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कुपोषण, COVID-19 और पोषण माह

  • 11 Dec 2020
  • 12 min read

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में कुपोषण, COVID-19 और पोषण माह के बीच संबंध और कुपोषण से निपटने हेतु सरकार के प्रयासों व इससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ: 

हाल ही में केंद्र सरकार की एक महत्त्वपूर्ण योजना ‘पोषण अभियान’ ने अपनी स्थापना के 1000 दिन पूरे कर लिये हैं। पोषण अभियान भारत में कुपोषण से निपटने के लिये एक समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।  

इस कार्यक्रम के तहत सरकार ने आवश्यक पोषक खाद्य पदार्थों की आपूर्ति व्यवस्था को मज़बूत किया है ताकि अधिक-से-अधिक बच्चों को इसका लाभ प्राप्त हो और वे अपने जीवन में उपयुक्त विकास के साथ स्वस्थ और समृद्ध भविष्य की शुरुआत कर सकें। हालाँकि भारत ने कुपोषण को दूर करने के लिये सकारात्मक प्रयास किये हैं, परंतु यह समस्या अभी भी सबसे गंभीर चुनौती बनी हुई है, जो एक युवा भारत के वादे को मूलभूत स्तर पर अवरुद्ध करता है। इसके अतिरिक्त COVID-19 महामारी ने भारत द्वारा हाल के वर्षों में कुपोषण से निपटने की दिशा की गई प्रगति के लिये भी खतरा उत्पन्न किया है।    

अतः वर्तमान में यह बहुत आवश्यक हो गया है कि कुपोषण की चुनौती से निपटने की प्रतिबद्धता को नवीनीकृत किया जाए।    

भारत में कुपोषण: 

  • कुपोषण (Malnutrition) किसी व्यक्ति द्वारा ऊर्जा और/या पोषक तत्त्वों के सेवन में कमी, अधिकता या इसके असंतुलन को दर्शाता है।  
  • भारत में कुपोषण की गंभीर समस्या को इसी बात से समझा जा सकता है कि इससे निपटना सरकार के लिये राष्ट्रीय प्राथमिकता का विषय है।
  • यूनिसेफ द्वारा संचालित व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण के आँकड़ों के अनुसार, देश में 5 वर्ष की आयु के लगभग आधे बच्चे नाटेपन या दुबलेपन से पीड़ित पाए गए थे।
  • वर्ष 2019 में लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, भारत में पाँच वर्ष से कम आयु के 1.04 मिलियन बच्चों की मृत्यु में 68% के लिये कुपोषण को उत्तरदायी बताया गया था।
  •  ‘खाद्य एवं पोषण सुरक्षा विश्लेषण, भारत 2019’ (Food and Nutrition Security Analysis, India, 2019) रिपोर्ट में भारत में गरीबी और कुपोषण के पीढ़ीगत प्रसार पर प्रकाश डाला गया है।
    • रिपोर्ट में गरीबी और कुपोषण के दुष्चक्र में फँसे समाज के सबसे गरीब तबके को दिखाया गया है जो कई पीढ़ियों के बाद भी इस समस्या से बाहर नहीं निकल पाया है।

गरीबी और कुपोषण का दुष्चक्र:

  • भूख, एनीमिया और कुपोषण से पीड़ित गर्भवती महिलाएँ ऐसे बच्चों को जन्म देती हैं जो नाटेपन, कम वज़न जैसी समस्याओं से पीड़ित होते हैं या वे मानवीय क्षमता के अनुरूप विकास नहीं कर पाते।
  • बाल्यावस्था के वर्षों में पोषक तत्त्वों की कमी बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास को प्रभावित कर सकती है, साथ ही यह उन्हें जीवन भर समाज के हाशिये पर रहने के लिये विवश कर सकती है।
  • आवश्यक पोषक तत्त्वों के बगैर बच्चों का दिमाग पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाता है, इस कारण कुपोषण से प्रभावित बच्चे आगे चलकर जीवन में अपनी पूर्ण क्षमता के अनुरूप सफलता प्राप्त नहीं कर पाते।        
  • ऐसे वंचित बच्चे पढ़ाई में खराब प्रदर्शन करते हैं और भविष्य में इनकी आय भी कम होती है। अधिकांशतः ऐसे लोग आगे चलकर अपने बच्चों को उचित देखभाल की सुविधा उपलब्ध नहीं करा पाते हैं और  गरीबी तथा कुपोषण का यह पीढ़ीगत संचरण जारी रहता है।

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कुपोषण की चुनौती और COVID-19:

  • COVID-19 महामारी ने लाखों लोगों को गरीबी की स्थिति में धकेल दिया है, इसके साथ ही इसने एक बड़ी आबादी की आय में भारी कमी की है। यह महामारी आर्थिक रूप से भी वंचितों को बुरी तरह प्रभावित कर रही है, जो कि कुपोषण तथा खाद्य असुरक्षा के लिये सबसे अधिक सुभेद्य हैं।
  • इसके अलावा महामारी-प्रेरित लॉकडाउन ने आवश्यक सेवाओं (जैसे कि आँगनबाड़ी केंद्रों के तहत पूरक आहार, मध्याह्न भोजन, टीकाकरण और सूक्ष्म पोषक अनुपूरण आदि) की आपूर्ति को बाधित किया है, जो कुपोषण के मामलों में व्यापक वृद्धि का कारण बन सकता है।   

आगे की राह: 

