विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर
- 11 Apr 2026
- 112 min read
प्रिलिम्स के लिये: प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR), नाभिकीय विखंडन, प्रेशराइज्ड हैवी वाटर रिएक्टर, स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर
मेन्स के लिये: भारत का तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम, ऊर्जा सुरक्षा में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBRs) की भूमिका
चर्चा में क्यों?
भारत ने अपनी स्वच्छ ऊर्जा यात्रा में प्रमुख उपलब्धि हासिल की है और इस क्रम में तमिलनाडु के कल्पक्कम में स्वदेशी रूप से डिज़ाइन किये गए प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) ने सफलतापूर्वक अपनी पहली क्रिटिकलिटी (निरंतर नाभिकीय शृंखला अभिक्रिया की शुरुआत) प्राप्त की।
- इस उपलब्धि के साथ भारत ने आधिकारिक रूप से अपने तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के दूसरे चरण में प्रवेश कर लिया है, जिसकी परिकल्पना मूल रूप से डॉ. होमी जे. भाभा ने की थी।
सारांश
- भारत की PFBR उपलब्धि उसके तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम में निर्णायक है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा के साथ भविष्य में थोरियम के उपयोग का मार्ग प्रशस्त होता है।
- हालाँकि, उच्च लागत, तकनीकी देरी और आपूर्ति शृंखला पर निर्भरता जैसी चुनौतियों का समाधान करना आवश्यक है, ताकि परमाणु ऊर्जा क्षमता का प्रभावी विस्तार किया जा सके।
प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) क्या है ?
- परिचय: PFBR 500 MWe (मेगावाट इलेक्ट्रिकल) क्षमता वाला उन्नत परमाणु रिएक्टर है। इसे इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR) द्वारा तकनीकी रूप से विकसित किया गया है और भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड (BHAVINI) द्वारा निर्मित किया गया है।
- क्रिटिकलिटी को समझना:क्रिटिकलिटी वह अवस्था है, जब एक निरंतर और नियंत्रित नाभिकीय विखंडन शृंखला अभिक्रिया शुरू होती है।
- इस स्थिति में विखंडन से उत्पन्न न्यूट्रॉनों की संख्या उतनी ही होती है, जितनी नष्ट हो जाती है, जिससे ऊर्जा उत्पादन स्थिर बना रहता है। यह अवस्था निर्माण चरण से संचालन (विद्युत उत्पादन) चरण में संक्रमण को दर्शाती है।
- वैश्विक स्थिति: पूरी तरह वाणिज्यिक संचालन के बाद, भारत विश्व का दूसरा देश (रूस के बाद) बन जाएगा, जो सफलतापूर्वक एक वाणिज्यिक फास्ट ब्रीडर रिएक्टर संचालित करेगा, क्योंकि जापान, फ्राँस और अमेरिका जैसे देशों ने तकनीकी जटिलताओं के कारण अपने कार्यक्रम बंद कर दिये हैं।
- फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR): FBR एक अत्यधिक दक्ष परमाणु रिएक्टर है, जो तीव्र न्यूट्रॉनों का उपयोग करके जितना विखंडनीय पदार्थ उपभोग करता है, उससे अधिक उत्पन्न करता है।
- प्रयुक्त ईंधन: परंपरागत थर्मल रिएक्टर (जो प्राकृतिक यूरेनियम का उपयोग करते हैं) से भिन्न PFBR में यूरेनियम-प्लूटोनियम मिक्स्ड ऑक्साइड (MOX) ईंधन का उपयोग किया जाता है। यह विखंडनीय पदार्थ चरण-1 के प्रेशराइज्ड हैवी वाटर रिएक्टर (PHWRs) के प्रयुक्त ईंधन के पुनः प्रसंस्करण से प्राप्त किया जाता है।
- ‘ब्रीडिंग’ तंत्र: रिएक्टर के कोर के चारों ओर यूरेनियम-238 की एक ‘ब्लैंकेट’ परत होती है। जब तीव्र न्यूट्रॉन इस फर्टाइल U-238 से टकराते हैं तो यह रूपांतरित होकर विखंडनीय प्लूटोनियम-239 में बदल जाता है, जिससे रिएक्टर जितना ईंधन खर्च करता है, उससे अधिक ईंधन उत्पन्न करता है।
- ब्रिज टू थोरियम: PFBR को इस प्रकार डिज़ाइन किया गया है कि इसकी ब्लैंकेट में थोरियम-232 का उपयोग किया जा सके। रूपांतरण के माध्यम से यह यूरेनियम-233 उत्पन्न करेगा, जो तीसरे चरण के लिये आवश्यक ईंधन है।
- बंद ईंधन चक्र: PFBR द्वारा उत्पन्न प्रयुक्त ईंधन का पुनः प्रसंस्करण करके उसे फिर से रिएक्टर में रिसाइकल किया जाता है, जिससे परमाणु अपशिष्ट में उल्लेखनीय कमी आती है।
भारत का तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम क्या है ?
