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मैनुअल स्कैवेंजिंग
- 28 Nov 2025
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चर्चा में क्यो?
कोलकाता उच्च न्यायालय ने कोलकाता के कूड़ाघाट क्षेत्र में वर्ष 2021 में हुई मैन्युअल स्कैवेंजिंग घटना में मृत चार सीवर कर्मचारियों में से प्रत्येक के लिये 30 लाख रुपए मुआवज़े का आदेश दिया, अधिकारियों की ‘गंभीर लापरवाही’ की निंदा की और सरकार को वर्ष 1993 से तय 10 लाख रुपये के पुराने मुआवज़ा मानकों को बढ़ाने का निर्देश दिया।
मैन्युअल स्कैवेंजिंग क्या है?
- परिचय: मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोज़गार का निषेध और उनका पुनर्वास (PEMSR) अधिनियम, 2013 के अनुसार, यह अस्वास्थ्यकर शौचालयों, खुली नालियों, गड्ढों, रेलवे पटरियों या किसी अन्य अधिसूचित स्थान से मानव मल को मैन्युअल रूप से साफ करने, ले जाने, निपटाने या सॅंभालने की प्रथा है।
- कानूनी ढाँचा: मैनुअल स्कैवेंजर्स का रोज़गार और शुष्क शौचालय का निर्माण (निषेध) अधिनियम, 1993 के बाद से भारत में इसे आधिकारिक तौर पर प्रतिबंधित कर दिया गया है।
- मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोज़गार का निषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013 मैनुअल स्कैवेंजरों के नियोजन पर प्रतिबंध लगाता है, उनका पुनर्वास सुनिश्चित करता है तथा प्रत्येक अपराध को संज्ञेय और गैर-ज़मानती बनाता है।
- अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989, अनुसूचित जातियों को मैन्युअल स्कैवेंजिंग में नियोजित करने को अपराध मानता है।
- मैन्युअल स्कैवेंजिंग मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, विशेष रूप से अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का उन्मूलन) और अनुच्छेद 21 (गरिमा के साथ जीवन का अधिकार)।
- सर्वोच्च न्यायालय (SC) के दिशा-निर्देश: सर्वोच्च न्यायालय ने डॉ. बलराम सिंह बनाम भारत संघ (2023) मामले में सीवर सफाई के पूर्ण यांत्रिकीकरण का आदेश दिया और उचित सुरक्षा उपकरणों के बिना मानव प्रवेश को केवल दुर्लभ मामलों में ही अनुमति दी।
- इसने सीवर में होने वाली मृत्यु के लिये पुनर्वास और त्वरित मुआवज़े को संवैधानिक अधिकार घोषित किया, राज्यों से NAMASTE और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के साथ सहायता को जोड़ने के लिये कहा तथा मृत्यु एवं लाभों को ट्रैक करने के लिये एक केंद्रीय पोर्टल बनाने की मांग की।
- वर्तमान स्थिति (2024 के अनुसार): भारत में कुल 766 ज़िलों में से 732 ज़िलों ने स्वयं को मैनुअल स्कैवेंजिंग मुक्त घोषित कर दिया है। इसके बावजूद वर्ष 2024 तक लगभग 58,000 मैनुअल स्कैवेंजर्स अभी भी पहचाने गए हैं।
मैन्युअल स्कैवेंजर्स को कौन-कौन सी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
- वंशानुगत असमर्थता: मैन्युअल स्कैवेंजिंग केवल एक रोज़गार नहीं है, यह एक ऐसा तंत्र है जो शारीरिक क्षमता, आत्मविश्वास और भविष्य की संभावनाओं को क्षति पहुँचाता है तथा पूरे परिवार को पीढ़ियों तक एक बंधन में बाँध देता है।
- स्वास्थ्य जोखिम: मानव मल और हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी ज़हरीली गैसों के संपर्क में आने से मैनुअल स्कैवेंजर हेपेटाइटिस, टेटनस, हैजा तथा दम घुटने जैसी बीमारियों (Asphyxiation) के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाते हैं।
