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कम नामांकन वाले विद्यालयों का विलय

  • 31 Oct 2020
  • 10 min read

प्रिलिम्स के लिये

साथ-ई परियोजना, शिक्षा का अधिकार 

मेन्स के लिये

शिक्षा क्षेत्र में सुधार

चर्चा में क्यों?

ऐसे समय में जब COVID-19 महामारी के बीच विद्यालयों को पुनः खोलने का विचार किया जा रहा है, ओडिशा सरकार ने कम नामांकन वाले 8000 विद्यालयों के विलय को पूरा करने के लिये 15 ज़िलों को नोटिस जारी किया है। 

प्रमुख बिंदु:

  • ऐसे विद्यालय जिनमें कम नामांकन होता है उन्हें पास के एक बड़े विद्यालयों में विलय कर दिया जाता है जिन्हें ‘लीड स्कूल’ (Lead schools) कहा जाता है। 
  • विद्यालयों के विलय की यह प्रक्रिया ओडिशा सरकार के ‘स्कूल एंड मास एजुकेशन डिपार्टमेंट’ (Department of School and Mass Education) द्वारा मार्च में जारी एक नोटिस का अनुवर्ती स्वरूप है। जो महामारी व लॉकडाउन के कारण ठप हो गई थी।
    • मार्च 2020 में राज्य सरकार ने कम नामांकन वाले 11517 विद्यालयों के विलय की पहल की थी। इन विद्यालयों में 6350 प्राथमिक, उच्च प्राथमिक एवं उच्च विद्यालय शामिल थे जिनमें 20 से कम छात्रों का नामांकन हुआ था जबकि 5177 विद्यालय ऐसे हैं, जिनमें 40 से कम छात्र हैं।
  • हालिया नोटिस हालाँकि केवल उन विद्यालयों के विलय में तेज़ी लाने का निर्देश देता है जिनमें 20 से कम छात्रों का नामांकन हुआ है।
  • पहले से सूचीबद्ध 6350 विद्यालयों के अलावा ओडिशा सरकार के ‘स्कूल एंड मास एजुकेशन डिपार्टमेंट’ ने विलय के लिये 20 से कम छात्रों वाले 2000 और विद्यालयों की पहचान की है।

‘सस्टनेबल एक्शन फॉर ट्रांसफार्मिंग ह्यूमन कैपिटल इन एजुकेशन’ प्रोजेक्ट

[Sustainable Action for Transforming Human Capital in Education (SATH-E) Project]:

  • विद्यालयों का यह विलय नीति आयोग (NITI Aayog) के ‘सस्टनेबल एक्शन फॉर ट्रांसफार्मिंग ह्यूमन कैपिटल इन एजुकेशन प्रोजेक्ट’ [(SATH-E) Project] के तहत किया जा रहा है और इसे विद्यालयों के समेकन एवं युक्तिकरण की संज्ञा दी गई है।

साथ-ई परियोजना [(SATH-E) Project]:

  • वर्ष 2017 में ओडिशा उन तीन राज्यों (अन्य दो राज्य झारखंडमध्य प्रदेश) में से एक था जिन्हें साथ-ई (SATH-E) परियोजना के तहत अपने स्वास्थ्य एवं शिक्षा क्षेत्रों में सुधार हेतु सहायता प्रदान करने के लिये नीति आयोग (NITI Aayog) द्वारा चुना गया था।
  • इसका उद्देश्य प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय शिक्षा को लक्ष्य-संचालित अभ्यास के माध्यम से बदलना और शिक्षा के लिये रोल मॉडल राज्य बनाना है।
  • इस पहल का समापन वर्ष 2020 के शैक्षणिक वर्ष के अंत में होगा।
  • विद्यालयों का विलय साथ-ई (SATH-E) परियोजना के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये किये गए उपायों में से एक है क्योंकि इस प्रक्रिया में शिक्षकों, पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं और खेलने के उपकरण जैसे समेकित संसाधनों की सहायता के लिये अधिकृत किया जाता है।

विलय के बाद:

  • ‘स्कूल एंड मास एजुकेशन डिपार्टमेंट’ के अनुसार, जो छात्र दूर से विद्यालय की यात्रा करेंगे उन्हें 20 रुपए दैनिक भत्ता प्रदान किया जाएगा और विद्यालय बंद होने से प्रभावित प्रत्येक छात्र को लीड स्कूल में प्रवेश पर 3000 रुपए का एकमुश्त सुविधा भत्ता प्रदान किया जाएगा।
  • यदि ‘लीड स्कूल’ से दूरी 1 किमी. से अधिक है तो छात्रों को शिक्षा के अधिकार (Right To Education- RTE) मानदंडों के अनुसार परिवहन भत्ता प्रदान किया जाएगा।
  • बंद होने वाले विद्यालयों के सभी हेड मास्टर/शिक्षक/कर्मचारियों (मिड-डे मील के रसोईये सहित) की सेवा शर्तों में बदलाव किये बिना लीड स्कूल भेजा जाएगा।
  • विद्यालयों के विलय से संबंधित यदि वास्तविक चिंताएँ उत्पन्न होती हैं तो ज़िला कलेक्टरों को विलय रद्द करने के लिये अधिकृत किया गया है।
  • इस तरह के विद्यालय बंद होने के बाद विद्यालय से संबंधित भवन एवं अन्य बुनियादी ढाँचे को पंचायती राज एवं पेयजल विभाग को सौंप दिया जाएगा। 

