सामाजिक न्याय
भारत में धार्मिक प्रथाओं की न्यायिक निगरानी
- 16 Feb 2026
- 79 min read
प्रिलिम्स के लिये: आवश्यक धार्मिक आचरणों (ERP) का परीक्षण, अनुच्छेद 25 और 26, विधि का शासन
मेन्स के लिये: भारत में धार्मिक आचरणों को नियंत्रित करने में न्यायपालिका की भूमिका, आवश्यक धार्मिक आचरणों (ERP) का परीक्षण: विकास, महत्त्व और आलोचना
चर्चा में क्यों?
थिरुपरनकुंद्रम दीपथून विवाद और काँचीपुरम वरदराज पेरूमल मंदिर में तेन्कलै संप्रदाय के भजन-पाठ के अधिकार से जुड़े मामलों में मद्रास उच्च न्यायालय के फैसलों ने धार्मिक मामलों में न्यायपालिका की बढ़ती भूमिका को उजागर किया है।
- ये मामले धार्मिक रीति‑रिवाज़ों को लेकर उत्पन्न विवादित प्रथाओं का मूल्यांकन करने के लिये संवैधानिक न्यायालयों द्वारा प्रयुक्त मूलभूत आवश्यक धार्मिक आचरणों (ERP) के परीक्षण की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करते हैं।
भारत में धार्मिक विवाद कैसे विकसित हुए?
- नागरिक अधिकारों का काल: 100 वर्ष से भी पूर्व मंदिर प्रवेश के विवादों को नागरिक अधिकार के मुद्दों के रूप में माना जाता था।
- शंकरलिंगा नाडन बनाम राजा राजेश्वर दोराई (1908) मामले में, लंदन की प्रिवी काउंसिल ने इस पर विचार किया कि क्या नाडर समुदाय को कमुधी मंदिर में प्रवेश का अधिकार है। यह नागरिक कानून के दायरे में पहुँच और पूजा के लिये व्यापक संघर्षों को दर्शाता है।
- विधायी निरीक्षण: वर्ष 1927 में मद्रास प्रेसीडेंसी ने हिंदू धार्मिक बंदोबस्ती अधिनियम पेश किया। इसके अंतर्गत मंदिर कोष के लेखांकन और स्थानीय समितियों की स्थापना की प्रक्रिया शुरू हुई, जिससे प्रेसीडेंसी सरकार की पर्यवेक्षी भूमिका स्थापित हुई।
- संवैधानिक परिवर्तन: वर्ष 1950 में संविधान को अपनाने के साथ अनुच्छेद 25 और 26 ने धर्म का पालन करने और प्रचार करने का अधिकार प्रदान किया।
- हालाँकि, इन अधिकारों को सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता के अधीन रखा गया था, जिससे राज्य को उन प्रथाओं में हस्तक्षेप करने की अनुमति मिली जो सार्वजनिक चेतना को आहत करती थीं।
भारत में आवश्यक धार्मिक आचरणों की न्यायिक व्याख्या कैसे विकसित हुई?
- आवश्यक धार्मिक आचरणों (ERP) का परीक्षण: यह भारतीय न्यायपालिका द्वारा उपयोग किया जाने वाला एक विधिक सिद्धांत है, जिसका उद्देश्य यह निर्धारित करना है कि कौन-सी धार्मिक प्रथा किसी धर्म के लिये "अनिवार्य" हैं और इसलिये यह अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संवैधानिक संरक्षण का हकदार है।
- यदि कोई धार्मिक आचरण "अनिवार्य अभिन्न अंग" (जैसे– सिख धर्म में गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ) पाया जाता है, तो उसे संरक्षण प्राप्त होता है। राज्य इसे आसानी से विनियमित या प्रतिबंधित नहीं कर सकता।
- यदि कोई आचरण सामाजिक, आर्थिक या व्यावसायिक प्रकृति का है, भले ही वह धर्म से संबंधित हो, तो उसे "पंथनिरपेक्ष" माना जाता है। राज्य के पास सामाजिक सुधार के लिये इन्हें विनियमित करने का अधिकार है।
- विकास:
- शिरूर मठ मामला (1954): भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने स्थापित किया कि "आवश्यक" क्या है, इसका निर्णय स्वयं उस धर्म के सिद्धांतों के आधार पर किया जाना चाहिये।
- दरगाह समिति मामला (1961): सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि अंधविश्वासी मान्यता या "गैर-आवश्यक तत्त्व" संविधान द्वारा संरक्षित नहीं हैं।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 26 के तहत संरक्षण केवल उन धार्मिक प्रथाओं तक सीमित है जो धर्म का अनिवार्य और अभिन्न अंग हैं।
- आनंद मार्ग मामला (2004): न्यायालय ने निर्णय दिया कि कोई भी प्रथा तभी अनिवार्य मानी जा सकती है जब उसकी अनुपस्थिति से धर्म का स्वरूप मौलिक रूप से बदल जाए।
- शायरा बानो मामला (2017): सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि 'तीन तलाक' इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है।