- सामाजिक कलंक: उन्हें ‘अछूत’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है और वे गहरे जातिगत भेदभाव का सामना करते हैं, जो सामाजिक बहिष्करण तथा प्रणालीगत हाशियेकरण को मज़बूत करता है।
- अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) का कहना है कि महिला मैन्युअल स्कैवेंजर्स दोहरे भेदभाव (जाति और लैंगिक) का सामना करती हैं, जो आगे चलकर तीन तरह का बोझ (जाति, लैंगिक और अपमानजनक पेशा) बना देता है। यह उन्हें सबसे असुरक्षित एवं कलंकित कार्य में फँसा देता है और उनके सामाजिक तथा मानसिक स्वास्थ्य को और खराब करता है, जिससे दुश्चिंता, अवसाद व आत्मसम्मान में कमी जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
- आर्थिक चुनौतियाँ: न्यूनतम मज़दूरी से भी कम वेतन मिलने तथा प्रायः दैनिक मज़दूरी या संविदात्मक आधार पर कार्य करने के कारण, उनके पास नौकरी की सुरक्षा, सामाजिक संरक्षण और वैकल्पिक आजीविका के विकल्पों का अभाव है, जिसके कारण वे गरीबी में फँसे रहते हैं।
- मादक द्रव्यों का सेवन: कई लोग तनाव, अपमान और शारीरिक कठिनाई से निपटने के लिये शराब या नशीली दवाओं का सहारा लेते हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य तथा कल्याण पर और अधिक प्रभाव पड़ता है।
- विलंबित या नकारा गया मुआवज़ा: सीवर में होने वाली मृत्यु का मुआवज़ा प्राय: देर से मिलता है, विवादों में उलझ जाता है या असंगत रूप से वितरित किया जाता है। कई पीड़ितों को निर्धारित राशि से कहीं कम या बिल्कुल भी मुआवज़ा नहीं मिलता।
- यह समस्या पुराने मानकों के कारण और गंभीर हो जाती है जैसे वर्ष 1993 में तय किया गया 10 लाख रुपए का मुआवज़ा, जिसकी वास्तविक कीमत अब काफी कम हो चुकी है, जैसा कि कोलकाता उच्च न्यायालय ने भी रेखांकित किया है।
- संचालनात्मक चुनौती: आधुनिक सीवर-सफाई मशीनों को संचालित करने के लिये मैनुअल स्कैवेंजर्स को प्रशिक्षण की कमी, जिससे कौशल में अंतर, उपकरण का अपर्याप्त या गलत उपयोग और श्रमिकों को फिर से असुरक्षित मैनुअल सफाई में वापस धकेल दिया जाता है।
भारत में मैनुअल स्कैवेंजिंग को समाप्त करने हेतु निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं:
- पूर्ण यांत्रिकीकरण की ओर बदलाव: सुनिश्चित करना कि सीवर, सेप्टिक टैंक, नालियाँ, कीचड़ और अपशिष्ट की सफाई पूरी तरह से मशीनों द्वारा की जाए, इसके लिये सुव्यवस्थित सैनिटेशन रिस्पॉन्स यूनिट्स (SRUs) तथा प्रशिक्षित ऑपरेटर उपलब्ध कराए जाएँ।
- मज़बूत संस्थागत प्रणाली: हर ज़िले में एक ज़िम्मेदार स्वच्छता प्राधिकरण स्थापित करना, सभी नगरपालिकाओं में सैनिटेशन रिस्पॉन्स यूनिट्स (SRUs) का निर्माण करना और ब्लॉकेज तथा आपात स्थितियों की रिपोर्टिंग के लिये 24x7 हेल्पलाइन संचालित करना।
- कड़ा कानूनी प्रवर्तन: PEMSR अधिनियम, 2013 को सख्ती से लागू करना, सीवर में होने वाली मौतों को दोषपूर्ण हत्यारोपित मानना, उल्लंघनकर्त्ताओं को दंडित करना और समय पर मुआवज़ा सुनिश्चित करना।
- एकबारगी भुगतान से परे जाकर, प्रभावित परिवारों के लिये गौरवपूर्ण जीवन, सुरक्षित आजीविका और सामाजिक प्रगति सुनिश्चित करने वाले दीर्घकालिक मार्ग विकसित करना।
- नियमन और निगरानी: स्वच्छता कर्मचारियों और मैनुअल स्कैवेंजर्स के बीच कानूनी भेद बनाए रखना, निजी डीस्लजिंग ऑपरेटरों को नियंत्रित करना और NHRC की सिफारिशों के माध्यम से निगरानी मज़बूत करना।
- आर्थिक समर्थन: स्वच्छता उद्यमी योजना के तहत यांत्रिक सफाई उपकरण खरीदने के लिये सुलभ ऋण प्रदान करना और मैनुअल स्कैवेंजर्स के पुनर्वास तथा उद्यम समर्थन हेतु स्वयं रोज़गार योजना का दायरा बढ़ाना।
