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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

IRNSS-नाविक: इसरो

  • 22 Nov 2021
  • 7 min read

प्रिलिम्स के लिये:

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, नाविक, अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन

मेन्स के लिये:

नाविक की कार्यप्रणाली एवं इसकी उपयोगिता

चर्चा में क्यों?

हाल ही में उपराष्ट्रपति ने इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) को भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली (NaVIC-नाविक) को वैश्विक उपयोग के लिये बनाने का सुझाव दिया है।

प्रमुख बिंदु

  • पृष्ठभूमि:
    • इस परियोजना को भारत सरकार द्वारा वर्ष 2006 में अनुमोदित किया गया था और इसके वर्ष 2015-16 तक पूरा और कार्यान्वित होने की उम्मीद थी।
    • इसका पहला उपग्रह (IRNSS-1A) 1 जुलाई, 2013 को और सातवें व अंतिम उपग्रह (IRNSS-1G) को 28 अप्रैल, 2016 को लॉन्च किया गया था।
      • IRNSS-1G के अंतिम प्रक्षेपण के साथ भारत के प्रधानमंत्री द्वारा IRNSS का नाम बदलकर नाविक- NavIC (Navigation in Indian Constellation) कर दिया गया।
  • परिचय:
    • वर्तमान में IRNSS में आठ उपग्रह हैं, जिसमें भूस्थिर कक्षा में तीन उपग्रह और भू-समकालिक कक्षा में पाँच उपग्रह शामिल हैं।
      • IRNSS-1I के IRNSS-1A की जगह लेने की उम्मीद है, जो अपनी तीन रूबिडियम परमाणु घड़ियों के विफल होने के बाद अप्रभावी हो गया था।
    • इसका मुख्य उद्देश्य भारत और उसके पड़ोस में विश्वसनीय स्थिति, नेविगेशन एवं समय पर सेवाएँ प्रदान करना है।
      • यह स्थापित और लोकप्रिय यूएस ‘ग्लोबल पोज़ीशनिंग सिस्टम’ (जीपीएस) की तरह ही काम करता है, लेकिन उपमहाद्वीप में 1,500 किलोमीटर के दायरे में है।
      • तकनीकी रूप से अधिक उपग्रहों वाली उपग्रह प्रणालियाँ स्थिति की अधिक सटीक जानकारी प्रदान करती हैं।
        • हालाँकि जीपीएस (24 उपग्रह) जिसकी स्थिति सटीकता 20-30 मीटर है, की तुलना में नाविक 20 मीटर से कम की अनुमानित सटीकता को इंगित करने में सक्षम है।
    • इसे मोबाइल टेलीफोनी मानकों के समन्वय के लिये एक वैश्विक निकाय ‘थर्ड जनरेशन पार्टनरशिप प्रोजेक्ट’ (3GPP) द्वारा प्रमाणित किया गया है।
    • इसे वर्ष 2020 में हिंद महासागर क्षेत्र में संचालन के लिये ‘वर्ल्ड वाइड रेडियो नेविगेशन सिस्टम’ (WWRNS) के एक भाग के रूप में अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) द्वारा मान्यता दी गई थी।
    • इसरो स्वदेशी परमाणु घड़ियों और नेविगेशन सेवाओं में वृद्धि के साथ आईआरएनएसएस उपग्रहों की अगली पीढ़ी के निर्माण के लिये काम कर रहा है।
  • संभावित उपयोग:
    • स्थलीय, हवाई और समुद्री नेविगेशन;
    • आपदा प्रबंधन;
    • वाहन ट्रैकिंग और फ्लीट प्रबंधन (विशेषकर खनन और परिवहन क्षेत्र हेतु);
    • मोबाइल फोन के साथ एकीकरण;
    • सटीक समय (एटीएम और पावर ग्रिड हेतु);
    • मैपिंग और जियोडेटिक डेटा कैप्चर।
  • महत्त्व:
    • यह 2 सेवाओं के लिये वास्तविक समय की जानकारी देता है अर्थात् नागरिक उपयोग हेतु मानक पोज़ीशनिंग सेवा और प्रतिबंधित सेवा जिसे सेना के अधिकृत उपयोग के लिये एन्क्रिप्ट किया जा सकता है।
    • भारत उन 5 देशों में से एक बन गया है, जिनके पास अपना स्वयं का नेविगेशन सिस्टम है, जैसे कि अमेरिका का GPS, रूस का ‘ग्लोनास’ (GLONASS), यूरोप का ‘गैलीलि’यो और चीन का बाइडू, इसलिये नौवहन उद्देश्यों के लिये अन्य देशों पर भारत की निर्भरता कम हो जाती है।
    • यह भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति में मदद करेगा। यह देश की संप्रभुता एवं सामरिक आवश्यकताओं के लिये भी महत्त्वपूर्ण है।
    • अप्रैल 2019 में सरकार ने ‘निर्भया मामले’ के फैसले के अनुसार देश के सभी वाणिज्यिक वाहनों के लिये ‘NavIC’-आधारित वाहन ट्रैकर्स को अनिवार्य कर दिया था।
    • साथ ही क्वालकॉम टेक्नोलॉजी ने ‘NavIC’ का समर्थन करने वाले मोबाइल चिपसेट को सक्षम किया है।
    • इसके अलावा व्यापक कवरेज के साथ परियोजना को सार्क देशों के साथ साझा किया जा सकता है। इससे क्षेत्रीय नौवहन प्रणाली को और एकीकृत करने में मदद मिलेगी तथा इस क्षेत्र के देशों के प्रति भारत की ओर से कूटनीतिक सद्भावना का संकेत मिलेगा।

जीपीएस एडेड जियो ऑगमेंटेड नेविगेशन (गगन):

  • यह भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) के साथ संयुक्त रूप से कार्यान्वित एक ‘सैटेलाइट बेस्ड ऑग्मेंटेशन सिस्टम’ (SBAS) है।
  • यह प्रणाली अन्य अंतरराष्ट्रीय SBAS प्रणालियों के साथ अंतःप्रचालनीय होगी और क्षेत्रीय सीमाओं के पार निर्बाध नेविगेशन की सुविधा प्रदान करेगी।
    • ‘गगन’ सिग्नल-इन-स्पेस (SIS) जीसैट-8 और जीसैट-10 के माध्यम से उपलब्ध है।
  • उद्देश्य:
    • नागरिक उड्डयन अनुप्रयोगों हेतु आवश्यक सटीकता के साथ उपग्रह आधारित नेविगेशन सेवाएँ प्रदान करना।
    • भारतीय हवाई क्षेत्र में बेहतर वायु यातायात प्रबंधन प्रदान करना।

स्रोत: पीआईबी

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