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जीव विज्ञान और पर्यावरण

वन क्षेत्रों में अन्वेषण हेतु अनिवार्य शुल्क में छूट

  • 12 Sep 2020
  • 10 min read

प्रिलिम्स के लिये:

वन सलाहकार समिति, शुद्ध वर्तमान मूल्य (NVP)

मेन्स के लिये:

ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण की चुनौती से संबंधित प्रश्न 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ‘वन सलाहकार समिति’ (Forest Advisory Committee- FAC) ने केंद्रीय खान मंत्रालय द्वारा वन्य क्षेत्रों में पूर्वेक्षण तथा अन्वेषण हेतु ‘शुद्ध वर्तमान मूल्य’ (Net Present Value- NVP) शुल्क को माफ किये जाने की मांग को खारिज कर दिया है।

प्रमुख बिंदु:

  • गौरतलब है कि 18 अगस्त, 2020 को केंद्रीय खान मंत्रालय ने वन्य क्षेत्रों में हाइड्रोकार्बन, धातु और गैर-धातु खनिजों के अन्वेषण और पूर्वेक्षण को ‘वन संरक्षण अधिनियम’ (Forest Conservation Act) के दायरे से बाहर रखने की मांग की थी।
  • केंद्रीय खान मंत्रालय ने NVP को अन्वेषण/पूर्वेक्षण गतिविधियों में देरी का एक प्रमुख कारण बताया था।
  • FAC ने NVP को पूरी तरह समाप्त करने की मांग को खारिज कर दिया है परंतु समिति ने ‘केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ को इसमें कुछ छूट देने का सुझाव दिया है।
  • ध्यातव्य है कि वर्ष 2018 में केंद्रीय कोयला मंत्रालय, केंद्रीय खान मंत्रालय और केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने प्राकृतिक संसाधनों की खोज के लिये बोरहोल (Borehole) की खुदाई हेतु फाॅरेस्ट क्लीयरेंस से छूट की मांग की थी।
  • इस मामले में भी वन सलाहकार समिति (Forest Advisory Committee) ने छूट देने से इनकार कर दिया था परंतु समिति ने प्रक्रिया को सरल बनाने पर सहमति व्यक्त की थी।

क्या है शुद्ध वर्तमान मूल्य? 

  • शुद्ध वर्तमान मूल्य से आशय उस मूल्य/निधि के मौद्रिक सन्निकटन से है जो वन के किसी भाग को नष्ट किये जाने के कारण खो दिया जाता है।
  • सरल भाषा में कहें तो NVP किसी वन और उसके पारिस्थितिक तंत्र को अवसंरचना परियोजनाओं के कारण होने वाली क्षति की भरपाई और इसके संरक्षण के प्रयासों के लिये किया जाने वाला अग्रिम भुगतान है। 
  • NVP की गणना के लिये कुछ सूत्र निर्धारित हैं, NVP का निर्धारण वन की अवस्थिति और प्रकृति तथा उस क्षेत्र के लिये प्रस्तावित औद्योगिक उद्यम के प्रकार पर निर्भर करता है।
    • उदाहरण के लिये, वर्ष 2019 अत्यंत घने वनों के लिये प्रति हेक्टेयर NVP 10,43,000 रुपए था। 
  • उच्चतम न्यायालय द्वारा वर्ष 2002 में गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिये वन भूमि का उपयोग करने के लिये NVP का भुगतान करना अनिवार्य कर दिया गया और इसमें बहुत ही सीमित छूट की अनुमति है।
  • NVP का विकास उच्चतम न्यायालय के निर्देश के आधार पर आर्थिक विकास संस्थान (Institute of Economic Development) की प्रो. कंचन चोपड़ा की अध्यक्षता में बनी एक समिति द्वारा किया गया था।

केंद्रीय खान मंत्रालय का पक्ष:

  • केंद्रीय खान मंत्रालय के अनुसार, अन्वेषण के लिये चुने गए सभी क्षेत्रों को खदानों में परिवर्तित नहीं किया गया जाता बल्कि इनमें से मात्र 1% पर ही खनन का कार्य प्रारंभ होता है।
  • इसे देखते हुए NVP को एक परिहार्य व्यय के रूप में देखा जाता है, जिसे हटाया जाना चाहिये।
  • ध्यातव्य है कि खनन कंपनियों को अन्वेषण के लिये पट्टे/लीज़ पर दी गई वन भूमि पर NVP का 2-5% राशि जमा करना पड़ता है।

सुझाव:   

