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भारत में गंभीर तीव्र कुपोषण

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  • 31 Jul 2021
  • 12 min read

प्रिलिम्स के लिये:

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण, WHO, सतत् विकास लक्ष्य, कुपोषण को दूर करने हेतु सरकारी योजनाएँ

मेन्स के लिये:

भारत में गंभीर तीव्र कुपोषण की स्थिति, कुपोषण को दूर करने हेतु सरकार के प्रयास

चर्चा में क्यों?

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अनुसार, नवंबर 2020 तक भारत में 9.2 लाख से अधिक बच्चे (छह महीने से छह साल तक के) 'गंभीर रूप से कुपोषित' थे।

  • यह इस चिंता को रेखांकित करता है कि कोविड-19 महामारी गरीबों में भी सबसे गरीब लोगों के बीच स्वास्थ्य और पोषण संकट को बढ़ा सकती है।

प्रमुख बिंदु 

गंभीर तीव्र कुपोषण (SAM) :

  • WHO की परिभाषा: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ऊँचाई की तुलना में बहुत कम वज़न या 115 मिमी. से कम मध्य-ऊपरी बांह की परिधि या पोषण संबंधी एडिमा की उपस्थिति को 'गंभीर तीव्र कुपोषण' (SAM) के रूप में परिभाषित करता है।
  • SAM से पीड़ित बच्चों की कमज़ोर प्रतिरक्षा प्रणाली के कारण उनकी मृत्यु की संभावना बीमारियों की तुलना में नौ गुना अधिक होती है।
  • पोषण संबंधी एडिमा: भुखमरी या कुपोषण की स्थिति में प्रोटीन की कमी के परिणामस्वरूप ऊतकों में असामान्य द्रव की वृद्धि (स्फाय- Oedema ) हो जाती है।
  • भले ही एल्ब्यूमिन का रक्त स्तर कम न हो लेकिन भुखमरी के परिणामस्वरूप एडिमा की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

संबंधित निष्कर्ष:

  • SAM से पीड़ित बच्चों की संख्या (राष्ट्रीय परिदृश्य): नवंबर 2020 तक देश भर में छह महीने से छह साल तक के अनुमानित 9,27,606 'गंभीर रूप से कुपोषित' बच्चों की पहचान की गई।
  • SAM बच्चों की संख्या से संबंधित राज्य:
    • SAM से प्रभावित बच्चों की संख्या उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक (3,98,359) और उसके बाद बिहार (2,79,427) में है।
    • देश में सबसे ज़्यादा बच्चे उत्तर प्रदेश और बिहार में ही हैं।
    • महाराष्ट्र (70,665) > गुजरात (45,749) > छत्तीसगढ़ (37,249) > ओडिशा (15,595) > तमिलनाडु (12,489) > झारखंड (12,059) > आंध्र प्रदेश (11,201) > तेलंगाना (9,045) > असम (7,218) > कर्नाटक (6,899) > केरल (6,188) > राजस्थान (5,732)।
  • वे राज्य जहाँ गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों की संख्या नगण्य है: लद्दाख, लक्षद्वीप, नगालैंड, मणिपुर और मध्य प्रदेश में गंभीर रूप से कुपोषित बच्चे नहीं हैं।
  • राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण निष्कर्ष:
    • राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 (एनएफएचएस-4) 2015-16 से पता चलता है कि बच्चों में गंभीर तीव्र कुपोषण की प्रसार दर 7.4% थी।
    • एनएफएचएस-5 से पता चलता है कि वर्ष 2015-16 की तुलना में वर्ष 2019-20 में 22 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में बच्चों में कुपोषण बढ़ा है।
    • स्टंटिंग: सर्वेक्षण में शामिल 22 में से लगभग 13 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने वर्ष 2015-16 की तुलना में 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के स्टंटिंग प्रतिशत में वृद्धि दर्ज की है।
      • स्टंटिंग स्थिति तब होती है जब किसी बच्चे की लंबाई उसकी उम्र के हिसाब से कम होती है, आमतौर पर बच्चों में कुपोषण बार-बार होने वाले संक्रमण के कारण होता है।

