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राज्यसभा में पारित हुआ RTE (संशोधन) विधेयक

  • 04 Jan 2019
  • 9 min read

चर्चा में क्यों?


हाल ही में राज्यसभा में निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार (संशोधन) विधेयक [Right of Children to Free and Compulsory Education (Amendment) Bill] पारित किया। विधेयक में संशोधन के बाद स्कूलों में अनुत्तीर्ण छात्रों को उसी कक्षा में रोकने या न रोकने का अधिकार राज्यों के पास होगा। उल्लेखनीय है लोकसभा ने इस संसोधन विधेयक को जुलाई, 2018 में ही पारित कर दिया गया था।

नो डिटेंशन पॉलिसी (No Detention Policy)

  • शिक्षा का अधिकार के मौजूदा प्रावधान के अनुसार, छात्रों को 8वीं कक्षा तक फेल होने के बाद भी अगली कक्षा में प्रवेश दे दिया जाता है, इसे ही 'नो डिटेंशन पॉलिसी' के नाम से जानते हैं।
  • नो डिटेंशन पॉलिसी, शिक्षा के अधिकार अधिनियम (2009) का अहम हिस्सा है। इस अधिनियम में प्रावधान है कि बच्चों को आठवीं तक किसी भी कक्षा में फेल होने पर उसी कक्षा में पुनः पढ़ने के लिये बाध्य न किया जाए; अगर किसी छात्र के प्राप्तांक कम हैं तो उसे पासिंग ग्रेड देकर अगली कक्षा में भेज दिया जाए।
  • इस पॉलिसी का मुख्य उद्देश्य यह था कि छात्रों की सफलता का मूल्यांकन केवल उनके द्वारा परीक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर न किया जाए बल्कि इसमें उनके सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखा जाए।
  • किंतु, इसके लागू होने के कुछ ही वर्षों में यह शिकायत मिलने लगी कि बच्चो में उस कक्षा के स्तर की अपेक्षित जानकारी नहीं है जिस कारण उनके सीखने के स्तर में लगातार गिरावट आ रही है। ऐसा माना जा रहा था कि इस पॉलिसी के लागू होने से छात्र और अभिभावक दोनों सुस्त हो गए थे, जिससे सीखने और सिखाने की प्रक्रिया में गिरावट आई।

निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009

  • इस अधिनियम के अंतर्गत छह से चौदह वर्ष के बीच के सभी बच्चों को अपने पड़ोस के स्कूल में प्राथमिक शिक्षा (कक्षा 1-8) प्राप्त करने का अधिकार है।
  • इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, प्राथमिक शिक्षा समाप्त होने तक किसी भी बच्चे को किसी भी कक्षा में रोका नहीं जा सकता है। अगली कक्षा में स्वतः प्रमोशन से यह सुनिश्चित होता है कि पहले की कक्षा में बच्चे को न रोकने के परिणामस्वरूप वह स्कूल नहीं छोड़ता है।
  • हाल के वर्षों में विशेषज्ञ समितियों ने इस अधिनियम के नो डिटेंशन प्रावधान की समीक्षा की और यह सुझाव दिया कि इसे हटा दिया जाए या चरणबद्ध तरीके से समाप्त कर दिया जाए।

निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार (संशोधन) विधेयक, 2017 

  • नो डिटेंशन प्रावधान को हटाने के लिये निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 में संशोधन हेतु लोकसभा में निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार (संशोधन) विधेयक, 2017 पेश किया गया था।

विधेयक की विशेषताएँ

  • निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 प्राथमिक शिक्षा पूरी होने तक बच्चों को पिछली कक्षा में रोकने यानी डिटेंशन को प्रतिबंधित करता है। लेकिन यह विधेयक इस प्रावधान में संशोधन करता है और कहता है कि कक्षा 5 तथा कक्षा 8 में प्रत्येक शैक्षणिक वर्ष के अंत में नियमित परीक्षा संचालित की जाएगी। अगर विद्यार्थी परीक्षा पास करने में असफल हो जाता है तो उसे अतिरिक्त शिक्षण दिया जाएगा और दोबारा परीक्षा ली जाएगी।
  • अगर विद्यार्थी दोबारा असफल हो जाता है तो संबंधित केंद्र या राज्य सरकार का स्कूल बच्चे को पिछली कक्षा में रोकने यानी डिटेंशन की अनुमति दे सकता है।

