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भारतीय अर्थव्यवस्था

सेमीकंडक्टर पर भारत-अमेरिका संधि

  • 14 Mar 2023
  • 9 min read

प्रिलिम्स के लिये:

इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और सेमीकंडक्टर के विनिर्माण को बढ़ावा देने की योजना, सेमीकंडक्टर-चिप के प्रमुख निर्माता।

मेन्स के लिये:

सेमीकंडक्टर पर भारत-अमेरिका संधि।

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में भारत और अमेरिका ने भारत-अमेरिका 5वें वाणिज्यिक संवाद 2023 के दौरान सेमीकंडक्टर/अर्द्धचालक आपूर्ति शृंखला की स्थापना हेतु समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किये, जो भारत को इलेक्ट्रॉनिक सामानों का केंद्र बनने के लंबे समय से पोषित अपने सपने को साकार करने में मदद कर सकता है।

  • समझौता ज्ञापन (MoU) अमेरिका के चिप्स और विज्ञान अधिनियम तथा भारत के सेमीकंडक्टर मिशन के मद्देनज़र सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला के लचीलेपन एवं विविधीकरण पर दोनों सरकारों के मध्य एक सहयोगी तंत्र स्थापित करना चाहता है। 

समझौते का महत्त्व:

  • व्यापार हेतु स्वर्णिम अवसर: 
    • अमेरिका और चीन चिप निर्माण में अग्रणी देश हैं। इसलिये सेमीकंडक्टर क्षेत्र में सहयोग को मज़बूत करने के लिये अमेरिका के साथ समझौते से वाणिज्यिक अवसरों की सुविधा तथा नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र के विकास से भारत को काफी मदद मिलने की संभावना है।
  • इलेक्ट्रॉनिक्स आपूर्ति शृंखला: 
    • यह वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स आपूर्ति शृंखला में भारत को केंद्रीय भूमिका प्रदान करने में मदद कर सकता है।
  • सेमीकंडक्टर्स की कमी: 
    • सेमीकंडक्टर्स की आपूर्ति में कमी कोविड-19 के दौरान शुरू हुई थी तथा वर्ष 2021 तक आपूर्ति में गिरावट और तीव्र हो गई। गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) की एक रिपोर्ट ने सुझाव दिया कि वर्ष 2021 में वैश्विक चिप आपूर्ति की कमी के कारण कम-से-कम 169 उद्योग प्रभावित हुए थे।
    • यह संकट अब कम हो गया है लेकिन आपूर्ति शृंखला में कुछ व्यवधान अभी भी मौजूद हैं।
  • चिप निर्माण की दिशा में पुनः संरेखण: 
    • घरेलू दृष्टिकोण से चिप निर्माण हेतु भारत का वर्तमान नीति दृष्टिकोण इसके संभावित पुनर्गठन को प्रेरित कर सकता है, जो वर्तमान में लगभग पूरी तरह से परिपक्व नोड्स के उत्पादन पर केंद्रित है, जिसे सामान्यतः 40 नैनोमीटर (nm) या उससे ऊपर के चिप के रूप में परिभाषित किया जाता है, हालाँकि अधिक उन्नत नोड्स (40 nm से छोटे) क्षेत्र में प्रवेश करने का प्रयास करने से पहले मोटर वाहन उद्योग जैसे क्षेत्र जो कहीं अधिक सामरिक हैं, में असाधारण विनिर्माण क्षमताओं एवं परियोजना निष्पादन कौशल की आवश्यकता है। 

भारत के समक्ष चुनौतियाँ:

  • उच्च निवेश की आवश्यकता: सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग एक बहुत ही जटिल एवं प्रौद्योगिकी-गहन क्षेत्र है जिसमें भारी पूंजी निवेश, उच्च जोखिम, लंबी अवधि तथा पेबैक अवधि तथा प्रौद्योगिकी में तीव्र बदलाव शामिल हैं, जिसके लिये महत्त्वपूर्ण और निरंतर निवेश की आवश्यकता होती है।
  • सरकार से न्यूनतम वित्तीय सहायता: सेमीकंडक्टर उद्योग के विभिन्न उप-क्षेत्रों में विनिर्माण क्षमता स्थापित करने हेतु सामान्यतः आवश्यक निवेश के पैमाने की तुलना में वर्तमान में वित्तीय सहायता का स्तर कम है।
  • फैब्रिकेशन क्षमताओं की कमी: भारत में अच्छी चिप डिज़ाइन प्रतिभा है, लेकिन यहाँ कभी भी चिप फैब क्षमता का निर्माण नहीं किया गया। इसरो और DRDO के पास अपने-अपने फैब फाउंड्री हैं लेकिन वे मुख्य रूप से आवश्यकताओं तक ही सीमित हैं, साथ ही दुनिया के संदर्भ में नवीनतम रूप में परिष्कृत नहीं हैं।
    • भारत में केवल सरकारी स्वामित्त्व वाली सेमीकंडक्टर निर्माण इकाई है- इसमें मोहाली, पंजाब में स्थित निजी स्वामित्त्व वाले पुराने निर्माण इकाइयों को भी शामिल किया जा सकता है।
  • काफी महँगा निर्माण सेटअप: एक सेमीकंडक्टर निर्माण इकाई (या फैब) की लागत अपेक्षाकृत छोटे पैमाने पर भी स्थापित करने में इसकी लागत अरबों डॉलर की हो सकती है और यह तकनीक के संदर्भ में एक या दो पीढ़ी पीछे की भी हो सकती है।
  • संसाधन अक्षम क्षेत्र: चिप फैब/इकाई स्थापित करने में लाखों लीटर स्वच्छ पानी, एक अत्यंत स्थिर विद्युत आपूर्ति, बहुत अधिक भूमि और अत्यधिक कुशल कार्यबल की आवश्यकता होती है।

सेमीकंडक्टर बाज़ार में भारत की स्थिति:

  • भारत वर्तमान में सभी प्रकार के चिप्स का आयात करता है और वर्ष 2025 तक इस बाज़ार के 24 बिलियन अमेरिकी डॉलर से 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है। हालाँकि सेमीकंडक्टर चिप के घरेलू निर्माण के लिये भारत ने हाल में कई पहलें शुरू की हैं:
    • केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वर्ष 2021 में 'सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र' के विकास में सहायता प्रदान करने के लिये 76,000 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की है।
      • नतीजतन डिज़ाइन कंपनियों को चिप डिज़ाइन करने के लिये अच्छी मात्रा में प्रोत्साहन दिया जाएगा।
    • भारत ने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और सेमीकंडक्टर्स के विनिर्माण के लिये स्कीम फॉर मैन्युफैक्चरिंग ऑफ इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स एंड सेमीकंडक्टर्स भी शुरू की है।
    • वर्ष 2021 में भारत ने देश में सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले विनिर्माण को प्रोत्साहित करने के लिये लगभग 10 बिलियन डॉलर की उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना की घोषणा की। 
    • वर्ष 2021 में इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने सेमीकंडक्टर डिज़ाइन में शामिल कम-से-कम 20 घरेलू कंपनियों को शिक्षित करने और अगले 5 वर्षों में 1500 करोड़ रुपए से अधिक का कारोबार करने की सुविधा के लिये डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) योजना भी शुरू की।
  • केवल भारत में वर्ष 2026 तक इसकी खपत 80 बिलियन अमेरिकी डॉलर और वर्ष 2030 तक 110 बिलियन अमेरिकी डॉलर को पार करने की उम्मीद है। 

शीर्ष पाँच सेमीकंडक्टर निर्माता देश कौन से हैं? 

  • शीर्ष 5 देश जो सबसे अधिक सेमीकंडक्टरों का निर्माण करते हैं, वे हैं- ताइवान, दक्षिण कोरिया, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन। 
  • ताइवान और दक्षिण कोरिया में चिप्स के वैश्विक ढलाई कारखाने का लगभग 80% हिस्सा शामिल है। विश्व की सबसे उन्नत चिपमेकर TSMC का मुख्यालय ताइवान में है। 
  • भारतीय सेल्युलर और इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन द्वारा उद्योग के अनुमानों के मुताबिक, वर्तमान में ताइवान में 70% से अधिक ढलाई कारखाने चिप्स का उपयोग करते हैं, जो भारत के मोबाइल उपकरणों में उपयोग में आते हैं।

आगे की राह  

  • संभावना है कि भारत इलेक्ट्रॉनिक्स हब बनने की लंबे समय से पोषित अपनी अपेक्षा और सपने को पूर्ण करेगा एवं यह सुनिश्चित करने में मदद करेगा कि सेमीकंडक्टर की मांग-आपूर्ति में कोई अंतर नहीं है।  
  • यह भी संभावना है कि खरीदार को कभी भी अपने वाहनों की दूसरी चाबी के लिये इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा। 

 स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस  

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