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राइट-टू-रिपेयर: यूरोपीय संघ

  • 03 Mar 2021
  • 8 min read

चर्चा में क्यों?

यूरोपीय संघ (EU) में रेफ्रिजरेटर, वॉशिंग मशीन, हेयर ड्रायर या टेलीविज़न आदि बेचने वाली कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि आगामी 10 वर्ष तक इन उपकरणों की मरम्मत की जा सके।

  • ‘राइट-टू-रिपेयर’ के नाम से जाना जा रहा यह अधिकार मार्च 2021 से 27 राष्ट्रों में लागू हुआ है।

प्रमुख बिंदु

  • परिचय

    • ‘राइट-टू-रिपेयर’ एक ऐसे अधिकार अथवा कानून को संदर्भित करता है, जिसका उद्देश्य उपभोक्ताओं को अपने स्वयं के उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मरम्मत करने और उन्हें संशोधित करने की अनुमति देता है, जहाँ अन्यथा ऐसे उपकरणों के निर्माता उपभोक्ताओं को केवल उनके द्वारा प्रस्तुत सेवाओं का उपयोग करने की अनुमति देते हैं।
    • ‘राइट-टू-रिपेयर’ का विचार मूल रूप से अमेरिका से उत्पन्न हुआ था, जहाँ ‘मोटर व्हीकल ओनर्स राइट टू रिपेयर एक्ट, 2012’ किसी भी व्यक्ति को वाहनों की मरम्मत करने में सक्षम बनाने के लिये वाहन निर्माताओं को सभी आवश्यक दस्तावेज़ और जानकारी प्रदान करना अनिवार्य बनाता है।
  • नए नियम

    • यूरोपीय संघ के नए नियमों के तहत निर्माताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि कम-से-कम एक दशक तक किसी भी उपकरण के पार्ट्स उपलब्ध रहें, हालाँकि कुछ पार्ट्स केवल विशिष्ट पेशेवर कंपनियों को ही प्रदान किये जाएंगे, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनका प्रयोग सही तरीके से हो।
    • अब से नए उपकरणों को मरम्मत के लिये आवश्यक सूचनाओं और दस्तावेज़ों के साथ ही निर्मित किया जाएगा, साथ ही उन्हें इस लिहाज से डिज़ाइन किया जाएगा कि उनकी मरम्मत करना संभव न हो और उन्हें आसानी से पारंपरिक साधनों का उपयोग करते हुए नष्ट किया जा सके, जिससे उपकरणों की रीसाइक्लिंग में सुधार होगा।
  • यूरोप में ई-कचरा

    • ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनीटर 2020 के अनुसार, यूरोपीय लोग प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति 16 किलोग्राम से अधिक ई-कचरे का उत्पादन करते हैं।
      • एशिया और अफ्रीका में यह क्रमशः 5.6 और 2.5 किलोग्राम है, जो कि सबसे कम है।
      • ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनीटर: यह यूनाइटेड नेशन यूनिवर्सिटी (UNU), इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन (ITU) और इंटरनेशनल सॉलिड वेस्ट एसोसिएशन (ISWA) द्वारा संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के सहयोग गठित ग्लोबल ई-वेस्ट स्टैटिस्टिक्स पार्टनरशिप (GESP) के तहत एक गठबंधन है।
    • इस ई-कचरे का लगभग आधा हिस्सा टूटे हुए घरेलू उपकरणों के कारण उत्पन्न होता है, और यूरोपीय संघ में इसमें से लगभग 40 प्रतिशत को ही रीसाईकल किया जाता है, जिसके कारण काफी अधिक मात्रा में खतरनाक ई-कचरा रीसाईकल होने से छूट जाता है।
  • महत्त्व

