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भारत के 89 शहरों में ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव की जाँच

  • 27 Oct 2017
  • 8 min read

संदर्भ 

हाल ही में आई.आई.टी. गांधीनगर के शोधकर्त्ताओं की एक टीम द्वारा किये गए एक अध्ययन में यह पाया गया है कि स्मार्ट शहर के रूप में विकसित करने के लिये चुने गए देश के 89 शहरों में से अधिकांश शहरों में फरवरी से मई के दौरान दिन के तापमान में उनके आस-पास के गैर-शहरीय क्षेत्रों की तुलना में 1-5⁰C की कमी पाई गई है, यानी कि दिन के समय ये शहर अपेक्षाकृत ठंडे रहते हैं। दरअसल, अप्रैल के दौरान 89 शहरों में से 60% से अधिक शहरों में दिन के तापमान में 1-5 ⁰C की कमी दर्ज़ की गई थी। मई के दौरान यही स्थिति तक़रीबन 70% शहरों में देखी गई थी।   

प्रमुख बिंदु

  • यद्यपि आई.आई.टी. वैज्ञानिकों द्वारा निकाला गया यह निष्कर्ष विश्व की सर्वमान्य अवधारणा से बिलकुल अलग था। इस अवधारणा के अनुसार, ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव (urban heat island effect) के कारण शहरी क्षेत्रों में दिन के समय का तापमान उनके आस-पास के क्षेत्रों की तुलना में अधिक होता है।  
  • इसके विपरीत, मानसून के बाद की समयावधि यानी कि अक्टूबर से जनवरी के दौरान इन शहरी क्षेत्रों में से लगभग 80% में ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव के कारण उनके आस-पास के गैर- शहरी क्षेत्रों की तुलना में तापमान में 1-6 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि देखी गई थी।   
  • यह पाया गया कि जिन शहरों का भी अध्ययन किया गया था, रात के दौरान मौसम और स्थान के बजाय ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव के कारण ही उनका तापमान आस-पास के गैर-शहरी क्षेत्रों से 1-6 ⁰C अधिक था।  
  • अन्य शहरों की तुलना में दक्षिण भारत के अर्द्ध-शुष्क और शुष्क प्रदेशों में रात्री के समय अधिक तापमान देखा गया था। दरअसल, रात के समय तापमान में होने वाली वृद्धि का मुख्य कारण भवनों  और कंक्रीट की दीवारों में होने वाला ऊष्मा का अवशोषण है।  

‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव का कारण क्या है?

  • शहर दिन के समय अपने आस- पास के गैर-शहरी क्षेत्रों की तुलना में तभी ठंडे होते हैं, जबकि गैर-शहरी क्षेत्रों में सिंचाई और जल स्रोतों के अभाव में वनस्पतियों और नमी नहीं पाईजाती।  
  • ऐसे शहरों में कुरनूल, विजयवाड़ा, बादामी, बीजापुर, औरंगाबाद, गुजरात और राजस्थान के शहर शामिल हैं। ये मुख्यतः भारत के मध्य और पश्चिमी भाग में अवस्थित हैं।  
  • गंगा के मैदानी शहरों (जैसे-वाराणसी, लखनऊ, इलाहबाद, कानपुर और पटना), उत्तर-पश्चिमी राज्यों (जैसे-पंजाब और हरियाणा) और पश्चिमी तट के दक्षिणी क्षेत्र में दिन के समय ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव देखा गया है। इन शहरों का तापमान मानसून से पूर्व (फरवरी से मई के दौरान) और मानसून के पश्चात् (अक्टूबर से जनवरी के दौरान) इनके आस- पास के गैर-शहरी क्षेत्रों की तुलना में 3-5 ⁰C अधिक था।  
  • दरअसल इन शहरों में दिन के समय अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव देखे जाने का कारण यह है कि इन क्षेत्रों के गैर-शहरी क्षेत्रों में वृक्षों और कृषि के रूप में वनस्पति विद्यमान होती है और यहाँ सिंचाई के कारण नमी की उपस्थिति भी पाई जाती है।  

गर्मियों के दौरान भारत के पश्चिमी और मध्य भाग में स्थित शहरी क्षेत्रों का गैर-शहरी क्षेत्रों की तुलना में ठंडा होने का कारण-

  • गैर-शहरी क्षेत्रों में न ही फसल होती है और न ही नमी। इन क्षेत्रों की मिट्टी शुष्क होती है और दिन के समय यहाँ का तापमान 40⁰C से अधिक होता है। इसके अलावा, शहरी क्षेत्रों में वनस्पतियों का आवरण और जलाशय होते हैं।   यही कारण है कि दिन के समय शहर अपने आस-आस के गैर-शहरी क्षेत्रों की तुलना में अधिक ठंडे  होते हैं।  
  • इन 89 शहरों में से 70 से अधिक शहर ऐसे गैर-शहरी क्षेत्रों से घिरे हुए हैं जहाँ नवंबर से मार्च के दौरान कुल भूमि के 50% भाग में खेती होती है।   
  • इसका परिणाम यह होता है कि मानसून के बाद की समयावधि में गैर-शहरी क्षेत्र शहरों की तुलना में अधिक ठंडे हो जाते हैं।   
  • यद्यपि तापमान को कम करने में एयरोसोल का भी योगदान होता है, परन्तु दिन के समय शहरों को ठंडा करने में उनका योगदान वनस्पति और सिंचाई की तुलना में कम ही होता है।  

आवश्यकता क्या है?

  • चूँकि भारत सरकार इन शहरों को स्मार्ट शहरों के रूप में विकसित करने की योजना बना रही है, अतः इनके लिये अत्यधिक टिकाऊ अवशोषक पदार्थों का उपयोग करना होगा, जो दिन के समय कम ऊष्मा का ही अवशोषण करें।   
  • इसके लिये कई अन्य तरीके (जैसे वृक्ष लगाना, भवनों में वायु संचालन का इंतजाम करना और भवनों को आधुनिक डिज़ाइन से बनाना) भी अपनाए जाने चाहिये। इस प्रकार रात के समय ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव को कम किया जा सकता है। जहाँ तक संभव हो सके शहरों में वनस्पतियों का आवरण और जल स्रोत के प्रबंधन पर भी ध्यान दिया जाना चाहिये।  

निष्कर्ष

इस अध्ययन के लिये शोधकर्त्ताओं ने वर्ष 2000 से लेकर 2014 तक के आँकड़ों और सामुदायिक भूमि मॉडल का उपयोग किया, ताकि वे सिंचाई के तापमान पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन कर सकें| इस प्रकार उन्होंने दर्शाया कि शहरों में दिन के समय ठंडा रहने की प्रवृत्ति वनस्पतियों के आवरण तथा नमी के अभाव के कारण होती है, जबकि गैर-शहरी क्षेत्रों में वनस्पति आवरण और नमी के कारण यह प्रवृत्ति नहीं पाई जाती है।

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