प्रारंभिक परीक्षा
होयसल मंदिर
- 23 Feb 2026
- 71 min read
चर्चा में क्यों?
कर्नाटक में 11वीं से 13वीं शताब्दी के कई कम प्रसिद्ध होयसल मंदिर अपनी जटिल सोपस्टोन की नक्काशी और विशिष्ट तारानुमा वास्तुकला के कारण फिर से ध्यान आकर्षित कर रहे हैं।
होयसल मंदिरों की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?
- परिचय: होयसल मंदिरों का विकास 1050–1300 ईस्वी की अवधि में हुआ। प्रमुख केंद्र बेलूर, हैलेबिडु और शृंगेरी थे, लेकिन इस राजवंश का वास्तुशिल्पीय प्रभाव वर्तमान कर्नाटक के अधिकांश क्षेत्रों में फैल गया, जिसमें मैसूर के आस-पास के क्षेत्र भी शामिल हैं।
मुख्य वास्तुकला विशेषताएँ
- सामग्री: होयसल वास्तुकारों ने 'क्लोराइट शिस्ट' (सोपस्टोन) को प्राथमिकता दी। यह पत्थर खदान से निकाले जाने पर नरम होता है, लेकिन समय के साथ कठोर हो जाता है। इसकी सुघट्यता (लचीलापन) इसपर सूक्ष्म नक्काशी को सुगम बनाती जैसे– आभूषण, नाखून और बालों के घुँघराले लच्छे, जिन्हें पत्थर पर बारीकी से जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया।
- भू-आकृति नवाचार
- एककूट – एक गर्भगृह / एक मंदिर
- द्विकूट – दो गर्भगृह / दो मंदिर
- त्रिकूट – तीन गर्भगृह / तीन मंदिर
- चतुष्कूट/पंचकूट– चार या पाँच गर्भगृह/मंदिर
ये अक्सर तारकीय (सितारे आकार) मंचों पर व्यवस्थित किये जाते थे, जिससे लयबद्ध उभार और गर्भगृहों में गहराई बनती थी।
- मूर्तिकला आख्यान: मंदिर की बाहरी दीवारें मूर्तिकला पांडुलिपियों की तरह कार्य करती हैं।
- हाथी, घोड़े, पत्तियाँ और महाकाव्य की पट्टिकाएँ
- आकाशीय नर्तकियाँ
- सजीव पौराणिक युद्ध दृश्य
- विशिष्ट तारकीय योजना: एक प्रमुख विशेषता गर्भगृह और मंच की तारकीय (सितारे आकार) योजना है, जो अनेक उभरते हुए कोण बनाती है और सजावट के लिये अधिक सतह क्षेत्र प्रदान करती है। यह पंचायतन शैली की क्रॉस-आकार वाली भूमि योजना से अलग है।
- सजावटी महत्त्व: मूर्तियों के माध्यम से सजावट पर अत्यधिक ज़ोर दिया गया था, जिसमें आंतरिक और बाहरी दोनों दीवारों, और यहाँ तक कि देवी-देवताओं द्वारा पहने गए आभूषणों को भी बड़ी सूक्ष्मता से तराशा गया था।
- बाहरी दीवारों में क्षैतिज पट्टिकाएँ होती हैं, जिनमें हाथी, पौराणिक जीव और कथात्मक दृश्य दर्शाए गए हैं।
- शिखर डिज़ाइन: सभी कक्षों में शिखर होते थे जो क्षैतिज रेखाओं और मोल्डिंग्स (साँचों) की एक व्यवस्था द्वारा आपस में जुड़े हुए थे। यह व्यवस्था टावर (शिखर) को स्तरों (Tiers) के एक व्यवस्थित क्रम में विभाजित करती थी।
प्रमुख उदाहरण:
- होयसलेश्वर मंदिर: हैलेबिडु में स्थित भव्य होयसलेश्वर मंदिर होयसल वंश के सबसे विस्तृत और भव्य शिव मंदिरों में से एक है।
- इसकी दीवारें किसी उत्कीर्ण महाकाव्य की तरह खुलती हैं, जिनमें पौराणिक युद्धों, दिव्य आकृतियों और आश्चर्यजनक जटिलता वाली परतदार नक्काशीदार पट्टियों का चित्रण है।
- केशव मंदिर: यह 13वीं शताब्दी का त्रिकूट (तीन-गर्भगृह वाला) वैष्णव मंदिर है, जो सोमनाथपुरा में स्थित है और अपनी सूक्ष्म होयसल वास्तुकला और नक्काशियों के लिये प्रसिद्ध है।
- इसका निर्माण सोमनाथ दंडनायक ने किया था, जो होयसल राजा नरसिंह III की सेना का एक कमांडर था।
