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शोधन अक्षमता से जुड़े सीमा-पार मापदंडों के लिये संयुक्त राष्ट्र मॉडल अपनाने पर विचार

  • 23 Jul 2018
  • 2 min read

चर्चा में क्यों?

सरकार सीमा-पार शोधन अक्षमता मामलों के लिये संयुक्त राष्ट्र कानूनी मॉडल को अपनाने पर विचार कर रही है क्योंकि यह दिवालियापन प्रस्ताव ढाँचे को मज़बूत करने पर काम करता है।

प्रमुख बिंदु

  • शोधन अक्षमता और दिवालियापन संहिता (Insolvency and Bankruptcy Code) में सीमा-पार शोधन अक्षमताओं से जुड़े मामलों से संबंधित कई अनुभाग हैं लेकिन अभी तक ये क्रियान्वित नहीं हैं।
  • कॉर्पोरेट मामलों के सचिव इंजेती श्रीनिवास की अध्यक्षता में शोधन अक्षमता कानून समिति, सीमा-पार शोधन अक्षमता प्रावधानों को प्रारंभ करने की संभाव्यता का अध्ययन कर रही है।
  • समिति सीमा-पार शोधन अक्षमताओं से निपटने के लिये अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कानून मॉडल पर संयुक्त राष्ट्र आयोग के प्रावधानों को अपनाने का विचार कर रही है।
  • वर्तमान संहिता की दो धाराएँ 234 और 235  सीमा-पार शोधन अक्षमता से संबंधित हैं, जो कि केंद्र को संहिता के प्रावधानों को लागू करने के लिये दूसरे देश के साथ एक समझौते में प्रवेश करने की अनुमति प्रदान करती हैं। यह प्रक्रिया अपर्याप्त और समय लेने वाली मानी जाती है।
  • सीमा-पार शोधन अक्षमता मामलों के लिये संयुक्त राष्ट्र मॉडल को अपनाए जाने की दशा में धारा 234 और 235 को संहिता से हटाया जा कता है क्योंकि ये धाराएँ केवल द्विपक्षीय समझौतों से संबंधित हैं।
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