों की जाँच शुरू की।
  • वर्ष 2012 में सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में संबंधित समिति ने उल्लेख किया था कि हुआवे और चीन की एक अन्य दूरसंचार कंपनी ज़ेडटीई (ZTE) को विदेशी राष्ट्र जैसे चीन आदि के प्रभाव से मुक्त नहीं माना जा सकता है और इस प्रकार ये कंपनियाँ संयुक्त राज्य अमेरिका के लिये एक सुरक्षा खतरा उत्पन्न करती हैं।
  • गौरतलब है अमेरिका के संघीय संचार आयोग (FCC) ने अमेरिका के सुरक्षा संबंधी हितों को ध्यान में रखते हुए चीन की कंपनी हुआवे और ज़ेडटीई (ZTE) के उपकरणों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था, साथ ही आयोग ने दोनों कंपनियों को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये खतरे के रूप में भी नामित किया था।
  • अधिकांश विशेषज्ञ अमेरिका और चीन के बीच इस तनाव को एक ‘तकनीकी शीत युद्ध’ के रूप में देख रहे हैं और उनका मानना है कि यह तकनीक युद्ध अमेरिका-चीन की परिधि से भी आगे जा सकता है और भारत समेत विभिन्न देशों के हितों को प्रभावित कर सकता है।
  • इसे प्रौद्योगिकी पर एक भू-राजनीतिक संघर्ष के रूप में वर्णित किया जा रहा है, जो कि संपूर्ण विश्व को मुख्यतः दो अलग-अलग तकनीकी क्षेत्रों में विभाजित कर सकता है।
  • अमेरिका ने हुआवे को इस आधार पर प्रतिबंधित किया है कि उसके द्वारा विकसित किये गए उपकरणों का प्रयोग जासूसी के उद्देश्य से किया जा रहा है।

Huawei

प्रौद्योगिकी हार्डवेयर बाज़ार में चीन का वर्चस्व 

  • प्रौद्योगिकी हार्डवेयर बाज़ार में चीन की यात्रा की शुरुआत टेक्नोलॉजी कंपनी हुआवे (Huawei) के साथ ही हुई थी, इस प्रकार प्रौद्योगिकी हार्डवेयर बाज़ार में चीन के वर्चस्व को समझने के लिये आवश्यक है कि चीन की टेक कंपनी हुआवे की विकास यात्रा को समझा जाए।
  • असल में हुआवे (Huawei) कंपनी की शुरुआत ही पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के एक पूर्व डिप्टी रेजिमेंटल चीफ द्वारा 1980 के दशक के अंत में की गई थी। 
  • हुआवे ने अपने कार्य की शुरुआत हॉन्गकॉन्ग से आयातित PBX स्विच (PBX Switches) के पुनर्विक्रेता के रूप में की थी।
  • कंपनी ने धीरे-धीरे अपने व्यापार का विस्तार किया और अपने उत्पादों और सेवाओं की बिक्री को 170 से अधिक देशों तक पहुँचा दिया।
    • वर्ष 2012 में चीन की कंपनी हुआवे (Huawei) ने विश्व की सबसे बड़े टेलीकॉम उपकरण निर्माता के रूप में एरिक्सन (Ericsson) को पीछे छोड़ दिया।
  • वहीं कंपनी ने वर्ष 2018 में विश्व के दूसरे सबसे बड़े स्मार्टफोन निर्माता के रूप में एप्पल (Apple) को पीछे छोड़ दिया।
  • आँकड़ों के अनुसार, बीते वर्ष 2019 में कंपनी का कुल वार्षिक राजस्व 122 बिलियन डॉलर था, वहीं कंपनी में लगभग 194,000 कर्मचारी कार्यरत थे।
  • इस प्रकार कंपनी के विकास के साथ प्रौद्योगिकी हार्डवेयर बाज़ार में चीन का वर्चस्व बढ़ता गया। वर्तमान में हुआवे कंपनी वैश्विक स्तर पर चीन के उदय का प्रतिक बनी हुई है।

चीन-अमेरिका तकनीक युद्ध में भारत की स्थिति

  • दिसंबर 2009 में दूरसंचार विभाग (DoT) ने चीन के उपकरणों पर लगे जासूसी के आरोप के बाद भारतीय मोबाइल निर्माता कंपनियों से स्पष्ट तौर पर कहा था कि चीन की उपकरण निर्माता कंपनियों के साथ सभी सौदों को निलंबित कर दिया जाए।
  • हालाँकि इसके बाद से भारत तठस्थ स्थिति में रहा है और भारत ने कभी भी अपने टेलीकॉम उपकरण उद्योग से चीनी कंपनियों को पूरी तरह से प्रतिबंधित नहीं किया है।
  • दरअसल, भारत की अधिकतर टेलीकॉम कंपनियों के विकास में चीन की कंपनियों ने हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर स्तर पर काफी समर्थन किया है।
  • हालाँकि लद्दाख में हुए गतिरोध के पश्चात् भारत ने राज्य के स्वामित्त्व वाले सभी दूरसंचार सेवा प्रदाताओं को अपने नेटवर्क अनुबंध के दायरे से चीनी कंपनियों को बाहर करने के लिये कहा था।
    • सरकार के इस निर्णय को भारतीय बाज़ार में चीन से आने वाली तकनीक और निवेश के वर्चस्व पर अंकुश लगाने के व्यापक निर्णय के हिस्से के रूप में देखा जा सकता है।
  • इसके अतिरिक्त हाल ही में भारत ने चीन कुल 59 एप्स पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। 
  • हालाँकि भारत ने अभी तक चीन की कंपनियों पर कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की है, क्योंकि विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके कारण भारतीय बाज़ार को भी काफी नुकसान पहुँच सकता है, किंतु भारत और चीन के बीच हो रहा सीमा संघर्ष तथा इस विषय में अमेरिका की कार्रवाई भारत को भी चीन के विरुद्ध कार्रवाई करने अथवा कोई बड़ा कदम उठाने के लिये मज़बूर कर सकता है। 

आगे की राह

  • इस संबंध में उपलब्ध डेटा के अनुसार, विश्व के कई देशों में चीन की दिग्गज टेक कंपनी हुआवे को या तो पूर्णतः प्रतिबंधित कर दिया है अथवा उसे कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में वर्जित कर दिया गया है, वहीं कुछ ऐसे देश भी हैं जिन्होंने चीन की कंपनी को लेकर गंभीर चिंताएँ व्यक्त की हैं।
  • ऐसे में आवश्यक है कि इन आरोपों की निष्पक्ष जाँच की जाए और इस जाँच के दौरान सभी हितधारकों को अपना प्रतिनिधित्त्व करने का अवसर दिया है।
  • जानकर मानते हैं कि चीन और अमेरिका के बीच चल रहे इस तकनीकी द्वंदयुद्ध से विश्व के कई अन्य देश भी प्रभावित हो सकते है, ऐसे में अमेरिका और चीन दोनों ही देशों को यह ध्यान रखना चाहिये कि उनके व्यक्तिगत हितों के टकराव में विश्व के छोटे और विकासशील देशों को समस्या का सामना न करना पड़े।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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