- चेन्नाकेशव मंदिर: कर्नाटक के बेलूर में स्थित यह मंदिर अपनी जटिल होयसल स्थापत्य शैली के लिये प्रसिद्ध है। इसे राजा विष्णुवर्धन ने चोलों पर अपनी विजय के उपलक्ष्य में बनवाया था। यह एक ‘जीवंत’ मंदिर है, जो भगवान विष्णु को समर्पित है।
- वीर नारायण मंदिर: वीर बल्लाल द्वितीय द्वारा लगभग 1200 ई. में निर्मित वीर नारायण मंदिर अपने विशाल रंगमंडप और अद्वितीय रूप से उत्कीर्ण हाथियों की कतारों/लाइनों के लिये प्रसिद्ध है।
- अन्य स्थानों के अत्यधिक अलंकृत बाह्य भागों के विपरीत, यह मंदिर आंतरिक स्थानिक भव्यता/इंटीरियर स्पेशल ग्रैंडर और मूर्तिकला-सामंजस्य पर विशेष बल देता है।
- नागेश्वर मंदिर: कोरवंगल में स्थित नागेश्वर मंदिर होयसल स्थापत्य के प्रारंभिक प्रयोगात्मक चरण को प्रतिबिंबित करता है। इसकी अपेक्षाकृत संयमित अलंकरण शैली और सघन योजना चालुक्य प्रभावों से विकसित होकर पूर्ण विकसित होयसल शैली की ओर संक्रमण को दर्शाती है।
- इसके समीप स्थित गोविंदेश्वर मंदिर उसी काल का है, किंतु इसकी मूर्तिकला की अभिव्यक्ति अधिक परिष्कृत दिखाई देती है।
- यह भगवान विष्णु को समर्पित है तथा दीवारों के लयबद्ध उभारों और जटिल पट्टिकाओं/फ्रिज़ की नक्काशी में होयसल शिल्पियों के बढ़ते आत्मविश्वास को प्रदर्शित करता है।
- इसके समीप स्थित गोविंदेश्वर मंदिर उसी काल का है, किंतु इसकी मूर्तिकला की अभिव्यक्ति अधिक परिष्कृत दिखाई देती है।
- बुकेश्वर मंदिर: 1173 ई. में राजा वीर बल्लाल द्वितीय के सम्मान में निर्मित बुकेश्वर मंदिर कोरवंगल की स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। इसकी मूर्तिकला की सघनता, सुंदर तारे के आकार का प्लेटफॉर्म तथा परिपक्व अलंकरण होयसल कला के पूर्ण विकास को संकेतित करते हैं।
- लक्ष्मीनरसिंह मंदिर: जावागल स्थित लक्ष्मीनरसिंह मंदिर (1250 ई.) एक आकर्षक त्रिकूट मंदिर है, जो अपनी सुघड़ गज-पट्टिकाओं/फ्रिज़ और चमकदार स्तंभों के लिये प्रसिद्ध है। वीर सोमेश्वर के शासनकाल में निर्मित यह मंदिर जावागल के एक समृद्ध मध्यकालीन व्यापारिक केंद्र होने को प्रतिबिंबित करता है।
- लक्ष्मीदेवी मंदिर: लक्ष्मीदेवी मंदिर (1114 ई.) होयसल काल के सबसे प्रारंभिक सुरक्षित स्मारकों में से एक है, जिसका निर्माण व्यापारी महिला सहजा देवी ने करवाया था।
- इसके चतुष्कूट विन्यास तथा कंकालाकार बेतालों द्वारा संरक्षित दुर्लभ महाकाली गर्भगृह तांत्रिक प्रभावों और स्थापत्य के एक प्रयोगधर्मी चरण की ओर संकेत करते हैं।
- पंचलिंगेश्वर मंदिर: कर्नाटक के मांड्या में स्थित यह मंदिर दुर्लभ पंचकूट विन्यास का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें पूर्वाभिमुख पाँच शिव मंदिर एक ही पंक्ति में निर्मित हैं तथा एक स्तंभित मंडप द्वारा आपस में जुड़े हुए हैं।
- हैलेबिडु का जैन मंदिर समूह: इसमें पार्श्वनाथ बसदि, शांतिनाथ बसदि और आदिनाथ बसदि सम्मिलित हैं। यह समूह संयम, सादगी और ध्यानमय स्थिरता पर आधारित एक भिन्न स्थापत्य सौंदर्य को दर्शाता है। इसकी स्वच्छ रेखाएँ तथा अलंकरण-रहित आंतरिक भाग जैन धर्म के स्पष्टता, वैराग्य और आध्यात्मिक चिंतन के आदर्शों को मूर्त रूप देते हैं।
