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राजस्व घाटा अनुदान

  • 11 Oct 2022
  • 8 min read

प्रिलिम्स के लिये:

राजस्व घाटा अनुदान, सहायता अनुदान, वित्त आयोग, भारत की संचित निधि, अनुच्छेद 269, अनुच्छेद 268, अनुच्छेद 275

मेन्स के लिये:

केंद्र-राज्य संबंध, सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप

चर्चा में क्यों?

हाल ही में वित्त मंत्रालय ने 14 राज्यों को 7,183 करोड़ रुपए के राजस्व घाटा अनुदान की मासिक किस्त जारी की है।

विचलन बाद राजस्व घाटा (PDRD):

  • परिचय:
    • केंद्र सरकार, संविधान के अनुच्छेद 275 के तहत राज्यों को विचलन बाद राजस्व घाटा अनुदान प्रदान करती है।
      • अनुच्छेद 275 संसद को इस बात का अधिकार प्रदान करता है कि वह ऐसे राज्यों को उपयुक्त सहायक अनुदान देने का उपबंध कर सकती है, जिन्हें संसद की दृष्टि में सहायता की आवश्यकता है।
    • अनुदान का भुगतान प्रत्येक वर्ष भारत की संचित निधि से किया जाता है और विभिन्न राज्यों के लिये अलग-अलग राशि निर्धारित की जा सकती है।
      • ये अनुदान पूंजी और आवर्ती राशि के रूप में आवश्यक हो सकते हैं।
  • उद्देश्य:
    • इन अनुदानों का उद्देश्य राज्यों को राज्य स्तरीय कल्याणकारी योजनाओं की लागत को पूरा करने या अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के स्तर में सुधार करने में सक्षम बनाना है।
    • अनुदानों का मुख्य उद्देश्य वित्तीय संसाधनों में अंतर-राज्यीय असमानताओं को दूर करना और एक समान राष्ट्रीय स्तर पर राज्य सरकारों की कल्याणकारी योजनाओं के रखरखाव एवं विस्तार का समन्वय करना है।
  • अनुदान हेतु सिफारिश:
    • राज्यों के हस्तांतरण के बाद (केंद्र के विभाज्य कर भाग) राजस्व खातों में अंतर को पूरा करने के लिये मासिक किश्तों में वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार अनुदान जारी किये जाते हैं।
    • 15वें वित्त आयोग (FC) ने वित्त वर्ष 2026 में समाप्त होने वाली पाँच साल की अवधि में लगभग 3 ट्रिलियन रुपए की राशि के हस्तांतरण के बाद राजस्व घाटा अनुदान की सिफारिश की है।
      • इस अनुदान को प्राप्त करने के लिये राज्यों की पात्रता और अनुदान की मात्रा का निर्धारण आयोग द्वारा राज्य के राजस्व एवं व्यय के आकलन के बीच के अंतर के आधार पर किया गया था।
      • वर्ष 2022-23 के दौरान 15वें वित्त आयोग द्वारा PDRD अनुदान के लिये जिन राज्यों की अनुशंसा की गई है, वे हैं: आंध्र प्रदेश, असम, हिमाचल प्रदेश, केरल, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नगालैंड, पंजाब, राजस्थान, सिक्किम, त्रिपुरा, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल।

केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों का संविधान द्वारा संचालन:

  • संवैधानिक प्रावधान:
    • भारतीय संविधान ने करों के वितरण के साथ-साथ गैर-कर राजस्व और ऋण लेने की शक्ति से संबंधित विस्तृत प्रावधान किये हैं, जो राज्यों को संघ द्वारा सहायता अनुदान के प्रावधानों के पूरक हैं।
    • भाग XII में अनुच्छेद 268 से 293 तक केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों से संबंधित प्रावधान हैं।
  • कर लगाने की शक्तियाँ: संविधान केंद्र और राज्यों के मध्य कर शक्तियों को निम्नानुसार विभाजित करता है:
    • संसद को संघ सूची में शामिल विषयों पर कर लगाने का विशेष अधिकार है, राज्य विधायिका को राज्य सूची में शामिल विषयों पर कर लगाने का विशेष अधिकार है।
    • दोनों समवर्ती सूची में उल्लिखित विषयों पर कर लगा सकते हैं, जबकि कराधान की अवशिष्ट शक्ति केवल संसद के पास है।
  • कर राजस्व का वितरण:
    • अनुच्छेद 268:
      • यह संघ द्वारा आरोपित कर के लिये प्रावधान करता है, लेकिन राज्यों द्वारा एकत्र और विनियोजित किया जाता है।
      • इसमें बिल ऑफ एक्सचेंज, चेक आदि पर स्टांप शुल्क शामिल है।
    • अनुच्छेद 269:
      • इसमें संघ द्वारा लगाए गए और साथ ही एकत्र किये गए लेकिन राज्यों को सौंपे गए कर शामिल हैं।
      • इनमें अंतर्राज्यीय व्यापार या वाणिज्य के दौरान वस्तुओं की बिक्री और खरीद पर कर या अंतर-राज्यीय व्यापार या वाणिज्य के दौरान वस्तु की खेप पर कर शामिल हैं।
    • अनुच्छेद 269-A:
      • यह अंतर-राज्यीय व्यापार या वाणिज्य के दौरान वस्तु और सेवा कर (GST) के करारोपण एवं संग्रह का प्रावधान करता है।
      • ऐसे व्यापार के दौरान आपूर्ति पर GST को केंद्र द्वारा आरोपित और संगृहीत किया जाता है।
        • लेकिन यह कर केंद्र और राज्यों के मध्य GST परिषद की सिफारिशों पर संसद द्वारा निर्धारित नियम के अनुसार से वितरित किया जाता है।
    • अनुच्छेद270:
      • इसमें संघ द्वारा लगाए गए और एकत्र किये गए कर शामिल हैं लेकिन ये कर संघ और राज्यों के बीच वितरित किये जाते हैं।
      • इसमें निम्नलिखित को छोड़कर संघ सूची में निर्दिष्ट सभी कर और शुल्क शामिल हैं:
        • अनुच्छेद 268, 269 और 269-ए में उल्लिखित शुल्क और कर।
        • अनुच्छेद 271 में उल्लिखित करों और शुल्कों पर अधिभार (यह विशेष रूप से केंद्र को जाता है)।
        • विशिष्ट प्रयोजनों के लिये लगाया जाने वाला कोई उपकर।
  • सहायता अनुदान: केंद्र और राज्यों के बीच करों के बँटवारे के अतिरिक्त संविधान केंद्रीय संसाधनों से राज्यों को सहायता अनुदान प्रदान करता है। अनुदान दो प्रकार के होते हैं:
    • सांविधिक अनुदान (अनुच्छेद 275): यह अनुदान संसद द्वारा भारत की संचित निधि से उन राज्यों को दिया जाता है जिन्हें सहायता की आवश्यकता होती है। विभिन्न राज्यों को अलग-अलग राशियाँ दी जा सकती हैं।
    • विवेकाधीन अनुदान (अनुच्छेद 282): यह केंद्र और राज्यों दोनों को किसी भी सार्वजनिक उद्देश्य के लिये अनुदान देने का अधिकार देता है, भले ही यह उनकी संबंधित विधायी क्षमता के भीतर न हो।
      • इस प्रावधान के तहत केंद्र, राज्यों को अनुदान देता है। इन अनुदानों को विवेकाधीन अनुदान के रूप में जाना जाता है, इसका कारण यह है कि केंद्र इन अनुदानों को देने के लिये बाध्य नहीं है और यह विषय उसके विवेकाधीन होता है।
      • इन अनुदानों का दोहरा उद्देश्य है: योजना लक्ष्यों को पूरा करने के लिये राज्य को वित्तीय रूप से मदद करना और केंद्र के लाभ के लिये राष्ट्रीय योजना को लागू करने हेतु राज्य की कार्रवाई को प्रभावित करना तथा राज्य के साथ समन्वय स्थापित करना।

स्रोत: द हिंदू

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