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उत्तर भारत में भूकंप की पूर्व-चेतावनी प्रणाली विकसित करने की योजना

  • 14 Sep 2017
  • 6 min read

चर्चा में क्यों ?

उत्तराखंड में भूकंप की पूर्व-चेतावनी प्रणाली के लिये चलाई गई पायलट परियोजना की सफलता से उत्साहित होकर आई.आई.टी. रूड़की द्वारा उत्तर भारत के सभी प्रमुख भूकंप संभावित क्षेत्रों के लिये इसी तरह की एक प्रणाली को विकसित करने की योजना बनाई जा रही है।

प्रमुख बिंदु

  • यह परियोजना भूकंप इंजीनियरिंग के क्षेत्र में संस्थान द्वारा किये गए संपूर्ण अनुसंधान का ही एक भाग है। वस्तुतः यह हिमालयी क्षेत्र में चलाई जा रही पायलट परियोजना  का ही विस्तार है।
  • भारत सरकार के ‘पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय’ (Ministry of Earth Sciences) की सहायता से उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय के भूकंप प्रवण क्षेत्रों में 84 संवेदक (sensors) स्थापित करने वाला यह पहला संस्थान है। वर्ष 2015 में एक पायलट परियोजना  के तहत इन संवेदकों को स्थापित किया गया है।
  • इन संवेदकों का प्रयोग उत्तराखंड सरकार द्वारा उपयोग किये जा रहे संस्थान में मौजूद कंप्यूटर सर्वर तक आँकड़े पहुँचाने में किया जा रहा है। इनकी सहायता से रिक्टर स्केल पर 6 और इससे अधिक तीव्रता वाले भूकंपों के विषय में पूर्व-चेतावनी जारी करने का कार्य किया जा रहा है।
  • यदि भारत के भूकंपीय क्षेत्र वाले मानचित्र को देखा जाए तो हम जानते हैं कि उत्तर भारत के अधिकांश शहर गंभीर और मध्यम तीव्रता के भूकंपीय खतरे से जूझ रहे हैं। हिमालयी क्षेत्र में किये गए इस अध्ययन का उद्देश्य एक ऐसी कार्य-प्रणाली को सुनिश्चित करना है, जिसकी सहायता से मानव जीवन की रक्षा की जा सकेगी। 
  • भूकंपों की भविष्यवाणी करना असंभव है, परन्तु एक साधारण चेतावनी प्रणाली के माध्यम से दूरस्थ शहरों में रह रहे लोगों के जीवन की रक्षा करना संभव है, जिससे भूकंप के खतरे को भाँपते हुए लोग यथाशीघ्र ही एक खुले व सुरक्षित स्थान पर जा सकते हैं। 
  • पायलट परियोजना सफलतापूर्वक पूरी हो चुकी है और अब आईआईटी रुड़की में सायरन युक्त एक कार्य-प्रणाली है। वैज्ञानिक उसी प्रणाली को देहरादून और हल्द्वानी में पहली बार सार्वजानिक उपयोग के लिये विकसित कर रहे हैं। उम्मीद है कि कुछ वर्षों में इस परियोजना  को सरकार का पूर्ण समर्थन प्राप्त होगा तथा उत्तर भारत के भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील सभी प्रमुख शहरों में भूकम्प पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित की जा सकेगी।
  • पायलट परियोजना के सफलतापूर्वक संपन्न होने पर उत्तराखंड सरकार ने वर्तमान भूकंप-पूर्व-चेतावनी प्रणाली की मरम्मत और कुमाऊँ क्षेत्र को कवर करते हुए 100 अतिरिक्त संवेदकों को लगाने को मंज़ूरी दे दी है।
  • देहरादून के ‘राज्य आपातकालीन कार्य केंद्र’ और उत्तराखंड के ज़िला मुख्यालयों में तथा देहरादून एवं हल्द्वानी में 100 सायरन लगाने को भी मंज़ूरी दे दी गई है।
  • भूकंप-पूर्व-चेतावनी प्रणाली एक ही बिंदु से प्रारंभ होने वाली तथा भिन्न-भिन्न समयों में लक्ष्य को भेदने वाली भिन्न-भिन्न वेगों वाली अनेक तरंगों के संचरण के सिद्धांत पर कार्य करती है।

भूकंप संबंधी कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य:  

  • नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी (National Centre for Seismology) के अनुसार दिल्ली और पटना सहित भारत के 29 शहर और नगर गंभीर से अति गंभीर भूकंप क्षेत्रों (seismic zones) में आते हैं। इनमें में अधिकांश क्षेत्र हिमालय के आस-पास स्थित हैं। उल्लेखनीय है कि हिमालय विश्व के सबसे अधिक भूकंप सक्रिय क्षेत्रों में से एक है। 
  • भारतीय मानक ब्यूरो (The Bureau of Indian Standards) ने भूकंप रिकॉर्ड, टेक्टोनिक गतिविधियों और क्षति को ध्यान में रखते हुए देश के विभिन्न क्षेत्रों को जोन  II से V में वर्गीकृत किया है।
  • जोन II को भूकंप की दृष्टि से कम सक्रिय माना जाता है, जबकि ज़ोन V को सबसे अधिक सक्रिय माना जाता है। जोन IV और V क्रमशः "गंभीर" से "बहुत गंभीर" श्रेणियों में आते हैं।
  • जोन IV और V में पड़ने वाले शहर हैं - दिल्ली, पटना, श्रीनगर (जम्मू-कश्मीर), कोहिमा (नागालैंड), पुदुचेरी, गुवाहाटी, गंगटोक, शिमला, देहरादून, इम्फाल (मणिपुर) और चंडीगढ़ ।
  • जोन V में संपूर्ण पूर्वोत्तर क्षेत्र, जम्मू और कश्मीर के कुछ हिस्से, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात का कच्छ का रन क्षेत्र , उत्तर बिहार के कुछ हिस्से एवं अंडमान और निकोबार द्वीप-समूह शामिल हैं।
  • जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, सिक्किम, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात और महाराष्ट्र के कुछ हिस्से भी जोन IV  में आते हैं।
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