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स्वास्थ्य: समवर्ती सूची में स्थानांतरण

  • 31 Mar 2021
  • 10 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में 15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष एन.के. सिंह ने कहा कि स्वास्थ्य (Health) को संविधान के तहत समवर्ती सूची (Concurrent List) में स्थानांतरित किया जाना चाहिये। वर्तमान में 'स्वास्थ्य' राज्य सूची (State List) के अंतर्गत आता है।

  • एन.के. सिंह ने हेल्थकेयर में निवेश के लिये एक समर्पित विकास वित्त संस्थान (Development Financial Institute- DFI) हेतु भी काम किया है।

प्रमुख बिंदु

'स्वास्थ्य' को समवर्ती सूची में स्थानांतरित करने के पक्ष में तर्क:

  • केंद्र की ज़िम्मेदारी में वृद्धि: स्वास्थ्य को समवर्ती सूची में स्थानांतरित किये जाने से केंद्र को नियामक परिवर्तनों को लागू करने, बेहतर स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने और सभी पक्षों के दायित्वों को सुदृढ़ करने के लिये अधिक अवसर मिलेगा।
  • अधिनियमों का युक्तिकरण और सरल बनाना: स्वास्थ्य क्षेत्र में अनेक अधिनियमों, नियमों और विनियमों तथा तेज़ी से उभरने वाली संस्थानों की बहुलता है, फिर भी इस क्षेत्र का विनियमन उचित रूप से नहीं होता है।
    • स्वास्थ्य को समवर्ती सूची में स्थानांतरित करके कार्यप्रणाली में एकरूपता सुनिश्चित की जा सकती है।
  • केंद्र की विशेषज्ञता: केंद्र सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र में राज्यों की तुलना में तकनीकी रूप से बेहतर है क्योंकि इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रबंधन के लिये समर्पित अनेक शोध निकायों और विभागों की सहायता प्राप्त है।
    • दूसरी ओर राज्यों के पास व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों को स्वतंत्र रूप से डिज़ाइन करने की तकनीकी विशेषज्ञता नहीं है।

’स्वास्थ्य’ को समवर्ती सूची में स्थानांतरित करने के विपक्ष में तर्क:

  • स्वास्थ्य का अधिकार: सभी के लिये सुलभ, सस्ती और पर्याप्त स्वास्थ्य सेवा के प्रावधान की गारंटी देना न तो आवश्यक है तथा न ही पर्याप्त।
    • स्वास्थ्य का अधिकार पहले ही संविधान के अनुच्छेद 21 के माध्यम से प्रदान किया गया है जो जीवन और स्वतंत्रता की सुरक्षा की गारंटी देता है।
  • संघीय संरचना को चुनौती: राज्य सूची से केंद्र सूची में अधिक विषयों को स्थानांतरित करने से भारत की संघीय प्रकृति दुर्बल होगी।
    • न्यास सहकारी संघवाद: केंद्र को अपने अधिकारों का इस प्रकार से इस्तेमाल करना होगा, जिससे राज्यों को उनके संवैधानिक दायित्वों जैसे- सभी के लिये पर्याप्त, सुलभ और सस्ती स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करने में मदद मिल सके।
  • केंद्र पर अधिक ज़िम्मेदारी: केंद्र के पास पहले से ही अधिक ज़िम्मेदारियाँ हैं, जिनसे निपटने के लिये वह संघर्ष करता रहता है। अधिक ज़िम्मेदारियाँ लेने से न तो राज्यों को और न ही केंद्र को अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करने में मदद मिलेगी।
  • राज्यों को प्रोत्साहित करना: राज्य द्वारा एकत्रित किये जाने वाले करों का 41% हिस्सा केंद्र सरकार को जाता है। केंद्र द्वारा राज्यों को अपेक्षित ज़िम्मेदारियों के निर्वहन के लिये प्रोत्साहित किया जाना चाहिये, साथ ही केंद्र को भी स्वयं के संसाधन का उपयोग करके अपने दायित्व को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये।
    • स्वास्थ्य को राज्य सूची का विषय होने के बाद भी इस पर केंद्र के रचनात्मक सहयोग को राज्यों को अपनाना चाहिये।
    • नीति आयोग का स्वास्थ्य सूचकांक, बीमा आधारित कार्यक्रम (आयुष्मान भारत) के माध्यम से वित्तीय सहायता, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के लिये बेहतर विनियामक वातावरण और चिकित्सा शिक्षा ऐसे ही उदाहरण हैं जो राज्यों को सही दिशा में प्रेरित कर सकते हैं।