- इसमें कहा गया कि कोई प्रथा जो केवल ‘अनुमत’ है, लेकिन ‘अनिवार्य’ नहीं है, उसे आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं माना जा सकता।
- सबरीमाला मंदिर (2018): न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि यदि कोई प्रथा ‘आवश्यक’ मानी भी जाती हो, तब भी उसे संरक्षण नहीं दिया जा सकता, यदि वह संवैधानिक नैतिकता (समता, गरिमा और स्वतंत्रता) का उल्लंघन करती है।
- थिरुपरनकुंड्रम दीपाठून रूलिंग (2026): मद्रास उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि संभावित सांप्रदायिक तनाव की आशंका मात्र के आधार पर राज्य प्रशासन किसी दीर्घकालिक धार्मिक अनुष्ठान पर प्रतिबंध नहीं लगा सकता।
- इसमें न्यायालय ने यह कहा कि प्रशासन का दायित्व धार्मिक अनुष्ठानों को सुगम बनाना है, न कि सुरक्षा का बहाना बनाकर उन्हें प्रतिबंधित करना।
- कांचीपुरम वरदराज पेरूमल मंदिर (2026): न्यायालय ने थेंकलई संप्रदाय के भजन-पाठ (अध्यापक मिरासी) का नेतृत्व करने के विशेष अधिकार को मान्यता दी।
- इसमें न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि किसी व्यक्ति का पूजा करने का अधिकार (अनुच्छेद 25) किसी संप्रदाय को अनुच्छेद 26 के तहत प्राप्त धार्मिक संप्रदायिक अधिकारों तथा स्थापित अनुष्ठानिक पदों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
धर्म की स्वतंत्रता से संबंधित संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 25: यह अंत:करण की स्वतंत्रता तथा धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 26: यह धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक कार्यों के प्रबंधन की स्वतंत्रता देता है।
- अनुच्छेद 27: यह किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि के लिये करों के संदाय के बारे में स्वतंत्रता प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 28: यह कुछ शिक्षा संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थिति होने के संबंध में स्वतंत्रता प्रदान करता है।
भारत में ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ (ERP) संबंधी न्यायिक सिद्धांत की आलोचनाएँ क्या हैं?
- न्यायिक विशेषज्ञता का अभाव: न्यायालय कभी-कभी ऐसे धर्मशास्त्रीय प्रश्नों में प्रवेश कर जाते हैं जिनमें विशेष धार्मिक-दार्शनिक विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है, फलस्वरूप निर्णय धार्मिक दृष्टि से विवादित हो सकते हैं।
- ERP परीक्षण में असंगति: विभिन्न पीठों द्वारा क्या ‘अनिवार्य’ है इस प्रश्न पर अलग-अलग निष्कर्ष दिये जाने से सैद्धांतिक अनिश्चितता उत्पन्न होती है और न्यायिक स्थिरता प्रभावित होती है।
- संप्रदायिक स्वायत्तता बनाम संवैधानिक नैतिकता का टकराव: अनुच्छेद 26 के अंतर्गत प्रदत्त संप्रदायिक स्वायत्तता और समानता-गरिमा जैसे संवैधानिक मूल्यों के मध्य संतुलन स्थापित करने की प्रक्रिया को कभी-कभी ‘धर्मनिरपेक्ष अभिभावकवाद’ (Secular Paternalism) के रूप में देखा जाता है।
- क्रियान्वयन संबंधी बाधाएँ: प्रमुख निर्णयों (जैसे–सबरीमाला) के बाद स्थानीय प्रतिरोध, सामाजिक बहिष्कार और संस्थागत असहयोग के कारण न्यायिक आदेशों का प्रभावी पालन कठिन हो जाता है।
- कार्यपालिका के लिये धार्मिक सुधारों को लागू करना प्रायः कठिन हो जाता है, क्योंकि इससे गंभीर विधि-व्यवस्था की समस्याएँ उत्पन्न होने की आशंका रहती है। परिणामस्वरूप ऐसी स्थिति बनती है जहाँ न्यायालय निर्णय तो दे देता है, परंतु समाज उसे स्वीकार नहीं करता और कानून व्यवहार में ‘निष्प्रभावी’ (Dead Letter) बनकर रह जाता है।
- राजनीतीकरण का जोखिम: चर्चित धार्मिक मामलों में दिये गए न्यायिक निर्णयों का प्रायः राजनीतीकरण हो जाता है, जहाँ विभिन्न पक्ष न्यायालय के निष्कर्षों का उपयोग जनसमर्थन जुटाने या सामाजिक विभाजनों को दृढ़ करने के लिये करते हैं।
- धार्मिक विवादों में न्यायपालिका की निरंतर संलग्नता कभी-कभी उसकी ‘पंथनिरपेक्ष निष्पक्षता’ की छवि को भी प्रभावित कर सकती है।
धार्मिक विवादों के प्रति न्यायिक दृष्टिकोण में कौन-से सुधार अपेक्षित हैं?
