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भारत में गरीबी की स्थिति दर्शाती VNR रिपोर्ट

  • 15 Jul 2020
  • 9 min read

प्रीलिम्स के लिये:

VNR रिपोर्ट, SDG लक्ष्य, बहुआयामी गरीबी सूचकांक, अत्यधिक गरीबी, भारत का सामाजिक सेवाओं पर व्यय 

मेन्स के लिये:

भारत में गरीबी उन्मूलन के प्रयास 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ‘नीति आयोग’ ने सतत् विकास, 2020 को लेकर डिजिटल माध्यम से आयोजित संयुक्त राष्ट्र उच्च स्तरीय राजनीतिक मंच (United Nations High-level Political Forum-HLPF) पर दूसरी ‘स्वैच्छिक राष्ट्रीय समीक्षा’ (Voluntary National Review-VNR) जारी की है।

प्रमुख बिंदु:

  • VNR समीक्षा रिपोर्ट स्वैच्छिक रूप से देशों द्वारा स्वयं तैयार की जाती है, जिसका उद्देश्य ‘सतत विकास एजेंडा’ को लागू करने में मिली सफलताओं और चुनौतियों समेत इस संबंध में प्राप्त सभी अनुभवों को साझा करने की सुविधा प्रदान करना है।
  • सतत् विकास लक्ष्य’- 1 अर्थात गरीबी की समाप्ति (NO POVERTY) है, जिसका लक्ष्य गरीबी को इसके सभी रूपों में हर जगह से समाप्त करना है। 
  • VNR रिपोर्ट में प्रस्तुत अनुमान, जुलाई 2019 'बहुआयामी गरीबी सूचकांक' (Multidimensional Poverty Index- MPI) के आधार पर तैयार किये गए थे।

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VNR रिपोर्ट और 'बहुआयामी गरीबी':

  • भारत द्वारा प्रस्तुत VNR रिपोर्ट के अनुसार, भारत में वर्ष 2005-06 से वर्ष 2016-17 के बीच की अवधि में कम-से-कम 271 मिलियन लोगों को 'बहुआयामी गरीबी' (Multi-dimensional Poverty) से बाहर निकाला गया है।
  • वैश्विक MPI के अनुसार, वर्ष 2005-2006 में पूरे भारत में 640 मिलियन से अधिक लोग बहुआयामी गरीबी में थे। वर्ष 2016-2017 तक गरीबी में रहने वाले लोगों की संख्या घटकर 369.55 मिलियन हो गई।
  • अनुमान के मुताबिक वर्ष 2016-17 में भारत की 27.9 फीसदी आबादी गरीब थी। 
  • शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में तेज़ी से गरीबी में कमी आई है।

विश्व बैंक के अनुमान

  • विश्व बैंक की अंतर्राष्ट्रीय गरीबी रेखा जो; 'अत्यधिक गरीबी' (Extreme Poverty) का आकलन करती है, के अनुसार यह भारत में वर्ष 2011 के 21.2 प्रतिशत से घटकर वर्ष 2015 में 13.4 प्रतिशत हो गई। 
  • विश्व बैंक गरीबी को निरपेक्ष रूप से परिभाषित करता है। विश्व बैंक के अनुसार, प्रति दिन 1.90 अमेरिकी डॉलर से कम पर आय स्तर पर जीवन को अत्यधिक गरीबी के रूप में परिभाषित किया गया है।

'बहुआयामी गरीबी सूचकांक' (MPI):

  • बहुआयामी गरीबी सूचकांक में ‘गैर-आय आधारित आयामों’ (Non-income Based Dimensions) के आधार पर गरीबी का मापन किया जाता है, ताकि गरीबी और अभाव की स्थिति का अधिक व्यापक मूल्यांकन किया जा सके।
  • इस सूचकांक को ‘संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम’ (United Nations Development Programme- UNDP) और ‘ऑक्सफोर्ड गरीबी एवं मानव विकास पहल’ (Oxford Poverty and Human Development Initiative- OPHI) द्वारा विकसित किया गया है। 
  • इसे UNDP के 'मानव विकास रिपोर्ट कार्यालय' द्वारा प्रकाशित किया जाता है, जो तीन आयामों और 10 संकेतकों की वंचनाओं पर आधारित  है;

आयाम

संकेतक

स्वास्थ्य 

बाल मृत्यु दर

पोषण

शिक्षा 

स्कूली शिक्षा  

नामांकन

जीवन स्तर 

जल

स्वच्छता

बिजली

खाना पकाने का ईंधन

फर्श

संपत्ति।

भारत सरकार द्वारा उठाए गए कदम:

  • भारत त्वरित आर्थिक विकास और व्यापक सामाजिक सुरक्षा उपायों के माध्यम से अपने सभी रूपों में गरीबी को समाप्त करने के लिये एक व्यापक विकास रणनीति लागू कर रहा है।

राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम:

  • भारत में सामाजिक सुरक्षा की दिशा में 'राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम' के तहत कई लक्षित पेंशन योजनाओं के माध्यम से बुजुर्गों सहित विकलांग वर्गों, बच्चों, महिलाओं और विधवाओं को कवर किया जा रहा है।

रोज़गार सुरक्षा:

आधारभूत सेवाओं तक पहुँच:

आजीविका और कौशल संबंधी कार्यक्रम:

भारत सरकार सामाजिक सेवाओं पर व्यय:

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गरीबी समाप्ति के समक्ष चुनौतियाँ:

क्षेत्रीय भिन्नता: 

  • भारत की अधिकांश गरीब जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों और कम आय वाले राज्यों में निवास करती है। गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के अनुपात के मामले में राज्यों के बीच अंतर है। छत्तीसगढ़ में 39.9 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं, जबकि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में यह मात्र 1 प्रतिशत है।

गरीबी का महिलाकरण (Feminisation of Poverty): 

  • गरीबी का महिलाकरण, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्र की एक और चुनौती है। गरीबी पुरुषों की तुलना में महिलाओं को अधिक प्रभावित करती है क्योंकि महिलाओं के पास संसाधनों तक सीमित पहुँच होती है, चाहे वह खाद्य और पोषण संबंधी सुरक्षा हो, या स्वास्थ्य देखभाल और सार्वजनिक सेवाओं तक पहुँच या संपत्ति में स्वामित्त्व हो।

तीव्र शहरीकरण: 

  • तीव्र नगरीकरण अपने साथ अनेक आर्थिक संभावाओं के साथ अनेक चुनौतियाँ लेकर आया है। आवास, बुनियादी ढाँचे, रोज़गार और अन्य आर्थिक अवसरों तथा सेवाओं में मांग-आपूर्ति अंतराल लगातार बढ़ रहा है।

मानव संसाधन विकास:

  • नवीन ज्ञान और प्रौद्योगिकी कौशल, कार्य और रोज़गार की पारंपरिक संरचनाओं को बहुत तेज़ी से बदल रही हैं, अत: शिक्षा और कौशल विकास को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। 

निष्कर्ष:

  • भारत को SDG लक्ष्य-1 की प्राप्ति की दिशा में अपने प्रयासों को अधिक तेज़ी से चलाने की आवश्यकता है। SDG लक्ष्य- 1 के तहत लक्ष्यों की प्राप्ति में तेज़ी लाने में निजी क्षेत्र, नागरिक समाज और ‘सहकारी संघवाद’ प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं।

स्रोत: डाउन टू अर्थ

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