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कुइझोउ-11

  • 15 Jul 2020
  • 11 min read

प्रीलिम्स के लिये:

कुइझोउ-11, तियानवेन-1, लॉन्ग मार्च 5 रॉकेट, तियांगोंग, स्पेसएक्स (SpaceX), भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्द्धन एवं प्राधिकरण केंद्र

मेन्स के लिये:

अंतरिक्ष का व्यावसायीकरण एवं भारत के लिये एक अवसर

चर्चा में क्यों?

हाल ही में कुइझोउ-11 (Kuaizhou-11) नाम का चीनी रॉकेट उड़ान के दौरान आई खराबी के कारण विफल हो गया जिसके कारण अंतरिक्ष में ले जाए जा रहे दो उपग्रह भी नष्ट हो गए।

प्रमुख बिंदु:

  • चीनी भाषा में कुइझोउ (Kuaizhou) का अर्थ ‘तेज़ जहाज़’ (Fast Ship) होता है। यह एक कम लागत वाला ठोस ईंधन वाहक रॉकेट है।
  • इस चीनी रॉकेट का वाणिज्यिक लॉन्च ‘फर्म एक्सपेस’ (Firm Expace) द्वारा संचालित किया गया था। गौरतलब है कि इसे वर्ष 2018 में लॉन्च करने की योजना बनाई गई थी।
  • इसे KZ-11 के रूप में भी जाना जाता है। इसमें 70.8 टन की वहनीय भार क्षमता थी और इसे पृथ्वी की निचली एवं सूर्य-तुल्यकालिक कक्षा के उपग्रहों को लॉन्च करने के लिये डिज़ाइन किया गया था।

चीन के अन्य महत्त्वपूर्ण मिशन:

  • तियानवेन-1 (Tianwen-1): चीन का यह मंगल मिशन जुलाई, 2020 तक शुरू किया जाएगा। चीन का पिछला यिंगहुओ-1 (Yinghuo-1) मंगल मिशन जिसे रूस द्वारा समर्थन दिया गया था, वर्ष 2012 में विफल हो गया था। तियानवेन-1 में लॉन्ग मार्च 5 रॉकेट (Long March 5 Rocket) का प्रयोग किया जाएगा।
  • लॉन्ग मार्च 5 रॉकेट (Long March 5 Rocket): इसे एक स्थायी अंतरिक्ष स्टेशन का संचालन करने तथा चंद्रमा पर अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने के लिये चीन के सफल कदम के रूप में माना जाता है।
  • तियांगोंग (Tiangong): वर्ष 2022 तक चीन अपना स्पेस स्टेशन (तियांगोंग) बनाने का कार्य पूरा कर लेगा। चीनी भाषा में तियांगोंग (Tiangong) का अर्थ 'हैवेनली पैलेस' (Heavenly Palace) है।

महत्त्व:

  • यद्यपि यह प्रक्षेपण विफल रहा किंतु यह चीन में तेज़ी से बढ़ते वाणिज्यिक अंतरिक्ष उद्योग (Commercial Space Industry) को दर्शाता है।
  • विश्लेषक बताते है कि वाणिज्यिक प्रक्षेपण चीन में एक उभरता हुआ उद्योग है। चीनी सरकार द्वारा वर्ष 2014 में अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी निवेश के लिये आसान बनाये गए नियमों के बाद अस्तित्त्व में आई एक्सपेस (Expace), आईस्पेस (iSpace) और लैंडस्पेस (Landspace) जैसी कंपनियाँ अपने पारंपरिक लॉन्च ऑपरेशन के लिये प्रक्रिया क्षमताओं का तीव्र विकास करने पर ज़ोर दे रही हैं।
    • इसने चीनी सरकार एवं वाणिज्यिक ग्राहकों दोनों के लिये अधिक लाभ प्रदान किया है।

अंतरिक्ष का व्यावसायीकरण एवं भविष्य में भारत और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा की संभावना:

  • कम लागत वाले वाहक रॉकेटों के विकास को इस पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिये कि चीन ‘वैश्विक अंतरिक्ष प्रक्षेपण बाज़ार’ को आकर्षित करने हेतु भारत के साथ प्रतिस्पर्द्धा करने के लिये तैयार है।
  • वर्ष 2017 में चीनी मुख्य पत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, चीन का वाणिज्यिक अंतरिक्ष उद्योग भारत से पीछे है।
  • गौरतलब है कि भविष्य में चीनी रॉकेटों को उपग्रह बाज़ार में अपने लिये एक जगह बनानी होगी जहाँ भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (Indian Space Research Organisation- ISRO) पहले ही एक मुकाम हासिल कर चुका है।
    • इसरो के प्रयासों एवं विश्वसनीय ‘ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान’ (Polar Satellite Launch Vehicle- PSLV) से अब तक 297 विदेशी उपग्रहों को लॉन्च किया गया है और इसके विभिन्न संस्करण हैं जो विभिन्न आकार के पेलोड और भिन्न-भिन्न कक्षाओं में उपग्रहों को ले जाने की क्षमता रखते हैं।
  • लघु उपग्रह क्रांति (Small Satellite Revolution):

    • गौरतलब है कि इस समय वैश्विक स्तर पर ‘लघु उपग्रह क्रांति’ (Small Satellite Revolution) चल रही है जिसके तहत वर्ष 2020 और वर्ष 2030 के बीच 17000 छोटे उपग्रहों को लॉन्च किये जाने की उम्मीद है।

अंतरिक्ष पर्यटन एवं भारत:

  • अंतरिक्ष पर्यटन क्या है?