विद्यालयों के विलय से लाभ:

  • विद्यालयों का समेकन छात्रों के लिये विद्यालयों को आकांक्षी (Aspirational) बना देगा, इसके परिणामस्वरूप  छात्र-शिक्षक अनुपात (Pupil-Teacher Ratio) में सुधार होगा। 
  • बेहतर बुनियादी ढाँचा सुविधाएँ, अतिरिक्त TLM (Teaching Learning Materials) सुविधाएँ, ई-लर्निंग एवं सह-पाठयक्रम सुविधाओं के साथ बेहतर शैक्षणिक वातावरण का विकास होगा।
  • इससे शिक्षकों पर प्रशासनिक बोझ में कमी के कारण शिक्षकों एवं छात्रों के लिये उपलब्ध शिक्षण एवं सीखने के समय में भी सुधार होगा।

सरकार के निर्णय का विरोध:

  • राज्य भर में माता-पिता एवं कार्यकर्त्ताओं ने सरकार के इस कदम का विरोध किया है। 
  • कार्यकर्त्ताओं का तर्क: कार्यकर्त्ताओं ने तर्क दिया है कि विद्यालयों को बंद करना या विलय करना RTE अधिनियम की धारा 3 व 8 का उल्लंघन है।
    • कार्यकर्त्ताओं का कहना है कि चुने गए विद्यालयों में से अधिकांश विद्यालय पहाड़ी इलाकों के आदिवासी क्षेत्रों से संबंधित हैं। एक गाँव में विद्यालयों को बंद करने से ड्रॉपआउट दर में वृद्धि होगी क्योंकि छात्रों को विद्यालय जाने के लिये दूर की यात्रा करना संभव नहीं होगा। विद्यालयों को बंद करने से पहले भौगोलिक बाधाओं पर भी विचार किया जाना चाहिये।
      • उदाहरण: देवगढ़ ज़िले के पुडापाड़ा (Pudapada) गाँव के एकमात्र प्राथमिक विद्यालय को दूसरे विद्यालय में विलय करने का निर्णय लिया गया। 
  • माता-पिता का तर्क: माता-पिता का कहना है कि हममें से अधिकांश अपने बच्चों को दादा-दादी के पास छोड़कर काम के लिये चले जाते हैं। गाँव में एक विद्यालय होने से यह सुनिश्चित होता है कि बच्चे नियमित रूप से कक्षाओं में भाग लेंगे। यदि विद्यालय दूर होगा तो छात्रों के लिये स्वयं यात्रा करना संभव नहीं होगा।
    • माता-पिता इस बात से भी चिंतित हैं कि अगर उनके बच्चे विद्यालय नहीं जाते हैं तो बच्चों को मिड-डे मील से भी वंचित कर दिया जाएगा।

ओडिशा में शिक्षा की स्थिति:

  • विद्यालयों को समेकित करने का निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब ओडिशा के विद्यालयों में छात्रों के नामांकन में गिरावट जारी है जहाँ करोड़ों रुपए मिड-डे मील, मुफ्त ड्रेस और मुफ्त पाठ्यपुस्तकों के तहत सरकारी विद्यालयों में प्रवेश हेतु बच्चों को प्रेरित करने के लिये खर्च किये जाते हैं। वहीं निजी विद्यालयों में नामांकन बढ़ रहा है।  
  • सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों एवं प्रधानाध्यापकों के खाली पड़े पदों ने शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित किया है।
  • पिछले महीने ओडिशा के विद्यालय एवं जन शिक्षा मंत्री ने विधानसभा को बताया कि राज्य के 46,332 प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों में से 18589 में हेडमास्टर नहीं हैं। 8076 हाई स्कूलों में 11588 सहायक शिक्षकों के पद रिक्त हैं।
  • नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशन रिसर्च एंड ट्रेनिंग’ (NCERT) द्वारा वर्ष 2018 में किये गए ‘नेशनल अचीवमेंट सर्वे’ (NAS) में देखा गया कि ओडिशा में केवल 53% छात्र ही बुनियादी दक्षताओं के आधार पर प्रश्नों का सही उत्तर दे पाए।
  • इसी तरह ग्रामीण संदर्भ में असर (ASER), 2018 की रिपोर्ट में खुलासा किया गया कि कक्षा 5 के केवल 33.1% छात्र 10 व 99 के बीच अंकगणतीय संख्या पहचान सकते हैं जबकि सिर्फ 24.5% छात्र संख्या को घटाना जानते हैं। 

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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