स्वास्थ्य देखभाल के लिये विकासात्मक वित्त संस्थान:

  • स्वास्थ्य क्षेत्र-विशिष्ट डीएफआई की ज़रूरत वैसे ही होती है जैसे अन्य क्षेत्रों (नाबार्ड, नेशनल हाउसिंग बैंक आदि) को होती है।
  • इस तरह के डीएफआई से टियर-2 और टियर-3 शहरों में स्वास्थ्य सुविधा की पहुँच बढ़ेगी तथा इससे धन के समुचित उपयोग सुनिश्चित करने वाली तकनीकी सहायता भी मिलेगी।

 एन.के. सिंह के अन्य सुझाव:

  • स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च को वर्ष 2025 तक जीडीपी के 2.5% तक बढ़ाना।
  • विशेष रूप से प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा सभी राज्यों की एक मौलिक प्रतिबद्धता होनी चाहिये और कम-से-कम दो-तिहाई धनराशि का आवंटन स्वास्थ्य क्षेत्र को किया जाना चाहिये।
  • केंद्र और राज्य दोनों के लिये स्वास्थ्य देखभाल कोड का मानकीकरण करना।
  • अखिल भारतीय चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवा का गठन।
    • इस सेवा का गठन चिकित्सा हेतु डॉक्टरों की उपलब्धता में राज्यवार अंतर को देखते हुए करना आवश्यक है, जैसा कि अखिल भारतीय सेवा अधिनियम, 1951 की धारा 2ए के तहत परिकल्पित है।
  • सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा बीमा के महत्त्व पर ज़ोर देना, क्योंकि समाज का एक बड़ा वर्ग अभी भी इसकी पहुँच से दूर है।

हेल्थ केयर बीमा के सार्वभौमीकरण की आवश्यकता:

  • मौजूदा बीमा कवरेज़ क्षेत्र: प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (Pradhan Mantri Jan Arogya Yojana) नीचे के दो आय पंचमक (Quintile) और वाणिज्यिक बीमा बड़े पैमाने पर शीर्ष के आय पंचमक को कवर करती है, जिससे बीच में एक अनुपस्थित मध्य वर्ग (Missing Middle) पैदा होता है।
  • अनुपस्थित मध्य वर्ग: यह वर्ग दो आय पंचमकों के बीच के लोगों को संदर्भित करता है, जहाँ वाणिज्यिक बीमा का खर्च उठाने वाली जनसंख्या और सरकार द्वारा प्रायोजित स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के तहत कवर किये जाने हेतु पर्याप्त गरीब जनसंख्या नहीं है।

समवर्ती सूची

  • भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में तीन सूचियाँ यथा- संघ सूची, राज्य सूची एवं समवर्ती सूची दी गई हैं।
  • उल्लेखनीय है कि संसद तथा राज्य विधानसभा दोनों ही समवर्ती सूची में शामिल विषयों पर कानून बना सकते हैं।
  •  इस सूची में मुख्यतः ऐसे विषय शामिल किये गए हैं जिन पर पूरे देश में कानून की एकरूपता वांछनीय है लेकिन यह आवश्यक नहीं है।
  • हालाँकि राज्य के कानून को केंद्रीय कानून का विरोधी नहीं होना चाहिये। कई बार संबंधित विषय पर केंद्रीय कानून की मौजूदगी इस पर राज्य की कानून बनाने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है।
  • समवर्ती सूची में स्टाम्प ड्यूटी, ड्रग्स एवं ज़हर, बिजली, समाचार पत्र, आपराधिक कानून, श्रम कल्याण जैसे कुल 52 विषय (मूल रूप से 47 विषय) शामिल हैं।
  • ध्यातव्य है कि वर्ष 1976 के 42वें संशोधन के माध्यम से राज्य सूची के पाँच विषयों को समवर्ती सूची में स्थानांतरित किया गया था। इन पाँच विषयों में शामिल हैं- (1) शिक्षा (2) वन्यजीवों एवं पक्षियों का संरक्षण (3) वन (4) नाप-तौल (5) न्याय प्रशासन।

विकास वित्त संस्थान

  • ये विकासशील देशों में विकास परियोजनाओं को वित्त प्रदान करने के लिये विशेष रूप से स्थापित संस्थान हैं।
  • ये बैंक आमतौर पर राष्ट्रीय सरकारों के स्वामित्व वाले होते हैं।
  • इन बैंकों की पूंजी का स्रोत राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय विकास निधि है।
  • यह विभिन्न विकास परियोजनाओं को प्रतिस्पर्द्धी दर पर वित्त प्रदान करने की क्षमता रखता है।

स्रोत: द हिंदू

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