- परिचय: भारत का तीन चरणों वाला परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम, जिसे 1950 के दशक में होमी जे. भाभा द्वारा तैयार किया गया था, देश के सीमित यूरेनियम और विशाल थोरियम भंडार का लाभ उठाकर ऊर्जा स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की एक दीर्घकालिक रणनीति है।
- इसका उद्देश्य तीन क्रमिक चरणों के माध्यम से परमाणु ईंधन चक्र को पूरा करना है: प्रेशराइज्ड हैवी वाटर रिएक्टर्स (PHWRs), फास्ट ब्रीडर रिएक्टर्स (FBRs) और थोरियम-आधारित रिएक्टर्स।
- परमाणु कार्यक्रम के तीन चरण:
- चरण 1 (प्रेशराइज्ड हैवी वाटर रिएक्टर्स - PHWRs): बिजली उत्पन्न करने के लिये प्राकृतिक यूरेनियम का उपयोग किया जाता है। इसके उपयोग किये गए ईंधन से सह-उत्पाद के रूप में प्लूटोनियम प्राप्त होता है।
- चरण 2 (फास्ट ब्रीडर रिएक्टर्स - FBRs): इसमें चरण 1 से प्राप्त प्लूटोनियम को यूरेनियम के साथ मिलाकर उपयोग किया जाता है।
- यह न केवल अधिक प्लूटोनियम उत्पन्न करता है, बल्कि थोरियम-232 के विकिरण के माध्यम से यूरेनियम-233 के निर्माण में भी अहम भूमिका निभाता है।
- चरण 3 (थोरियम-आधारित रिएक्टर्स): यह अंतिम चरण देश के व्यापक थोरियम संसाधनों का उपयोग करते हुए, द्वितीय चरण से प्राप्त यूरेनियम-233 की सहायता से संचालित होगा। इसके माध्यम से भविष्य में व्यापक स्तर पर बिजली का उत्पादन सुनिश्चित किया जाएगा।
- भारत में परमाणु ऊर्जा का वर्तमान परिदृश्य:
- स्थापित क्षमता: भारत की वर्तमान परमाणु क्षमता 8.78 GW है। वर्ष 2024-25 की अवधि में, इन संयंत्रों ने 56,681 मिलियन यूनिट विद्युत का उत्पादन किया।
- ऊर्जा मिश्रण में योगदान: परमाणु ऊर्जा एक स्थिर 'बेसलोड' प्रदान करती है, जो वर्ष 2024-25 में भारत के कुल विद्युत उत्पादन का लगभग 3.1% रही।
- नियोजित विस्तार: भारत की क्षमता वर्ष 2031-32 तक लगभग तीन गुना होकर 22.38 GW होने का अनुमान है। यह स्वदेशी 700 MW रिएक्टरों और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से विकसित 1,000 MW इकाइयों के माध्यम से प्राप्त किया जाएगा।
- वैश्विक सहयोग: मज़बूत अंतर्राष्ट्रीय विश्वास को दर्शाते हुए, भारत ने 18 देशों के साथ नागरिक परमाणु सहयोग अंतर-सरकारी समझौते (IGAs) किये हैं।

भारत को फास्ट ब्रीडर रिएक्टर्स (FBRs) की आवश्यकता क्यों है ?