चाइल्ड वेस्टिंग:

  • इस श्रेणी के अंतर्गत 5 वर्ष से कम उम्र के वे बच्चे आते हैं जिनका वज़न उनकी लंबाई के अनुपात में कम होता है।
  • भारत में हमेशा चाइल्ड वेस्टिंग का उच्च स्तर रहा है।
    • चाइल्ड वेस्टिंग में कमी किये जाने के बजाय इसमें तेलंगाना, केरल, बिहार, असम और जम्मू-कश्मीर में वृद्धि देखी गई है तथा महाराष्ट्र तथा पश्चिम बंगाल में स्थिरता की स्थिति है।
      • वर्ष 2019-20 में पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में वेस्टिंग के प्रतिशत में वृद्धि दर्ज की गई।
      • वेस्टिंग बच्चों में उनकी लंबाई के अनुपात में कम वजन होना है जो तीव्र अल्पपोषण को दर्शाता है। यह पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में मृत्यु दर को बढ़ावा देता है।
      • गंभीर वेस्टिंग तथा अल्पवज़नी बच्चों की संख्या: वर्ष 2019-20 में 16 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने 5 साल से कम उम्र के वेस्टिंग तथा अल्पवज़नी बच्चों की संख्या के मामले में वृद्धि दर्ज की।
  • कोविड-19 का प्रभाव:
    • कोविड-19 महामारी ने लाखों लोगों को गरीबी में धकेल दिया है और इससे भी कहीं अधिक लोगों की आय पर प्रभाव पड़ा है, साथ ही महामारी के कारण आर्थिक रूप से वंचित लोगों की आजीविका पर भी गंभीर प्रभाव देखने को मिला है, जो कुपोषण और खाद्य असुरक्षा की दृष्टि से काफी संवेदनशील है।
    • महामारी के कारण लागू किये गए लॉकडाउन ने आवश्यक सेवाओं जैसे- आँगनवाड़ी केंद्रों के तहत पूरक आहार, मध्याह्न भोजन, टीकाकरण और सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की पूरकता आदि को बाधित किया है। 

सरकार द्वारा उठाए गए कदम

  • पोषण अभियान: भारत सरकार ने वर्ष 2022 तक ‘कुपोषण मुक्त भारत’ सुनिश्चित करने के लिये राष्ट्रीय पोषण मिशन (NNM) या पोषण अभियान शुरू किया है।
  • एनीमिया मुक्त भारत अभियान: वर्ष 2018 में शुरू किये गए इस मिशन का उद्देश्य एनीमिया की वार्षिक दर को एक से तीन प्रतिशत तक कम करना है।
  • ‘मिड-डे मील’ योजना: इसका उद्देश्य स्कूली बच्चों के पोषण स्तर में सुधार करना है, जिससे स्कूलों में नामांकन, प्रतिधारण और उपस्थिति पर प्रत्यक्ष एवं सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013: इसका उद्देश्य संबद्ध योजनाओं और कार्यक्रमों के माध्यम से समाज के सबसे संवेदनशील लोगों के लिये खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करना है, ताकि भोजन तक पहुँच को कानूनी अधिकार बनाया जा सके।
  • प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (PMMVY): गर्भवती महिलाओं को बेहतर सुविधाएँ प्रदान करने हेतु 6,000 रुपए प्रत्यक्ष रूप से उनके बैंक खातों में स्थानांतरित किये जाते हैं।
  • एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) योजना: इसे वर्ष 1975 में शुरू किया गया था और इस योजना का उद्देश्य 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों तथा उनकी माताओं को भोजन, पूर्व-स्कूली शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, टीकाकरण, स्वास्थ्य जाँच एवं रेफरल सेवाएँ प्रदान करना है।