    • अंतरिक्ष पर्यटन मनोरंजक उद्देश्यों के लिये मानव की अंतरिक्ष यात्रा से संबंधित है। अंतरिक्ष पर्यटन के कई अलग-अलग प्रकार हैं जिसमें कक्षीय (Orbital), उप-कक्षीय (Suborbital) और चंद्र अंतरिक्ष पर्यटन (Lunar Space Tourism) शामिल हैं।
      • वर्तमान में कक्षीय (Orbital) अंतरिक्ष पर्यटन के लिये केवल रूसी अंतरिक्ष एजेंसी ही कार्य कर रही है।
  • भारत के लिये अवसर:

    • आर्थिक तौर पर कुशल लॉन्च वाहनों के अलावा भारत को निजी क्षेत्र की भागीदारी के माध्यम से अंतरिक्ष पर्यटन के क्षेत्र में भी संभावनाओं की तलाश करनी चाहिये।
    • इस क्षेत्र में निजी भागीदारी को आकर्षित करने के लिये एक नीतिगत ढाँचा भारत सरकार द्वारा तैयार किया जाना चाहिये।
    • अंतरिक्ष पर्यटन के क्षेत्र में भारत यदि नीतिगत दृष्टिकोण से आगे बढ़ता है तो यह क्षेत्र आने वाले समय में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये एक अहम क्षेत्र साबित होने के साथ-साथ भारत को ‘वैश्विक/क्षेत्रीय सामरिक भागीदारी’ में बढ़त दिला सकता है।

अंतरिक्ष क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा:

  • संयुक्त राज्य अमेरिका: हाल ही में स्पेसएक्स (SpaceX) ‘मानव स्पेसफ्लाइट’ को अंतरिक्ष में लॉन्च करने वाली पहली निजी कंपनी बन गई। अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) में नासा के अंतरिक्ष यात्रियों को सफलतापूर्वक ले जाने के लिये अंतरिक्ष यान क्रू ड्रैगन (Crew Dragon) का उपयोग किया गया।
  • सिंगापुर: यह पूर्वी एशियाई देश अपने वैध वातावरणीय क्षेत्र, कुशल जनशक्ति की उपलब्धता एवं भूमध्यरेखीय स्थान की अनुकूलता के आधार पर अंतरिक्ष उद्यमिता के एक केंद्र के रूप में खुद को पेश कर रहा है।
  • न्यूज़ीलैंड: यह प्रशांत महासागरीय देश निजी रॉकेट लॉन्च के लिये सटीक अवस्थिति होने के कारण स्वयं को वैश्विक स्तर पर आगे कर रहा है।

भारत द्वारा अंतरिक्ष उद्यमिता के लिये उठाए गए कदम:

  • भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्द्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (Indian National Space Promotion and Authorization Centre- IN-SPACe) द्वारा निजी कंपनियों को अवसर प्रदान करने के लिये स्वीकृति देना।
  • न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड’ (New Space India Limited- NSIL), भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (Indian Space Research Organisation) की नव निर्मित दूसरी वाणिज्यिक शाखा है।
    • यह ‘एंट्रिक्स कॉर्पोरेशन’ के बाद इसरो की दूसरी व्यावसायिक शाखा है। एंट्रिक्स कॉर्पोरेशन को मुख्य रूप से वर्ष 1992 में इसरो के विदेशी उपग्रहों के वाणिज्यिक प्रक्षेपण की सुविधा हेतु स्थापित किया गया था।
  • इसरो वैश्विक स्तर पर कई मोर्चों में अंतरिक्ष मिशनों के लिये कम लागत में मिशन पूरा करने वाला अग्रणी संस्थान है। लागत-प्रभावशीलता ने इसे उपग्रह प्रक्षेपण सेवाओं के वाणिज्यिक क्षेत्र में एक अलग बढ़त दी है।
  • देश के भीतर विशेषज्ञता के ऐसे मूल्यवान आधार के साथ एक निजी अंतरिक्ष उद्योग के उद्भव की उम्मीद करना स्वाभाविक है जो वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्द्धी साबित हो सकता है।

आगे की राह:

  • अंतरिक्ष से संबंधित गतिविधियों में बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा, जटिलता एवं मांग के साथ यह आवश्यक है कि अंतरिक्ष क्षेत्र के समग्र विकास को सुनिश्चित करने के लिये एक राष्ट्रीय कानून होना चाहिये।
  • भारत के लिये एक नया राष्ट्रीय अंतरिक्ष कानून आने वाले दशक में वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की बढ़ती हिस्सेदारी को सुविधाजनक बनाने के उद्देश्य से पूरा किया जाना चाहिये।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

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