- यूरेनियम की कमी को दूर करना: भारत के पास वैश्विक यूरेनियम भंडार का केवल 1-2% हिस्सा है।
- मौज़ूदा प्रेशराइज्ड हैवी वाटर रिएक्टर्स (PHWRs) यूरेनियम में निहित ऊर्जा का मात्र 1% ही उपयोग कर पाते हैं। इसके विपरीत, फास्ट ब्रीडर रिएक्टर्स (FBRs) ईंधन उपयोग की क्षमता को बढ़ाकर उसी यूरेनियम भंडार से 60 गुना अधिक ऊर्जा उत्पन्न करने में सक्षम हैं।
- थोरियम की क्षमता का उपयोग: भारत के पास विश्व के थोरियम भंडार का 25% से अधिक हिस्सा है (जो केरल, तमिलनाडु और ओडिशा जैसे तटीय राज्यों की मोनाजाइट रेत में पाया जाता है)।
- हालाँकि, थोरियम प्राकृतिक रूप से विखंडनीय नहीं है। FBRs एक महत्त्वपूर्ण पुल के रूप में कार्य करते हैं, जो थोरियम को उपयोगी यूरेनियम-233 में परिवर्तित करते हैं।
- परमाणु क्षमता का विस्तार: भारत का लक्ष्य अपनी परमाणु क्षमता को वर्तमान के ~8.78 GW से बढ़ाकर वर्ष 2031-32 तक 22.38 GW करना है।
- तेज़ी से बढ़ती औद्योगिक और आर्थिक मांग को पूरा करने के लिये 'बेसलोड' विद्युत उत्पादन (स्थिर विद्युत आपूर्ति) को बढ़ाने हेतु FBRs अत्यंत आवश्यक हैं।
- वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो का लक्ष्य: परमाणु ऊर्जा एक विश्वसनीय और निम्न कार्बन वाला ऊर्जा स्रोत है। कोयले और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम करने तथा जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये इन उन्नत रिएक्टरों (FBRs) की सफलता बहुत महत्त्वपूर्ण है।
- परमाणु अपशिष्ट को कम करना: उपयोग किये गए ईंधन के पुनर्चक्रण और पुनर्संसाधन के माध्यम से, FBRs परमाणु अपशिष्ट की मात्रा और उसकी रेडियोविषाक्तता को काफी कम कर देते हैं। इससे लंबे समय तक परमाणु कचरे के निपटान की चिंताएँ कम हो जाती हैं।
भारत में फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों (FBR) की गति बढ़ाने में क्या चुनौतियाँ हैं ?
- शीतलक संबंधी खतरे: FBR उच्च-दक्षता ऊष्मा स्थानांतरण के लिये तरल सोडियम को शीतलक के रूप में उपयोग करते हैं। हालाँकि, तरल सोडियम हवा या जल के संपर्क में आने पर तीव्र प्रतिक्रिया करता है, जिसके लिये फ्लालेस इंजीनियरिंग, स्ट्रिक्ट लीक डिटेक्शन और एक सुरक्षा संस्कृति की आवश्यकता होती है।
- तकनीकी विलंब: FBR का निर्माण अत्यधिक जटिल है। कल्पक्कम PFBR मूल रूप से वर्ष 2010 में पूरा होने वाला था, लेकिन कड़े सुरक्षा परीक्षण और स्वदेशी आपूर्ति शृंखला की बाधाओं के कारण इसमें एक दशक से अधिक का विलंब हुआ।
- वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये भारत को इस दोगुना होने की अवधि को काफी कम करने की आवश्यकता है।
- उच्च पूंजीगत लागत: तरल सोडियम को संभालने की जटिलता और अतिरिक्त सुरक्षा प्रणालियों की आवश्यकता के कारण, FBR का निर्माण PHWR की तुलना में काफी अधिक महँगा है।
- प्लूटोनियम अर्थव्यवस्था: चूँकि FBR प्लूटोनियम का उत्पादन और उपयोग करते हैं, वे गहन अंतर्राष्ट्रीय अन्वेषण के अधीन हैं। प्लूटोनियम की बड़ी मात्रा को हटाने से बचाना एक महत्त्वपूर्ण राजनयिक और सुरक्षा चुनौती है।
- कमज़ोर आपूर्ति शृंखला: भारत का परमाणु कार्यक्रम LWR प्रौद्योगिकी और संवर्द्धित ईंधन के लिये कुछ वैश्विक भागीदारों, विशेष रूप से रूस, पर अधिक निर्भर है, जो सामरिक भेद्यता उत्पन्न करता है।
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संघर्ष, प्रतिबंध या शिपिंग देरी जैसे भू-राजनीतिक व्यवधान उन महत्त्वपूर्ण घटकों की आपूर्ति को बाधित कर सकते हैं, जो अभी तक घरेलू स्तर पर उत्पादित नहीं होते हैं। उदाहरण के लिये रूस-यूक्रेन संघर्ष के कारण कुडनकुलम इकाईयों 3 और 4 (2025) में देरी बाहरी निर्भरता के जोखिमों को उजागर करती है।
