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कोयला दहन से प्रदूषण: IEACCC

  • 18 Feb 2021
  • 9 min read

चर्चा में क्यों?

‘इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी क्लीन कोल सेंटर’ (International Energy Agency’s Clean Coal Centre- IEACCC) के एक अध्ययन में कहा गया है कि कोयला दहन भारत में होने वाले अत्यधिक वायु प्रदूषण के लिये ज़िम्मेदार है।

  • हाल ही में दिल्ली स्थित एक थिंक टैंक ‘सेंटर फॉर साइंस एंड एन्वायरनमेंट’ (Centre for Science and Environment- CSE) ने भारत के कोयला आधारित विद्युत क्षेत्र के कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) फुटप्रिंट को कम करने के उपायों पर भी चर्चा की है और केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) को देश में कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों हेतु उत्सर्जन मानदंडों को पूरा करने की समयसीमा बढ़ाने के खिलाफ चेतावनी दी है।

प्रमुख बिंदु:

निष्कर्ष:

  • कोयला आधारित ताप विद्युत स्टेशनों से प्रदूषण:
    • कोयला आधारित ताप विद्युत स्टेशन कुल सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) के आधे के लिये, कुल नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) के 30% के लिये और कुल पार्टिकुलेट मैटर (PM) के लगभग 20% उत्सर्जन के लिये ज़िम्मेदार हैं।
    • ताप विद्युत स्टेशनों में लगातार कोयला दहन और नवीनतम ‘कार्बन कैप्चर स्टोरेज’ तकनीक के कार्यान्वयन में देरी, भारत में वायु प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं।
  • अन्य क्षेत्रों से होने वाला प्रदूषण:
    • वायु प्रदूषण के लिये ज़िम्मेदार क्षेत्रों में परिवहन और अन्य औद्योगिक क्षेत्र कोयला आधारित ताप विद्युत स्टेशनों के बाद दूसरे स्थान पर हैं।

Emissions

सुझाव:

  • पुराने ताप विद्युत स्टेशनों की सेवानिवृत्ति:
    • स्वच्छ कोयला तकनीक अपनाकर प्रदूषण को सीमित करना और वर्तमान ताप विद्युत स्टेशनों की दक्षता में सुधार करना।
  • स्वच्छ और उन्नत प्रौद्योगिकी में निवेश:
    • भारत में नए उन्नत प्रौद्योगिकी संयंत्र - जैसे गुजरात में मुंद्रा और सासन आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहे हैं, क्योंकि स्वच्छ और उन्नत तकनीक में निवेश करने के लिये  हितधारकों में आत्मविश्वास नहीं होता है।
  • अधिक महत्त्वाकांक्षी योजनाएँ प्रारंभ करना:
    • मौजूदा ऊर्जा दक्षता योजनाएँ जिनमें ‘परफॉर्मेंस अचीव एंड ट्रेड’ योजनाएँ, दक्षता मानक योजनाएँ और कार्बन मूल्य निर्धारण योजनाएँ शामिल हैं, महत्त्वपूर्ण सुधार लाने के लिये पर्याप्त रूप से महत्त्वाकांक्षी नहीं हैं।

कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) को अपनाना:

  • यह उत्सर्जन कम करने के बराबर ही महत्त्वपूर्ण है। भारत को अपनी जलवायु प्रतिबद्धता के एक हिस्से के रूप में इसे शामिल करने का सुझाव दिया गया है।
  • CCUS अपशिष्ट CO2 को एकत्रित कर इसे एक भंडारण स्थल पर ले जाने और वहाँ जमा करने की प्रक्रिया है, जिससे यह वायुमंडल में प्रवेश नहीं कर सकेगी।

कोयला दहन एवं प्रदूषण:

कोयले का निर्माण:

  • ये अत्यधिक ताप और दबाव के कारण हज़ारों वर्षों में निर्मित भूमिगत कोयले की कार्बन युक्त काली चट्टानें हैं जो जलने पर ऊर्जा का उत्पादन करती हैं।

वायु प्रदूषण:

  • जब कोयले को जलाया जाता है, तो यह कई वायुवाहित विषाक्त पदार्थों और प्रदूषकों का उत्सर्जन करता है।
  • इनमें पारा, सीसा, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, पार्टिकुलेट और अन्य विभिन्न भारी धातुएँ शामिल हैं।
  • इन सभी प्रदूषकों के कारण होने वाले वायु प्रदूषण से अनेक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ जैसे- अस्थमा, साँस लेने में कठिनाई, मस्तिष्क क्षति, हृदय संबंधी समस्याएँ, कैंसर, तंत्रिका संबंधी विकार और समय से पहले मृत्यु तक हो सकती है।