नोट: सतत् विकास लक्ष्य (SDG-2: ज़ीरो हंगर) के तहत वर्ष 2030 तक सभी प्रकार की भूख और कुपोषण को समाप्त करना है तथा यह सुनिश्चित करना है कि सभी लोगों, विशेषकर बच्चों को पूरे वर्ष पर्याप्त और पौष्टिक भोजन मिले।

आगे की राह

  • घर तथा सुविधा आधारित देखभाल: कोविड-19 महामारी खाद्य विविधता को संकुचित करने के साथ ही कम खाद्यान्न तथा कई बार भोजन को स्किप करने जैसे विभिन्न कारण कुपोषण की स्थिति को अधिक गंभीर बना सकते हैं। इसका समाधान घर-आधारित और सुविधा-आधारित दोनों तरह की देखभाल हो सकता है।
  • समन्वय स्थापित करना: गंभीर तीव्र कुपोषण का भोजन की उपलब्धता, उपयोग और जागरूकता से सीधा संबंध है। ऐसे में इसे दूर करने अथवा कम करने के लिये एक तात्कालिक कदम यह हो सकता है कि सरकारी प्रणालियों के साथ उचित समन्वय स्थापित किया जाए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि परिवारों को न केवल राशन/भोजन बल्कि आवश्यक शिक्षा और सहायता भी मिले।
  • पोषण पुनर्वास केंद्रों (NRCs) को सुदृढ़ बनाना: गंभीर तीव्र कुपोषण (SAM) की समस्या से निपटने हेतु बनाए गए पोषण पुनर्वास केंद्रों (Nutrition Rehabilitation Centres- NRCs) को मज़बूत किये जाने की आवश्यकता है।
    • विभिन्न अध्ययन इस बात का संकेत देते हैं कि NRCs बहुत अधिक प्रभावी नहीं रहे हैं।
    • कई मामलों में यह देखा गया है कि SAM के मामलों को NRCs से जल्दी छुट्टी दे दी गई क्योंकि या तो केंद्र एक ही मामले की लगातार देखभाल नहीं कर सकता है या देखभाल करने वाले व्यक्ति सुविधा केंद्र पर अधिक समय तक नहीं रह सकते हैं या उच्चाधिकारियों द्वारा पर्याप्त पर्यवेक्षण नहीं किया जाता है।
  • अनुकूलित मेन्यू तैयार करना: SAM मामलों के लिये विशेषज्ञों के परामर्श से अनुकूलित मेन्यू और दिशा-निर्देश तैयार करने की आवश्यकता है।
  • SAM मामलों का पृथक्करण: प्रशासनिक और परिचालन सुविधा के साथ-साथ बेहतर जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिये SAM से जुड़े मामलों को छोटी इकाइयों में विभाजित किया जा सकता है।
    • ज़िला/ब्लॉक स्तर के स्वास्थ्य कर्मचारियों के समग्र मार्गदर्शन में छोटी इकाइयों के प्रबंधन/समन्वय और निगरानी की ज़िम्मेदारी मेडिकल कॉलेजों, स्थानीय गैर-सरकारी संगठनों, महिला समूहों जैसी स्वतंत्र संस्थाओं को सौंपी जा सकती है।
  • आँगनबाड़ी केंद्रों की भूमिका: SAM से ग्रसित बच्चों की पहचान देश भर के 10 लाख से अधिक आँगनवाड़ी केंद्रों द्वारा की गई है।
    • आँगनवाड़ियों को पहले की तुलना में अधिक कार्यात्मक बनाए जाने की आवश्यकता है और यदि लॉकडाउन के कारण बच्चे आँगनबाड़ी केंद्रों तक नहीं पहुँच पा रहे हैं तो आँगनवाड़ियों को बच्चों तक पहुँचने की आवश्यकता है।

स्रोत: द हिंदू

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