भारत का दीर्घकालिक परमाणु दृष्टिकोण
- वर्ष 2047 का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य: केंद्रीय बजट 2025–26 में उल्लिखित परमाणु ऊर्जा मिशन का लक्ष्य वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट की विशाल परमाणु ऊर्जा क्षमता प्राप्त करना है।
- SMR पर ध्यान: नई प्रौद्योगिकियों के प्रति एक गंभीर प्रतिबद्धता प्रदर्शित करते हुए, लघु मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMR) के लिये 20,000 करोड़ रुपये आवंटित किये गए हैं। वर्ष 2033 तक इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये कम-से-कम पाँच स्वदेशी रूप से डिज़ाइन किये गए SMR को संचालन में लाना है।
- अगली पीढ़ी के रिएक्टरों की डिज़ाइन: भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) उन्नत रिएक्टरों के विकास का नेतृत्व कर रहा है, जिसमें BSMR-200 (200 मेगावाट), SMR-55 (55 मेगावाट) और हाइड्रोजन उत्पादन के लिये बनाया गया एक उच्च-तापमान गैस-कूल्ड रिएक्टर (5 मेगावाट तक) शामिल हैं।
- शांति अधिनियम, 2025: नवीन अधिनियमित 'सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (SHANTI) विधेयक' कानूनी ढाँचे को आधुनिक बनाता है। महत्त्वपूर्ण रूप से यह सख्त नियामक निरीक्षण के तहत सीमित निजी क्षेत्र की भागीदारी और निवेश के रास्ते खोलता है।
भारत की परमाणु क्षमता को बढ़ाने के लिये कौन-से उपाय किये जा सकते हैं ?
- ग्रीन टैक्सोनॉमी: भारत की ग्रीन टैक्सोनॉमी के तहत परमाणु ऊर्जा को आधिकारिक तौर पर ‘हरित’ या ‘संधारणीय’ निवेश के रूप में वर्गीकृत करने से परमाणु परियोजनाओं को सस्ती अंतर्राष्ट्रीय जलवायु वित्तपोषण और ग्रीन बॉण्ड तक पहुँचने में मदद मिलेगी।
- प्लग-एंड-प्ले न्यूक्लियर पार्क मॉडल: सरकार को एक न्यूक्लियर पार्क मॉडल अपनाना चाहिये, जहाँ डेवलपर्स को पेश किये जाने से पहले साइटों को पर्यावरणीय और भूकंपीय अनुमोदन के लिये पूर्व-स्वीकृति प्रदान की जाती है।
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तैयार बुनियादी ढाँचे, जैसे- लॉजिस्टिक्स और जल की पहुँच के साथ विशेष परमाणु क्षेत्र (SNZ) बनाने से निर्माण-पूर्व विलंब कम होगा। यह अनिश्चितता को कम करता है और परियोजना निष्पादन को गति प्रदान करता है।
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परमाणु-हाइड्रोजन और औद्योगिक एकीकरण: परमाणु संयंत्रों को ऊर्जा, हाइड्रोजन और औद्योगिक भाप का सह-उत्पादन करके बहु-उत्पाद केंद्रों में विकसित होना चाहिये।
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हाइड्रोजन उत्पादन के लिये अधिशेष बेसलोड पावर का उपयोग करने से संयंत्र की उपयोगिता में सुधार हो सकता है और राजस्व के अतिरिक्त स्रोत बन सकते हैं। यह परमाणु ऊर्जा को स्वच्छ ईंधन लक्ष्यों के अनुरूप बनाता है और परियोजना की व्यवहार्यता को बढ़ाता है।
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परमाणु खरीद दायित्व (NPO): नवीकरणीय खरीद दायित्वों (RPO) के समान परमाणु खरीद दायित्व (NPO) को लागू करने से परमाणु ऊर्जा के लिये सुनिश्चित मांग की प्राप्ति की जा सकती है।
- वितरण कंपनियों (DISCOM) और उद्योगों को निश्चित टैरिफ पर परमाणु ऊर्जा का एक निर्धारित हिस्सा खरीदना अनिवार्य करने से राजस्व में स्थिरता सुनिश्चित की जा सकती है। यह नीतिगत समर्थन सस्ती नवीकरणीय ऊर्जा से प्रतिस्पर्द्धा के बावजूद परमाणु ऊर्जा को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने में सहायक होगा।