- सिद्धांताधारित दूरी: न्यायपालिका को ‘सिद्धांताधारित दूरी’ (Principled Distance) की नीति अपनानी चाहिये, अर्थात वह केवल उन्हीं स्थितियों में हस्तक्षेप करे जब कोई धार्मिक प्रथा मानव गरिमा और समता के मूल तत्त्वों का उल्लंघन करती हो।
- 21वें विधि आयोग (2018) ने ‘ऊपर से थोपे गए सुधार’ के बजाय ‘भीतर से सुधार’ पर बल दिया तथा व्यक्तिगत विधियों में संशोधन कर भेदभावपूर्ण प्रावधानों को समाप्त करने, लैंगिक पक्षपात को दूर करने और समानता सुनिश्चित करने की वकालत की।
- स्पष्ट और सुसंगत आवश्यक धार्मिक प्रथा (ERP) मानदंड अपनाए जाएँ तथा अनुष्ठानों के सूक्ष्म प्रबंधन के बजाय मूलभूत संवैधानिक सिद्धांतों पर ध्यान केंद्रित किया जाए।
- प्रशासनिक प्रशिक्षण: मंदिर प्रबंधन समितियों और सरकारी विभागों के सदस्यों को संवैधानिक साक्षरता में प्रशिक्षित किया जाना चाहिये, ताकि प्रशासनिक निर्णय अनुच्छेद 26 के तहत संरक्षित सांप्रदायिक स्वायत्तता का उल्लंघन न करें।
- सांप्रदायिक संवाद: प्रतिद्वंद्वी संप्रदायों (जैसे–काँचीपुरम में थेंकलाई और वाडाकलाई) के बीच नियमित संवाद को बढ़ावा देना, ताकि वह ध्रुवीकरण रोका जा सके, जो दशकों तक चलने वाले मुकदमों का कारण बनता है।
- संवैधानिक मानसिकता को बढ़ावा देना: शैक्षिक पाठ्यक्रम ऐसा नागरिक तैयार करें जो अपने अंतःकरण की स्वतंत्रता और कानून के शासन दोनों को महत्त्व दे और यह समझे कि धर्म और संविधान में संघर्ष नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान का संबंध है।
निष्कर्ष
संविधान का “गर्भगृह” में प्रवेश धर्म के स्थानापन्न होने का संकेत नहीं, बल्कि उसका सुधार दर्शाता है। यह सुनिश्चित करके कि धार्मिक प्रथाएँ संविधान की नींव से जुड़ी रहें, न्यायपालिका धर्म की आध्यात्मिक सार्थकता की रक्षा करती है और उन तत्त्वों को समाप्त करती है जो मानव गरिमा को हानि पहुँचाते हैं।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. आवश्यक धार्मिक आचरण परीक्षण का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। क्या इसने भारत में संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता को मज़बूत किया है या कमज़ोर? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. आवश्यक धार्मिक प्रथाएँ (ERP) परीक्षण क्या है?
यह एक न्यायिक सिद्धांत है, जिसका उपयोग यह निर्धारित करने के लिये किया जाता है कि कोई प्रथा धर्म का अभिन्न हिस्सा है या नहीं और इसलिये इसे अनुच्छेद 25 और 26 के तहत संरक्षण प्राप्त है।
2. भारत में धार्मिक स्वतंत्रता को कौन-से संवैधानिक प्रावधान नियंत्रित करते हैं?
अनुच्छेद 25 और 26 धार्मिक स्वतंत्रता और सांप्रदायिक अधिकारों की गारंटी देते हैं, हालाँकि ये सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य, नैतिकता और अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन हैं।
3. सबरीमाला निर्णय (2018) का महत्त्व क्या था?
सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि सत्ता में धर्म की अनिवार्य प्रथाएँ भी संवैधानिक नैतिकता, विशेष रूप से समानता और गरिमा, के ऊपर नहीं हो सकतीं।
4. मंदिर प्रशासन में HRCE कानूनों की भूमिका क्या है?
हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ संपत्ति (HRCE) कानून राज्य को मंदिर प्रशासन, वित्त तथा प्रबंधन की निगरानी करने में सक्षम बनाते हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)
मेन्स:
प्रश्न. धर्मनिरपेक्षतावाद की भारतीय संकल्पना धर्मनिरपेक्षतावाद के पाश्चात्य माडल से किन-किन बातों में भिन्न है? चर्चा कीजिये।