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उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991

  • 15 Mar 2021
  • 6 min read

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से ‘उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991’ को चुनौती देने वाली एक याचिका पर जवाब देने को कहा है। 

  • गौरतलब है कि यह अधिनियम किसी भी पूजा/उपासना स्थल की वस्तुस्थिति को उसी अवस्था में रोक देता/बनाए रखता है, जैसा कि वह 15 अगस्त, 1947 को थी। 
  • इस कानून की जाँच करने पर सहमति देते हुए न्यायालय ने मथुरा और वाराणसी सहित देश भर के विभिन्न पूजा स्थलों के संदर्भ में मुकदमे दायर करने के लिये दरवाज़े खोल दिये हैं।

प्रमुख बिंदु:

उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991:

  • यह पूजा स्थलों (राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के मामले को छोड़कर, जिसका मामला पहले से ही अदालत में था) की "धार्मिक प्रकृति" को वर्ष 1947 की स्थिति के अनुरूप बनाए रखने का प्रयास करता है। 

उद्देश्य: 

  • इस अधिनियम की धारा 3 के तहत पूजा स्थल या यहाँ तक कि उसके खंड को एक अलग धार्मिक संप्रदाय या एक ही धार्मिक संप्रदाय के अलग वर्ग के पूजा स्थल में परिवर्तित करने को प्रतिबंधित किया गया है।
  • इस अधिनियम की धारा 4(2) में कहा गया है कि पूजा स्थल की प्रकृति को परिवर्तित करने से संबंधित सभी मुकदमे, अपील या अन्य कार्रवाईयाँ (जो 15 अगस्त, 1947 को लंबित थी) इस अधिनियम के लागू होने के बाद समाप्त हो जाएंगी और ऐसे मामलों पर कोई नई कार्रवाई नहीं की जा सकती।
    • हालाँकि यदि पूजा स्थल की प्रकृति में बदलाव 15 अगस्त, 1947 (अधिनियम के लागू होने के बाद) की कट-ऑफ तारीख के बाद हुआ हो, तो उस स्थिति में कानूनी कार्रवाई शुरू की जा सकती है।
  • यह अधिनियम सरकार के लिये भी एक सकारात्मक दायित्व निर्धारित करता है कि वह हर पूजा स्थल के धार्मिक चरित्र/प्रकृति को उसी प्रकार बनाए रखे जैसा कि वह स्वतंत्रता के समय था।
    • सरकार पर सभी धर्मों की समानता को सुरक्षित और संरक्षित करने के लिये यह विधायी दायित्व एक आवश्यक धर्मनिरपेक्ष गुण है तथा यह भारतीय संविधान की मूल विशेषताओं में से एक है।

अपवाद: 

  • अयोध्या का विवादित स्थल (राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद) को इस अधिनियम से छूट दी गई थी। इसी छूट के कारण इस कानून के लागू होने के बाद भी अयोध्या मामले में मुकदमा आगे बढ़ सका।
  • अयोध्या विवाद के अलावा इस अधिनियम में कुछ अन्य मामलों को भी  छूट दी गई:
    • कोई भी पूजा स्थल जो ‘प्राचीन स्मारक और पुरातात्त्विक स्थल अवशेष अधिनियम, 1958’ के तहत शामिल प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक या एक पुरातात्त्विक स्थल है।
    • ऐसे मुकदमे जिनका निस्तारण हो चुका है या जिन पर अंतिम फैसला दिया जा चुका है।
    • ऐसा कोई भी विवाद जिसे संबंधित पक्षों द्वारा सुलझा लिया गया है या जिन उपासना स्थलों का रूपांतरण इस अधिनियम के लागू होने से पहले की मौन स्वीकृति के माध्यम से किया गया हो।

दंड:

  • इस अधिनियम की धारा 6 के तहत अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर जुर्माने के साथ अधिकतम तीन वर्ष के कारावास के दंड का प्रावधान है।

सर्वोच्च न्यायालय का मत: 

  • वर्ष 2019 में अयोध्या मामले के फैसले में सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने इस कानून का उल्लेख करते हुए कहा कि यह संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को प्रकट करता है और इसकी प्रतिगामिता को सख्ती से प्रतिबंधित करता है।. 

याचिका में दिये गए तर्क:

  • याचिका में इस अधिनियम को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि यह अधिनियम धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन करता है।
    • इस याचिका में यह तर्क दिया गया है कि 15 अगस्त, 1947 की कट-ऑफ तिथि "मनमाना, तर्कहीन और पूर्वव्यापी" है तथा यह हिंदुओं, जैन, बौद्धों और सिखों को अपने "पूजा स्थलों" पर पुनः दावा करने के लिये अदालत जाने से रोकती है, जिन पर  "कट्टरपंथी बर्बर आक्रमणकारियों" द्वारा "आक्रमण" कर "अतिक्रमण" कर लिया गया था।   
  • याचिका में यह तर्क दिया गया है कि केंद्र के पास "तीर्थस्थल" या "कब्रिस्तान" पर कानून बनाने की कोई शक्ति नहीं है, जो राज्य सूची के तहत आते हैं। 
    • हालाँकि सरकार  के अनुसार, वह इस कानून को लागू करने के लिये संघ सूची की प्रविष्टि 97 के तहत अपनी अवशिष्ट शक्ति का उपयोग कर सकती है।
    • संघ सूची की प्रविष्टि 97 केंद्र को उन विषयों पर कानून बनाने के लिये अवशिष्ट शक्ति प्रदान करती है जिन्हें (जिन विषयों को) तीनों में से किसी भी सूची में शामिल नहीं किया गया है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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