निष्कर्ष
भारत की PFBR की सफल उपलब्धि ऊर्जा सुरक्षा और उसके त्रि-चरणीय परमाणु ऊर्जा दृष्टिकोण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। हालाँकि, परमाणु क्षमता के प्रभावी विस्तार के लिये तकनीकी, वित्तीय और आपूर्ति-शृंखला संबंधी चुनौतियों का समाधान आवश्यक है। उचित नीतिगत समर्थन और नवाचार के साथ, परमाणु ऊर्जा भारत के स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण का एक विश्वसनीय स्तंभ बन सकती है।
| दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्र. “फास्ट ब्रीडर रिएक्टर भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा के लिये केंद्रीय हैं, लेकिन ये अनेक बाधाओं का सामना करते हैं।” समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR) क्या है ?
यह एक ऐसा रिएक्टर है, जो तीव्र (फास्ट) न्यूट्रॉनों का उपयोग करके अपने उपभोग से अधिक विखंडनीय पदार्थ (जैसे- प्लूटोनियम) का उत्पादन करता है, जिससे ईंधन दक्षता बढ़ती है।
2. भारत के लिये PFBR का क्या महत्त्व है?
यह भारत के परमाणु कार्यक्रम के द्वितीय चरण में प्रवेश को दर्शाता है और थोरियम उपयोग के लिये प्लूटोनियम उत्पादन को सक्षम बनाता है।
3. थोरियम भारत के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण है?
भारत के पास विश्व के लगभग 25% थोरियम भंडार हैं, जो तकनीकी रूप से उपयोग में आने पर दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं।
3. FBR की प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं ?
उच्च पूंजी लागत, सोडियम शीतलक से जुड़े जोखिम, तकनीकी विलंब और आपूर्ति-शृंखला पर निर्भरता इसकी प्रमुख चुनौतियाँ हैं।
4. SHANTI अधिनियम, 2025 क्या है ?
यह एक कानून है, जो परमाणु विनियमन को आधुनिक बनाता है और कठोर निगरानी के तहत सीमित निजी भागीदारी की अनुमति देता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. भारत में, क्यों कुछ परमाणु रिएक्टर ‘आई. ए. ई. ए. सुरक्षा उपायों’ के अधीन रखे जाते हैं, जबकि अन्य इस सुरक्षा के अधीन नहीं रखे जाते ? (2020)
(a) कुछ यूरेनियम का प्रयोग करते हैं और अन्य थोरियम का
(b) कुछ आयातित यूरेनियम का प्रयोग करते हैं और अन्य घरेलू आपूर्ति का
(c) कुछ विदेशी उद्यमों द्वारा संचालित होते हैं और अन्य घरेलू उद्यमों द्वारा
(d) कुछ सरकारी स्वामित्व वाले होते हैं और अन्य निजी स्वामित्व वाले
उत्तर: (b)
प्र. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017)
1. परमाणु सुरक्षा शिखर-सम्मेलन, संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में आवधिक रूप से किये जाते हैं।
2. विखंडनीय सामग्रियों पर अंतर्राष्ट्रीय पैनल अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा अभिकरण का एक अंग
है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं ?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: (d)
मेन्स
प्र. ऊर्जा की बढ़ती हुई ज़रूरतों के परिप्रेक्ष्य में क्या भारत को अपने नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम का विस्तार करना जारी रखना चाहिये? नाभिकीय ऊर्जा से संबंधित तथ्यों एवं भयों की विवेचना कीजिये। (2018)
प्र. भारत में नाभिकीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी की संवृद्धि और विकास का विवरण प्रस्तुत कीजिये। भारत में तीव्र प्रजनक रिएक्टर कार्यक्रम का क्या लाभ है ? (2017)