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दवा कीमतों को थोक मुद्रास्फीति के साथ लिंक करने की योजना

  • 31 May 2018
  • 4 min read

चर्चा में क्यों?

सरकार दवाओं की कीमतों को विनियमित करने हेतु गैर-अनुसूचित दवाओं की कीमतों में की जाने वाली अनुमत वार्षिक वृद्धि (permitted annual increase) को थोक मूल्य सूचकांक (Wholesale Price Index) से जोड़ने पर विचार कर रही है।

प्रमुख बिंदु

  • नीति आयोग ने दवा मूल्य नियंत्रण आदेश (डीपीसीओ), 2013 में संशोधन की सिफारिश की है। जिसमें यह सुझाव दिया गया है कि अनुसूचित दवाओं की कीमतों की तरह गैर-अनुसूचित दवाओं की कीमतों को भी थोक मूल्य सूचकांक से जोड़ा जाना चाहिये, ताकि इनकी कीमतों का भी अनुसूचित दवाओं की तरह विनियमन किया जा सके।
  • आयोग ने उत्पादों के लिये एक अलग सूचकांक के विकास का भी सुझाव दिया है।
  • रसायन मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले फार्मास्यूटिकल्स विभाग (डीओपी) और नीति आयोग ने हाल ही में डीपीसीओ 2013 में प्रस्तावित परिवर्तनों पर चर्चा के लिये प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के साथ बैठक की थी।
  • डीपीसीओ 2013 के अनुसार, दवाओं की कीमतें पिछले कैलेंडर वर्ष के थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) के अनुरूप संशोधित की जाती हैं। परिणामतः यदि वार्षिक डब्ल्यूपीआई में गिरावट आती है, तो कंपनियों को कीमतों में कटौती करनी होती है।
  • डीओपी के अनुसार, लगभग 850 दवाएँ ही मूल्य नियंत्रण के अधीन हैं, जबकि बाजार में विभिन्न प्रकार की 6,000 से अधिक दवाएँ उपलब्ध हैं।
  • यदि ये सिफारिश स्वीकार कर ली जाती है, तो गैर-अनुसूचित दवाओं की कीमतों में कमी आ जाएगी।
  • हालाँकि, फार्मा उद्योग इस अनुशंसा के पक्ष में नहीं है, इसका कहना है कि सिफारिश के लागू होने की स्थिति में फार्मा उद्योग को बड़ा झटका लगेगा, जबकि इस उद्योग की स्थिति पहले से ही खराब है।
  • उद्योग से जुड़े कई लोगों का मानना है कि कीमतों में परिवर्तनों से नवाचार के प्रयासों को गहरा आघात पहुँचेगा, क्योंकि नवाचार के लिये आवश्यक अधिशेष इन्हीं कीमतों से प्राप्त होता है। ऐसे में कीमतों में कोई भी कटौती देश के फार्मास्यूटिकल उद्योग के भविष्य को खतरे में डाल सकती है।
  • स्मरणीय है कि, इस वर्ष अप्रैल माह में सभी दवाओं की कीमतों में लगभग 3.4% की वृद्धि हुई थी, जबकि पिछले वर्ष इसी माह में यह वृद्धि लगभग 2.9% थी। 2016 में थोक मूल्य सूचकांक 0.97% था और फार्मा उद्योग को कीमतों में कटौती करनी पड़ी थी।
  • फार्मा लॉबी ने इस कदम को उद्योग के विपक्ष में मानते हुए, इस प्रस्ताव को रद्द करने हेतु पीएमओ से भी संपर्क किया है।
  • इसके अतिरिक्त, प्रस्ताव के मुताबिक, नकारात्मक डब्ल्यूपीआई के मामले में, नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) को अनुसूचित दवाओं के सीलिंग प्राइस (ceiling price) में परिवर्तन करना होगा। हालाँकि, यदि किसी दवा की एमआरपी पहले से ही संशोधित सीलिंग प्राइस से कम है, तो उसे इसमें परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं होगी।
  • एक ओर जहाँ इस प्रस्ताव का विरोध किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क (एआईडीएएन) ने इस कदम का समर्थन किया है।
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