- PM-DAKSH के तहत अपशिष्ट प्रबंधन और मशीन संचालन के लिये कौशल प्रशिक्षण प्रदान करना और ULBs में रोज़गार एवं MGNREGA के तहत संबंधित कार्यों में प्राथमिकता सुनिश्चित करना।
निष्कर्ष:
मैनुअल स्कैवेंजिंग को समाप्त करने के लिये पूर्ण मशीनीकरण, कड़े प्रवर्तन और सम्मानजनक पुनर्वास की आवश्यकता है ताकि जाति-आधारित शोषण को खत्म किया जा सके। मज़बूत संस्थान और सुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ SDG 6 (स्वच्छ जल और स्वच्छता) तथा SDG 8 (सम्मानजनक कार्य) को आगे बढ़ाएँगी, जिससे भारत सभी के लिये गरिमा और समानता सुनिश्चित कर सकेगा।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न प्रश्न: भारत में मैनुअल स्कैवेंजिंग को समाप्त करने में PEMSR अधिनियम, 2013 की पर्याप्तता का परीक्षण करें। इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिये किन सुधारों की आवश्यकता है? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. PEMSR अधिनियम, 2013 क्या है?
हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों (मैनुअल स्कैवेंजिंग) के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013 हाथ से मैला ढोने वालों के नियोजन पर प्रतिबंध लगाता है, अपराधों को संज्ञेय (cognizable) और गैर-जमानती (non-bailable) बनाता है तथा पुनर्वास के उपायों को अनिवार्य करता है।
2. डॉ. बलराम सिंह बनाम भारत संघ (2023) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश क्या हैं?
सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने ताजा राष्ट्रीय सर्वेक्षण कराने, सीवर सफाई का पूर्ण मशीनीकरण (मानव प्रवेश केवल अपवादजनक मामलों में), अनिवार्य PPE ( व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण), त्वरित मुआवज़ा और पुनर्वास तथा मौतों और लाभों को ट्रैक करने के लिये एक केंद्रीय पोर्टल बनाने का आदेश दिया।
3. हाथ से मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने के लिये मशीनीकरण क्यों आवश्यक है?
मशीनीकरण (SRUs - सीवर सफाई इकाइयाँ, मशीनें, प्रशिक्षित ऑपरेटर) सीवर में मानव प्रवेश की आवश्यकता को समाप्त करता है, स्वास्थ्य जोखिमों को कम करता है, कानून के अनुपालन को सुनिश्चित करता है तथा सुरक्षा-अनुरूप बड़े पैमाने पर स्वच्छता सेवाएँ प्रदान करता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न:
प्रिलिम्स:
प्रश्न: 'राष्ट्रीय गरिमा अभियान' एक राष्ट्रीय अभियान है, जिसका उद्देश्य है: (2016)
(a) बेघर एवं निराश्रित व्यक्तियों का पुनर्वास और उन्हें आजीविका के उपयुक्त स्रोत प्रदान करना।
(b) यौनकर्मियों को उनके अभ्यास से मुक्त करना और उन्हें आजीविका के वैकल्पिक स्रोत प्रदान करना।
(c) हाथ से मैला ढोने की प्रथा को खत्म करना और हाथ से मैला ढोने वालों का पुनर्वास करना।
(d) बंधुआ मज़दूरों को मुक्त करना और उनका पुनर्वास करना।
उत्तर: (c)
मेन्स:
प्रश्न. निरंतर उत्पन्न किये जा रहे, फेंके गए ठोस कचरे की विशाल मात्राओं का निस्तारण करने में क्या-क्या बाधाएँ हैं? हम अपने रहने योग्य परिवेश में जमा होते जा रहे ज़हरीले अपशिष्टों को सुरक्षित रूप से किस प्रकार हटा सकते हैं? (2018)
प्रश्न. "जल, स्वच्छता और स्वच्छता आवश्यकताओं को संबोधित करने वाली नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिये लाभार्थी वर्गों की पहचान को प्रत्याशित परिणामों के साथ समन्वित किया जाना है।" WASH योजना के संदर्भ में कथन की जाँच कीजिये। (2017)

