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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

IEA ने भारत को पूर्णकालिक सदस्य बनने के लिये आमंत्रित किया

  • 18 Oct 2021
  • 7 min read

प्रिलिम्स के लिये: 

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी, रणनीतिक साझेदारी समझौता, सामरिक तेल भंडार

मेन्स के लिये:

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी : सदस्यता एवं पात्रता मानदंड 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने दुनिया के तीसरे सबसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता भारत को अपना पूर्णकालिक सदस्य बनने के लिये आमंत्रित किया है।

प्रमुख बिंदु

  • पृष्ठभूमि:
    • भारत मार्च 2017 में IEA का एक सहयोगी सदस्य बना, लेकिन इससे पूर्व भी IEA के साथ जुड़ा हुआ था।
    • वर्ष 2021 में भारत ने वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, स्थिरता एवं ऊर्जा सहयोग को मज़बूत करने के लिये अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (International Energy Agency- IEA) के साथ एक ‘रणनीतिक साझेदारी समझौता’ किया है।
    • भारत-IEA रणनीतिक साझेदारी के अपेक्षित परिणाम के रूप में IEA ने भारत को पूर्ण सदस्य बनकर IEA के साथ अपने सहयोग को मज़बूत करने हेतु आमंत्रित किया है।
  • भारत को सदस्यता देने का कारण:
    • वैश्विक ऊर्जा प्रवृत्तियों में भारत तेज़ी से प्रभावशाली होता जा रहा है। भारत की ऊर्जा नीतियों पर इसकी गहन रिपोर्ट, जिसे जनवरी 2020 में जारी किया गया था, में कहा गया है कि आने वाले दशकों में देश की ऊर्जा की मांग तेज़ी से बढ़ने वाली है जिसमें विशेष रूप से बिजली का उपयोग तीव्र गति से बढ़ने की अपेक्षा की गई है।
    • ईंधन आयात पर देश की निर्भरता,भारतीय अर्थव्यवस्था हेतु एक प्रमुख प्राथमिकता ऊर्जा सुरक्षा में सुधार करती है।
  • IEA की सदस्यता:
    • IEA में 30 सदस्य देश शामिल हैं।
    • इसमें आठ एसोसिएशन देश भी शामिल हैं। चार देश पूर्ण सदस्यता में शामिल होने की मांग कर रहे हैं- चिली, कोलंबिया, इज़रायल और लिथुआनिया।
    • IEA के लिये एक उम्मीदवार देश को आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) का सदस्य देश होना चाहिये।
  • पात्रता मानदंड: IEA उम्मीदवार देश में निम्नलिखित का होना आवश्यक है:
    • कच्चे तेल और/या उत्पाद भंडार (सामरिक तेल भंडार) पिछले वर्ष के शुद्ध आयात के 90 दिनों के बराबर हो, जिस तक सरकार की तत्काल पहुँच हो (भले ही उस पर सरकार का प्रत्यक्ष  स्वामित्व न हो) और इसका उपयोग वैश्विक तेल की आपूर्ति में व्यवधानों को दूर करने के लिये किया जा सकता है। 
      • भारत का वर्तमान सामरिक तेल भंडार देश की आवश्यकता के 9.5 दिनों की आपूर्ति के बराबर है।
    • “राष्ट्रीय तेल खपत को 10% तक कम करने के लिये एक मांग आधारित कार्यक्रम”
      • राष्ट्रीय आधार पर ‘समन्वित आपातकालीन प्रतिक्रिया उपाय’ (Coordinated Emergency Response Measures-CERM) के संचालन के लिये विधानों और संगठनों का निर्माण करना।
      • IEA की सामूहिक कार्रवाई में अपने हिस्से का योगदान करने की क्षमता सुनिश्चित करने के लिये किये गए उपाय। 
        • एक महत्त्वपूर्ण वैश्विक तेल आपूर्ति व्यवधान के मामले में IEA द्वारा सामूहिक कार्रवाई शुरू की जाएगी।

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी

  • परिचय
    • अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी वर्ष 1974 में पेरिस (फ्राँस) में स्थापित एक स्वायत्त अंतर-सरकारी संगठन है।
    • IEA मुख्य रूप से ऊर्जा नीतियों पर ध्यान केंद्रित करती है, जिसमें आर्थिक विकास, ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण आदि शामिल हैं। इन नीतियों को ‘अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी’ के ‘3E’ के रूप में भी जाना जाता है।
    • IEA का इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी क्लीन कोल सेंटर, कोयले को सतत् विकास लक्ष्यों के अनुकूल ऊर्जा का स्वच्छ स्रोत बनाने पर स्वतंत्र जानकारी और विश्लेषण प्रदान करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहा है।
  • आवश्यकता
    • अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की स्थापना इसके सदस्यों को तेल आपूर्ति में बड़े व्यवधानों में मदद के लिये वर्ष 1973-1974 के तेल संकट के बाद हुई थी।
  • जनादेश
    • समय के साथ IEA के जनादेश को प्रमुख वैश्विक ऊर्जा रुझानों पर नज़र रखने और उनका विश्लेषण करने, ध्वनि ऊर्जा नीति को बढ़ावा देने तथा बहुराष्ट्रीय ऊर्जा प्रौद्योगिकी सहयोग को प्रोत्साहित करने के लिये विस्तारित किया गया है।
  • लक्ष्य
    • इसका लक्ष्य सदस्य देशों के लिये विश्वसनीय, सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा सुनिश्चित करना है।
  • कार्यक्षेत्र के प्रमुख बिंदु:
    • ऊर्जा सुरक्षा: सभी ऊर्जा क्षेत्रों में विविधता, दक्षता और लचीलेपन को बढ़ावा देना।
    • आर्थिक विकास: IEA सदस्य देशों को ऊर्जा की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करना और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने तथा ऊर्जा की कमी को खत्म करने के लिये मुक्त बाज़ारों को बढ़ावा देना।
    • पर्यावरण जागरूकता: जलवायु परिवर्तन से निपटने के विकल्पों के बारे में अंतर्राष्ट्रीय ज्ञान को बढ़ाना।
    • वैश्विक जुड़ाव: साझा ऊर्जा और पर्यावरण संबंधी चिंताओं के समाधान खोजने के लिये गैर-सदस्य देशों, विशेष रूप से प्रमुख उत्पादकों और उपभोक्ताओं के साथ मिलकर काम करना।
  • प्रमुख रिपोर्ट:

स्रोत: द हिंदू

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