- हुलिकेरे कल्याणी: 12वीं शताब्दी का हुलिकेरे कल्याणी भूमिगत स्तर पर निर्मित पवित्र जल-स्थापत्य का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें सममित रूप से नीचे उतरती सीढ़ियाँ हैं। लघु मंदिरों के ऐसे समूह, जो प्रतीकात्मक रूप से राशियों और नक्षत्रों से जुड़े हैं, इसे ब्रह्मांडीय अवधारणाओं और जल-प्रबंधन वास्तुकला के अद्भुत संगम के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
- यूनेस्को की मान्यता: वर्ष 2023 में विश्व धरोहर समिति के 45वें सत्र के दौरान चेन्नाकेशव मंदिर, होयसलेश्वर मंदिर और केशव मंदिर को सामूहिक रूप से ‘होयसलों के पवित्र समूह’ के तहत यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में सूचीबद्ध किया गया।
होयसल वंश
- परिचय: होयसल वंश स्वतंत्र सत्ता के रूप में स्थापित होने से पूर्व, शुरुआत में कल्याणी के चालुक्यों, जिन्हें पश्चिमी चालुक्य साम्राज्य भी कहा जाता है, के सामंत थे।
- इस वंश की स्थापना नृप काम II ने की थी, जो प्रारंभ में पश्चिमी चालुक्यों के अधीन एक सामंत (जागीरदार) के रूप में कार्य करते थे।
- राजधानी और क्षेत्र: होयसल वंश की मुख्य राजधानी द्वारसमुद्र (आधुनिक हैलेबिडु) थी, जो कर्नाटक में उनके साम्राज्य के केंद्र के रूप में कार्य करती थी। शुरुआत में, 11वीं शताब्दी में उनकी राजधानी बेलूर में स्थित थी, जिसे बाद में हैलेबिडु स्थानांतरित कर दिया गया था।
- होयसल वंश ने तीन शताब्दियों से अधिक समय तक कर्नाटक और तमिलनाडु के क्षेत्रों पर शासन किया।
- प्रमुख शासक: होयसल वंश के सबसे उल्लेखनीय शासक विष्णुवर्धन, वीर बल्लाल द्वितीय और वीर बल्लाल तृतीय थे।
- होयसल वंश के महानतम शासकों में से एक विष्णुवर्धन (जिन्हें बित्तीदेव के नाम से भी जाना जाता है) थे। उनके शासनकाल में राज्य का व्यापक विस्तार हुआ और मंदिरों का बड़े पैमाने पर निर्माण भी हुआ।
- राजा विष्णुवर्धन प्रारंभ में जैन धर्म के समर्थक थे, लेकिन बाद में प्रसिद्ध श्री वैष्णव संत रामानुज के प्रभाव में आकर उन्होंने वैष्णव धर्म अपना लिया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. होयसल मंदिरों की विशिष्ट स्थापत्य योजना क्या है?
होयसल मंदिरों की सबसे अनूठी विशेषता उनकी 'तारकीय' योजना है। इनके गर्भगृह और ऊँचे चबूतरे को एक बहुकोणीय तारे के आकार में बनाया गया है, जिससे मंदिर की बाहरी दीवारों पर अनगिनत कोण और सतहें बन जाती हैं।
2. होयसल मंदिरों की निर्माण सामग्री में किस प्रकार की सामग्री प्रमुखता से पाई जाती है?
इनका निर्माण मुख्य रूप से क्लोराइटिक शिस्ट से किया गया था, जिससे असाधारण रूप से जटिल और विस्तृत नक्काशी संभव हो पाई।
3. होयसल काल के तीन प्रमुख मंदिरों के उदाहरण बताइये।
प्रमुख उदाहरणों में हेलेबिड में होयसलेश्वर मंदिर, बेलूर में चेन्नाकेशव मंदिर और सोमनाथपुर का केशव मंदिर शामिल हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स:
प्रश्न: निम्नलिखित में से कौन-सा सूर्य मंदिर के लिये प्रसिद्ध है? (2017)
- अरसावल्ली
- अमरकंटक
- ओंकारेश्वर
निम्नलिखित का उपयोग करके सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a)
प्रश्न. नागर, द्रविड़ और बेसर हैं- (2012)
(a) भारतीय उपमहाद्वीप के तीन मुख्य जातीय समूह
(b) तीन मुख्य भाषा वर्ग, जिनमें भारत की भाषाओं को विभक्त किया जा सकता है
(c) भारतीय मंदिर वास्तु की तीन मुख्य शैलियाँ
(d) भारत में प्रचलित तीन मुख्य संगीत घराने
उत्तर: c