नो डिटेंशन से संबंधित प्रमुख मुद्दे

  • असफल होने पर बच्चों को पिछली कक्षा में रोका जाना चाहिये या नहीं इस संबंध में अधिनियम के इस प्रावधान को लेकर भिन्न-भिन्न मत हैं। कुछ लोगों का यह मानना है कि अगली कक्षा में स्वतः प्रमोशन से बच्चों में सीखने और अध्यापकों में सिखाने की भावना कम हो जाती है।
  • कुछ अन्य लोगों का यह मानना है कि बच्चों को पिछली कक्षा में रोकने यानी डिटेंशन के परिणामस्वरूप वे स्कूल छोड़ (drop out) देते हैं। जबकि वे व्यवस्था संबंधी उन कारकों पर ध्यान नहीं देते हैं जिसमें अध्यापकों और स्कूल की गुणवत्ता, मूल्यांकन का तरीका, पठन-पाठन की शैली जैसे कारक शामिल हैं।
  • संशोधित विधेयक 1.4 मिलियन प्राथमिक विद्यालयों के 180 मिलियन से अधिक छात्रों को प्रभावित करेगा।

पृष्ठभूमि

  • पिछले कुछ सालों में लगभग 25  राज्यों ने इस पॉलिसी के कारण शिक्षा का स्तर गिरने की बात कहते हुए केंद्र सरकार इसे समाप्त करने की मांग से की थी। इसके बाद संशोधन का फैसला लिया गया था।
  • अप्रैल 2010 में आरटीई अधिनियम की शुरुआत के बाद से पहली से लेकर  आठवीं कक्षा तक कोई भी छात्र फेल नहीं हुआ था, लेकिन इस अभ्यास ने शिक्षा के खराब स्तर के लिये इसे आलोचना का शिकार बना दिया।
  • गैर-लाभकारी संगठन ‘प्रथम’ द्वारा प्रकाशित ग्रामीण भारत के लिये शिक्षा रिपोर्ट की वार्षिक स्थिति (ASER) के अनुसार, पाँचवी कक्षा के सभी छात्रों का अनुपात जो कि कक्षा दो के  स्तर की पाठ्य पुस्तक पढ़ सकते थे, 2014 में 48.1% से गिरकर 2016 में 47.8% हो गया था। अंकगणित और अंग्रेज़ी विषय में भी यही स्थिति देखी गई।

क्या बदलाव का नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा?

  • शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 को मूल अधिकार बनाने का उद्देश्य समाज के सभी वर्गों के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना है। लेकिन नो-डिटेंशन पॉलिसी में प्रस्तवित बदलाव सामाजिक-आर्थिक कारकों को नज़रअंदाज़ करता दिख रहा है।
  • मानव संसाधन विकास मंत्रालय के मुताबिक, 2014-2015 में प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर लगभग 4% थी और बच्चों को परीक्षाओं के आधार पर फेल करने से स्कूल छोड़ने की दर में वृद्धि होगी।
  • आर्थिक रूप से वंचित समूहों के पास इतना पैसा नहीं होता कि वे अपने बच्चों को निजी ट्यूशन दिला सकें। नो-डिटेंशन पॉलिसी में बदलाव के कारण फेल होने वाले बच्चों को आगे की कक्षाओं में प्रोन्नति नहीं मिल सकेगी और ऐसे में उनके माता-पिता का यह सोचना स्वाभाविक है कि बच्चे स्कूल जाने की बजाय कहीं काम पर जाएँ।
  • लड़कियों के लिये तो यह बदलाव और भी गंभीर साबित हो सकता है। कम उम्र में विवाह, स्कूल का घर के नज़दीक न होना, कम लागत वाले सैनिटरी नैपकिन और स्कूलों में शौचालयों का अभाव आदि कुछ ऐसे कारण हैं जिनकी वज़ह से लड़कियाँ माध्यमिक स्तर तक पहुँचते-पहुँचते स्कूल छोड़ देती हैं। अब नो डिटेंशन पॉलिसी में यह बदलाव उनके स्कूल छोड़ने का एक और कारण बन सकता है।
  • यह भी देखा गया है कि जब किसी बच्चे को उसकी उम्र से कम उम्र के बच्चों के समूह में बैठने को मजबूर किया जाता है, तो वह परेशान होता है; दूसरे बच्चे उसका मज़ाक बनाते हैं, परिणामस्वरूप वह स्कूल छोड़ देता है।

स्रोत : द हिंदू, मिंट एवं पी.आर.एस

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