जल प्रदूषण:

  • कोयला आधारित विद्युत संयंत्र हर वर्ष लगभग 100 मिलियन टन से अधिक ‘कोल एश’ का उत्पादन करते हैं।
    • इस कचरे का आधा से अधिक हिस्सा तालाबों, झीलों, लैंडफिल और अन्य स्थलों में निर्गत होता है, जहाँ समय के साथ यह जलमार्ग और पेयजल आपूर्ति को दूषित कर सकता है।
  • जल प्रदूषण के लिये ज़िम्मेदार अन्य कारकों में कोयला खदानों से एसिड रॉक जल निकासी, ‘माउंटेन स्टॉप माइनिंग’ द्वारा पहाड़ों और घाटियों का विनाश एवं कोयला संयंत्रों के स्थानीय जल आपूर्ति पर बहुत अधिक निर्भर होने के कारण पेयजल संबंधी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।

जलवायु परिवर्तन:

विद्युत संयंत्रों से उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिये पहल:

  • CCUS का क्रियान्वयन:
    • भारत अपनी क्षमता का प्रयोग कर रहा है, क्योंकि तमिलनाडु के तूतीकोरिन में एक औद्योगिक बंदरगाह पर एक संयंत्र ने अपने स्वयं के कोयले से चलने वाले बॉयलर से CO2 को एकत्रित करना शुरू कर दिया है और इसका उपयोग बेकिंग सोडा बनाने के लिये किया जा रहा है।
  • उत्सर्जन मानक:
    • भारत ने ताप विद्युत संयंत्र द्वारा उत्सर्जित ज़हरीले सल्फर डाइऑक्साइड में कटौती करने वाली ‘फ्लू गैस डिसल्फराइज़ेशन’ (Flue Gas Desulphurization- FGD) इकाइयों को स्थापित करने के लिये उत्सर्जन मानकों का पालन करने के आदेश जारी किये हैं।
  • ग्रेडेड एक्शन प्लान:
    • विद्युत मंत्रालय ने एक ‘ग्रेडेड एक्शन प्लान’ प्रस्तावित किया है, जिसमें ऐसे क्षेत्र शामिल हैं जहाँ संयंत्रों को प्रदूषण की गंभीरता के अनुसार वर्गीकृत किया जाएगा, इसमें क्षेत्र-1 में गंभीर रूप से प्रदूषित क्षेत्रों का विवरण है और क्षेत्र-5 सबसे कम प्रदूषित है।

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी क्लीन कोल सेंटर

क्लीन कोल सेंटर के विषय में:

सदस्य:

  • इस सेंटर में कुल 17 सदस्य होते हैं, जिनका चुनाव कॉन्ट्रैक्टिंग पार्टियों (Contracting Party) और प्रायोजक संगठनों (Sponsoring Organisation) में से होता है।
  • इसका प्रायोजक भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) है।

अवस्थिति:

  • यह इंजीनियरों, वैज्ञानिकों और अन्य विशेषज्ञों की एक टीम के साथ लंदन में स्थित है।

सहयोग:

  • इसका वित्तपोषण राष्ट्रीय सरकारों (कॉन्ट्रैक्टिंग पार्टियों) और कॉर्पोरेट औद्योगिक संगठनों द्वारा किया जाता है।

कार्य:

  • कोयले को संयुक्त राष्ट्र सतत् विकास लक्ष्यों (United Nations Sustainable Development Goal) के अनुकूल ऊर्जा का स्वच्छ स्रोत बनाने पर स्वतंत्र जानकारी और विश्लेषण प्रदान करना।
  • ऊर्जा में कोयले की भूमिका और आपूर्ति, सामर्थ्य तथा पर्यावरणीय मुद्दों की सुरक्षा को संतुलित करने की आवश्यकता पर ध्यान देना।
  • कोयले के उपयोग से CO2 और अन्य प्रदूषकों के उत्सर्जन को उच्च दक्षता - कम उत्सर्जन (High Efficiency - Low Emission) प्रौद्योगिकियों के माध्यम से कम करने पर ध्यान केंद्रित करना।

स्रोत: डाउन टू अर्थ

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