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भारतीय अर्थव्यवस्था

भारत बना दुनिया का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक

  • 10 Oct 2022
  • 10 min read

प्रिलिम्स के लिये:

गन्ना, पेट्रोल के साथ इथेनॉल सम्मिश्रण (EBP) कार्यक्रम, उचित और लाभकारी मूल्य (FRP), कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP), रंगराजन समिति (2012), जैव ईंधन नीति 2018.

मेन्स के लिये:

भारत की अर्थव्यवस्था पर चीनी  उत्पादन का प्रभाव

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत 5000 लाख मीट्रिक टन (LMT) से अधिक गन्ने के रिकॉर्ड उत्पादन के कारण चीनी के क्षेत्र में सबसे बड़े उत्पादक एवं उपभोक्ता और दुनिया के दूसरे सबसे बड़े निर्यातक के रूप में उभरा है।

चीनी के अच्छे उत्पादन ककारण:

  • चीनी का शानदार सीज़न (सितंबर-अक्तूबर): सीज़न के दौरान गन्ना उत्पादन, चीनी उत्पादन, चीनी निर्यात, गन्ना खरीद, गन्ना बकाया भुगतान और इथेनॉल उत्पादन के सभी रिकॉर्ड बनाए गए।
  • उच्च निर्यात: निर्यात बिना किसी वित्तीय सहायता के लगभग 109.8 LMT के साथ सबसे अधिक था और इसने लगभग 40,000 करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा अर्जित की।
  • भारत सरकार की नीतिगत पहल: विगत 5 वर्षों में सरकार द्वारा समय पर की गई पहल के चलते गन्ना उत्पादन वर्ष 2018-19 के वित्तीय संकट से बाहर निकलकर वर्ष 2021-22 में आत्मनिर्भरता के स्तर पर पहुँचा दिया है।
  • इथेनॉल उत्पादन को प्रोत्साहन: सरकार ने चीनी मिलों को चीनी को इथेनॉल में बदलने और अधिशेष चीनी का निर्यात करने के लिये प्रोत्साहित किया है ताकि मिलों के परिचालन जारी रखने के लिये उनकी बेहतर वित्तीय स्थिति हो।
    • इसके अलावा तेज़ी से भुगतान, कम कार्यशील पूंजी आवश्यकताओं और मिलों में अतिरिक्त चीनी की कमी के कारण कम नकदी ब्लॉकेज के कारण चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति में सुधार हुआ है।
  • जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति 2018, वर्ष 2025 तक EBP कार्यक्रम के तहत 20% इथेनॉल मिश्रण का एक सांकेतिक लक्ष्य प्रदान करती है।
  • उचित और लाभकारी मूल्य (Fair and remunerative price-FRP): FRP वह न्यूनतम मूल्य है जो चीनी मिलों को गन्ना किसानों को गन्ने की खरीद के लिये चुकानी पड़ती है। यह कृषि लागत और मूल्य आयोग (Commission for Agricultural Costs and Prices-CACP) की सिफारिशों के आधार पर तथा राज्य सरकारों एवं अन्य हितधारकों के परामर्श के बाद निर्धारित किया जाता है।
  • राज्य की सलाह का महत्त्व: हालाँकि केंद्र सरकार FRP तय करती है, राज्य सरकारें एक राज्य सलाहकारी मूल्य भी निर्धारित कर सकती हैं जो चीनी मिल को किसानों को चुकानी पड़ती है।
  • चीनी उद्योग के नियमन पर सिफारिशें देने के लिये रंगराजन समिति (2012) का गठन किया गया था।
  • रंगराजन समिति की सिफारिशें:
    • चीनी के निर्यात और आयात पर मात्रात्मक नियंत्रण को समाप्त करने के लिये इन्हें उचित टैरिफ द्वारा प्रतिस्थापित किया जाना चाहिये।
    • उप-उत्पादों की बिक्री पर कोई प्रतिबंध नहीं होना चाहिये और कीमतें बाज़ार निर्धारित होनी चाहिये।
    • मिलों को खोई से उत्पन्न विद्युत का उपयोग करने की अनुमति देने के लिये राज्यों को नीतिगत सुधार भी करने चाहिये।

भारत में चीनी उद्योग की वर्तमान स्थिति:

  • परिचय: चीनी उद्योग एक महत्त्वपूर्ण कृषि आधारित उद्योग है जो लगभग 50 मिलियन गन्ना किसानों और चीनी मिलों में सीधे कार्यरत लगभग 5 लाख श्रमिकों की ग्रामीण आजीविका को प्रभावित करता है।
    • चीनी उद्योग कपास के बाद भारत में दूसरा सबसे बड़ा कृषि आधारित उद्योग है।
  • गन्ने की वृद्धि के लिये भौगोलिक स्थितियाँ:
    • तापमान: गर्म और आर्द्र जलवायु के साथ 21-27 °C के मध्य।
    • वर्षा: लगभग 75-100 सेमी।
    • मृदा का प्रकार: गहरी समृद्ध दोमट मृदा।
    • शीर्ष गन्ना उत्पादक राज्य: महाराष्ट्र> उत्तर प्रदेश> कर्नाटक।
  • वितरण: चीनी उद्योग मोटे तौर पर उत्पादन के दो प्रमुख क्षेत्रों- उत्तर में उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और पंजाब तथा दक्षिण में महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु एवं आंध्र प्रदेश में स्थापित हैं।
    • दक्षिण भारत में उष्णकटिबंधीय जलवायु है जो उत्तर भारत की तुलना में प्रति इकाई क्षेत्र में अधिक उपज देने के साथ उच्च सुक्रोज के लिये उपयुक्त है। 
  • चुनौतियाँ:
    • अनिश्चित उत्पादन निर्गत: गन्ने को कई अन्य खाद्य और नकदी फसलों, जैसे- कपास, तिलहन, चावल इत्यादि से प्रतिस्पर्द्धा करनी पड़ती है। इससे मिलों को गन्ने की आपूर्ति प्रभावित होती है और चीनी का उत्पादन भी साल-दर-साल बदलता रहता है जिससे कीमतों में उतार-चढ़ाव होता है। कम कीमतों के कारण अतिरिक्त उत्पादन के समय में चीनी मिलों को नुकसान उठाना पड़ता है।
    • गन्ने की कम उपज: दुनिया के कुछ प्रमुख गन्ना उत्पादक देशों की तुलना में भारत में प्रति हेक्टेयर उपज बेहद कम है। उदाहरण के लिये जावा में 90 टन प्रति हेक्टेयर और हवाई में 121 टन प्रति हेक्टेयर की तुलना में भारत की उपज केवल 64.5 टन/ हेक्टेयर है।
    • लघु पेराई अवधि: चीनी उत्पादन एक मौसमी उद्योग है जिसमें एक वर्ष में सामान्य रूप से 4 से 7 महीने की छोटी पेराई अवधि होती है।
    • यह श्रमिकों के वित्तीय नुकसान और मौसमी रोज़गार  के साथ  चीनी मिलों के पूर्ण उपयोग न होने  का कारण बनता है।
    • चीनी की कम रिकवरी दर: भारत में गन्ने से चीनी की औसत रिकवरी दर 10% से कम है जो अन्य प्रमुख चीनी उत्पादक देशों की तुलना में काफी कम है।
    • उत्पादन की उच्च लागत: गन्ने की उच्च लागत, अकुशल तकनीक, उत्पादन की अनौपचारिक प्रक्रिया और भारी उत्पाद शुल्क के कारण विनिर्माण की लागत बढ़ जाती है।
    • भारत में अधिकांश चीनी मिलें छोटे आकार की हैं जिनकी पेराई क्षमता 1,000 से 1,500 टन प्रतिदिन है जिससे यह उचित लाभ उठाने में विफल रहती हैं।

आगे की राह

  • गन्ना क्षेत्रों के मानचित्रण के लिये सुदूर संवेदन प्रौद्योगिकियों को अपनाने की आवश्यकता है।
    • भारत में जल, खाद्य और ऊर्जा क्षेत्रों में गन्ने के महत्त्व के बावजूद हाल के वर्षों और समय अवधि में गन्ने का कोई विश्वसनीय मैप उपलब्ध नहीं है।
  • गन्ने में अनुसंधान और विकास कम उपज एवं कम चीनी पुनर्प्राप्ति दर जैसे मुद्दों को हल करने में मदद कर सकता है।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न  

्रश्न. जैव ईंधन पर भारत की राष्ट्रीय नीति के अनुसार, जैव ईंधन के उत्पादन के लिये निम्नलिखित में से किनका उपयोग कच्चे माल के रूप में किया जा सकता है? (2020)

  1. कसावा
  2. क्षतिग्रस्त गेहूंँ के दाने
  3. मूंँगफली के बीज
  4. चने की दाल
  5. सड़े हुए आलू
  6. मीठे चुक़ंदर

निम्नलिखित कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1, 2, 5 और 6
(b) केवल 1, 3, 4 और 6
(c) केवल 2, 3, 4 और 5
(d) 1, 2, 3, 4, 5 और 6

उत्तर: (a)

व्याख्या:

  • जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति, 2018 क्षतिग्रस्त खाद्यान्न जो मानव उपभोग के लिये अनुपयुक्त हैं जैसे- गेहूंँ, टूटे चावल आदि से इथेनॉल के उत्पादन की अनुमति देती है।
  • यह नीति राष्ट्रीय जैव ईंधन समन्वय समिति के अनुमोदन के आधार पर खाद्यान्न की अधिशेष मात्रा को इथेनॉल में परिवर्तित करने की भी अनुमति देती है।
  • यह नीति इथेनॉल उत्पादन में प्रयोग होने वाले तथा मानव उपभोग के लिये अनुपयुक्त पदार्थ जैसे- गन्ने का रस, चीनी युक्त सामग्री- चुकंदर, मीठा चारा, स्टार्च युक्त सामग्री तथा मकई, कसावा, गेहूंँ, टूटे चावल, सड़े हुए आलू के उपयोग की अनुमति देकर इथेनॉल उत्पादन हेतु कच्चे माल के दायरे का विस्तार करती है। अत: 1, 2, 5 और 6 सही हैं।

अत: विकल्प (a) सही उत्तर है।

स्रोत: पी.आई.बी.

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