  • शिशु एवं छोटे बच्चों के आहार (Infant and Young Child Feeding- IYCF) की प्रथाओं को बढ़ावा देना : गर्भाधान से लेकर शिशु के 2 वर्ष पूरे होने तक के पहले 1000 दिन एक व्यक्ति के जीवन में पोषण हस्तक्षेप के लिये सबसे महत्वपूर्ण अवधि को चिह्नित करते हैं।
  • अतः पहले 1000 दिनों में प्राप्त पोषण का बच्चे के शारीरिक स्वास्थ्य, संज्ञानात्मक विकास, शैक्षणिक और बौद्धिक प्रदर्शन पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ेगा।   

पहले 1000 दिन: 

  • पहले 1000 दिनों की शुरुआत गर्भ के एकल कोशिका के रूप में गर्भाधान से होती है  और यह भ्रूण अवस्था तथा प्रसवोत्तर अवधि, जिसमें बाल्यावस्था एवं शैशवावस्था शामिल है, के दौरान एक तीव्र, जटिल और नाटकीय विकास और विभेदन की प्रक्रिया के तहत जारी रहता है।

शिशु एवं छोटे बच्चों का आहार

(Infant and Young Child Feeding- IYCF): 

  • जन्म के पहले एक घंटे में स्तनपान की शुरुआत: माँ का पीला दूध बच्चे के पोषण और उसे अनेक संक्रमणों से बचाने के लिये बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है।
  • जीवन के पहले 6 माह तक अनन्य स्तनपान: यह भावनात्मक संबंध और रोगों से सुरक्षात्मक प्रतिरक्षा के अलावा वृद्धि और विकास के लिये महत्त्वपूर्ण है। 
  • 6 माह की आयु में समय पर पूरक आहार की शुरुआत:  जन्म से 6 माह की अवधि (जब अधिकांश शिशुओं को पूरक आहार शुरू करने के लिये आवश्यक कौशल प्राप्त हो जाता है) के बाद दूध के अलावा धीरे-धीरे ठोस भोजन देने की शुरुआत करना।
  • 6 माह से 2 वर्ष तक के बच्चों के लिये आयु-उपयुक्त खाद्य पदार्थ: इस दौरान खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता, मात्रा और आवृत्ति के साथ स्वच्छता, विशेष रूप से हाथ धोने का अभ्यास आदि भी महत्त्वपूर्ण कारक हैं।
  • शैशवावस्था के बाद शिशु खाद्य पदार्थों के चयन में स्वायत्तता की कवायद शुरू करते हैं। उनकी स्वायत्तता का सम्मान करने और खाने के व्यवहार को प्रोत्साहित करने के लिये पौष्टिक खाद्य पदार्थों की व्यापक व्यवस्था की जानी चाहिये।
  • पोषण अभियान का अनुकरण: प्रधानमंत्री के नेतृत्त्व में सरकार द्वारा शुरू किये गए पोषण अभियान ने कुपोषण की चुनौती से निपटने के प्रयासों को मज़बूती प्रदान की है।
    • इस उदाहरण से सीख लेते हुए राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री के अतिरिक्त राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री, ज़िला स्तर पर डीएम और गाँव स्तर पर पंचायत के माध्यम से पोषण और खाद्य सुरक्षा से जुड़े नेतृत्त्व को मज़बूत किया जाना चाहिये।
  • समग्र विकास सुनिश्चित करना: नीति, दूरदर्शिता और रणनीतियों के संदर्भ में  भारत के पास पहले से ही विश्व की कुछ सबसे बड़ी सार्वजनिक बाल विकास परियोजनाएँ हैं जैसे- एकीकृत बाल विकास योजना, मध्याह्न भोजन कार्यक्रम और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) आदि।
  • बहु हितधारक दृष्टिकोण: वर्तमान में सभी हितधारकों द्वारा पोषण-विशिष्ट और संवेदनशील क्षेत्रों पर एक रणनीतिक, समायोजित कार्य योजना विकसित करने की आवश्यकता है।
    • इसके अलावा पोषण संबंधी योजनाओं के लिये अपनी वित्तीय प्रतिबद्धताओं को बनाए रखने के साथ कमज़ोर समुदायों, विशेष रूप से  झुग्गियों में रहने वाली महिलाओं तथा बच्चों, प्रवासियों, जनजातीय क्षेत्रों की आबादी और उच्च कुपोषण दर वाले ज़िलों में पोषण सुरक्षा के लिये अतिरिक्त धनराशि जारी किये जाने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष: 

किसी भी बड़ी आबादी में पोषण संबंधी हस्तक्षेपों का प्रभाव दिखाई देने में काफी समय लगता है, परंतु एक बार प्रभावी होने पर ये प्रयास व्यापक पीढ़ीगत बदलाव ला सकते हैं। देश में पोषण की पहुँच में व्याप्त बाधाओं को दूर कर समाज के सभी वर्गों के बच्चों को प्रतिस्पर्द्धा का समान अवसर उपलब्ध कराने के साथ देश के विकास के लिये एक मज़बूत आधार प्रदान किया जा सकेगा। 

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अभ्यास प्रश्न: 21वीं सदी के लिये वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और अन्य कई क्षेत्रों में निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने में भारत कितना आगे जा पाता है, यह देश के बच्चों में शारीरिक और मानसिक पोषण को सुनिश्चित किये जाने के प्रयासों की सफलता पर भी निर्भर करेगा।  चर्चा कीजिये। 

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