    • यह ई-कचरे की विशाल मात्रा को कम करने में मदद करेगा, जो कि महाद्वीप पर प्रत्येक वर्ष बढ़ता जा रहा है।
    • यह उपभोक्ताओं को पैसा बचाने में मदद करेगा।
    • यह उपकरणों के जीवनकाल, रखरखाव, पुन: उपयोग, उन्नयन, पुनर्चक्रण और अपशिष्ट प्रबंधन में सुधार कर चक्रीय अर्थव्यवस्था के उद्देश्यों में योगदान देगा।
    • यह दो विनिर्माण चुनौतियों से निपटने में मदद करेगा:
      • नियोजित मूल्यह्रास के प्रति उचित ध्यान न दिया जाना।
      • निर्माता कंपनियों द्वारा मरम्मत एवं रखरखाव नेटवर्क को नियंत्रित करना।
  • आधुनिक उपकरणों के साथ मरम्मत संबंधी समस्या

    • विशेष उपकरणों की आवश्यकता
      • आधुनिक उपकरणों को प्रायः इस प्रकार डिज़ाइन किया जाता है कि उन्हें खोलने अथवा मरम्मत करने के लिये विशिष्ट उपकरणों की आवश्यकता होती है और ऐसे उपकरण न होने पर इनकी मरम्मत नहीं की जा सकती है।
    • स्पेयर पार्ट्स की कमी
      • स्पेयर पार्ट्स की कमी भी एक बड़ी समस्या है। कभी-कभी किसी बड़ी मशीन के एक छोटे से टुकड़े को खोजना काफी चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
  • विनिर्माताओं से संबंधित चिंताएँ

    • निर्माताओं ने ‘राइट-टू-रिपेयर’ का विरोध किया है, क्योंकि इससे नए उत्पादों को अधिक मात्रा में बेचने की उनकी क्षमता प्रभावित होगी और वे उत्पाद निर्माता के बजाय सेवा प्रदाता बनने के लिये मजबूर हो जाएंगे।
    • निर्माताओं का यह भी मत है कि उपभोक्ता को उच्च-प्रौद्योगिकी उत्पादों की मरम्मत करने की अनुमति देना एक जोखिमपूर्ण कार्य है, उदाहरण के लिये प्रायः कारों में लिथियम- आयन बैटरी का प्रयोग किया जाता है।

भारत में ई-कचरा

  • आधिकारिक आँकड़े
    • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, भारत में वर्ष 2019-20 में 10 लाख टन से अधिक ई-कचरा उत्पन्न हुआ था। वर्ष 2017-18 के मुकाबले वर्ष 2019-20 में ई-कचरे में 7 लाख टन की बढ़ोतरी हुई थी।
  • भारत द्वारा किये गए प्रयास
    • ई-कचरा प्रबंधन नियम, 2016:
      • इसका उद्देश्य ई-कचरे से उपयोगी सामग्री को अलग करना और/या उसे पुन: उपयोग के लिये सक्षम बनाना है, ताकि निपटान के लिये खतरनाक किस्म के कचरे को कम किया जा सके और बिजली तथा इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उचित प्रबंधन सुनिश्चित किया जा सके।
    • ई-कचरा क्लिनिक:
      • यह ई-कचरे के पृथक्करण, प्रसंस्करण और निपटान से संबंधित है।

ई-वेस्ट:

  • ई-वेस्ट इलेक्ट्रॉनिक-अपशिष्ट का संक्षिप्त रूप है और इस शब्द का उपयोग पुराने, समाप्त या खारिज इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के संदर्भ में किया जाता है। इसमें उनके घटक, उपभोग्य वस्तुएँ, उनके भाग
  • और स्पेयर शामिल हैं।
  • इसे दो व्यापक श्रेणियों के तहत 21 प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है:
    • सूचना प्रौद्योगिकी और संचार उपकरण।
    • उपभोक्ता विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक्स।
  • ई-कचरे में उनके घटक, उपभोग्य वस्तुएँ और पुर्जे आदि शामिल होते हैं।

आगे की राह

इस तरह के नियम भारत जैसे देश में विशेष तौर पर महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं, जहाँ सेवा प्रदाताओं पर प्रायः सही ढंग से कार्य न करने का आरोप लगाया जाता है और अधिकृत कार्यशालाएँ कुछ ही क्षेत्रों में मौजूद हैं। यदि भारत में इस तरह के कानून को अपनाया जाता है तो देश में मरम्मत और रखरखाव सेवाओं की गुणवत्ता में काफी सुधार किया जा सकता है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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