  • वन सलाहकार समिति के अनुसार, अन्वेषण से जुड़े कार्यों के लिये NVP को पूरी तरह समाप्त करना संभव नहीं होगा हालाँकि समिति ने ‘केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ को प्रति बोरहोल पर शुल्क लागू करने का सुझाव दिया है।
  • इसके अनुसार, मंत्रालय द्वारा पट्टे पर दी गई कुल वन भूमि के NVP पर शुल्क वसूल करने के स्थान पर कंपनियों पर प्रति बोरहोल के आधार पर शुल्क लागू किया जा सकता है।

अन्य प्रयास:

  • केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा अन्वेषण परियोजनाओं की मंज़ूरी में तेज़ी लाने के लिये अन्वेषण हेतु नक्शों के पैमाने निर्धारित करने में कुछ छूट देने पर भी विचार किया जा रहा है। 
  • गौरतलब है कि वन क्षेत्रों में खनिज या हाइड्रोकार्बन के खनन हेतु 25 या इससे कम अन्वेषण बोरहोल खोदने के लिये पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होती है।  
  • हालाँकि 25 से अधिक बोरहोल वाली परियोजनाओं के लिये भूकंपीय सर्वेक्षण, पूर्व वन मंज़ूरी, NPV भुगतान आदि की आवश्यकता होती है। 

लाभ:  

  • FAC के इस सुझाव के लागू होने के बाद खनन कंपनियों के लिये वन क्षेत्रों में अन्वेषण की प्रक्रिया आसान हो जाएगी।
  • इसके माध्यम से खनन प्रक्रिया की लागत में कमी आएगी और इस क्षेत्र में निजी कंपनियों को प्रोत्साहित करने में सहायता प्राप्त होगी।

चुनौतियाँ:

  • FAC द्वारा अन्वेषण हेतु NVP भुगतान को पूरी तरह न समाप्त करन एक तार्किक निर्णय है परंतु इस निर्णय से पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी प्रश्न उठेंगे। 
  • आमतौर पर खनन प्रक्रिया के लिये बहुत बड़े क्षेत्र की आवश्यकता होती है और इसका प्रभाव क्षेत्र की मानव आबादी के साथ-साथ पारिस्थितिकी तंत्र पर भी पड़ता है।
  • नियमों में अधिक छूट देने से औद्योगिक क्षेत्र द्वारा पर्यावरण दोहन की गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। 
  • ध्यातव्य है कि इससे पहले केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को असम के ‘डिब्रू-सैखोवा राष्टीय उद्यान’ के पास ‘ऑयल इंडिया लिमिटेड’ (Oil India Limited- OIL) को अन्वेषण बोरहोल खोदने की अनुमति देने के लिये विरोध का सामना करना पड़ा था।
  • असम के तिनसुकिया ज़िले में ‘ऑयल इंडिया लिमिटेड’ (Oil India Limited- OIL) के बागान/बागजान (Baghjan) गैस कुएँ में तेल रिसाव की घटना से क्षेत्र में काफी क्षति हुई थी।

आगे की राह:

  • वर्तमान में देश के विकास और बढती ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिये आयात पर निर्भरता को कम करते हुए देश को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना बहुत ही आवश्यक है।
  • हालाँकि ऊर्जा स्रोतों के अन्वेषण और खनन को बढ़ावा देने के साथ पर्यावरण संरक्षण को सुनिश्चित करना भी बहुत आवश्यक है।
  • ऊर्जा ज़रूरतों के लिये नवीकरणीय ऊर्जा के विकल्पों को अपनाने के साथ खनन क्षेत्र में भी नवोन्मेष को बढ़ावा दिया जाना चाहिये।   
  • ‘ऑयल इंडिया लिमिटेड’ के अनुसार, राष्ट्रीय उद्यानों में अन्वेषण के लिये तकनीकी के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाएगा जिससे वनों के अंदर जाकर खुदाई की आवश्यकता नहीं होगी। 

वन सलाहकार समिति (Forest Advisory Committee- FAC):

  • FAC ‘वन (संरक्षण) अधिनयम, 1980 के तहत स्थापित एक संविधिक निकाय है।
  • FAC ‘केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ (Ministry of Environment, Forest and Climate Change-MOEF&CC) के अंतर्गत कार्य करती है।
  • केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के वन महानिदेशक इस समिति के अध्यक्ष होते हैं।
  • यह समिति गैर-वन उपयोगों जैसे-खनन, औद्योगिक परियोजनाओं आदि के लिये वन भूमि के प्रयोग की अनुमति देने और सरकार को वन मंज़ूरी के मुद्दे पर सलाह देने का कार्य करती है

स्रोत: द हिंदू

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