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प्राकृतिक रबड़ की कीमतों में गिरावट

  • 15 Sep 2022
  • 9 min read

प्रिलिम्स के लिये:

प्राकृतिक रबड़ (NR), हेविया ब्रासिलिएन्सिस, राष्ट्रीय रबड़ नीति।

मेन्स के लिये:

रबड़ और राष्ट्रीय रबड़ नीति का महत्त्व।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारतीय बाज़ार में प्राकृतिक रबड़ (Natural Rubber-NR) की कीमत 16 महीने के निचले स्तर पर पहुँचने के कारण किसानों और विभिन्न संगठनों द्वारा विरोध प्रदर्शन किया गया।

कीमतों में तेज़ गिरावट का कारण:

  • निम्न मांग और अन्य कारक: इसके अंतर्गत चीन की कमज़ोर मांग और उच्च मुद्रास्फीति के साथ यूरोपीय ऊर्जा संकट जैसे कारण शामिल हैं।
  • जबकि चीन में निरंतर शून्य कोविड रणनीति, जो प्राकृतिक रबड़ की वैश्विक मात्रा का लगभग 42% खपत करती है, उद्योग को महंगा पड़ा है।
  • अन्य देशों से आयात: घरेलू टायर उद्योग में आइवरी कोस्ट से ब्लॉक रबड़ और सुदूर पूर्व से मिश्रित रबड़ की पर्याप्त आपूर्ति होती है।
    • प्राकृतिक रबड़ की कुल खपत के 73.1% हिस्से का उपयोग ऑटो-टायर निर्माण क्षेत्र में होता है।

गिरती कीमत का किसानो पर प्रभाव:

  • फसल स्थानांतरण: कीमतों में गिरावट का प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक महसूस किया जाता है, जहाँ ज़्यादातर लोग पूरी तरह से रबड़ की खेती पर निर्भर हैं, इसलिये वे अन्य फसलों के उत्पादन की तरफ रूख कर सकते हैं।
    • यह रबड़ हिस्सेदारी के विखंडन का कारण भी बन सकता है।
  • लघु और मध्यम उद्यमों पर प्रभाव: चूँकि अधिकांश उत्पादन छोटे और मध्यम उद्यमों में होता है, गिरती कीमत उन्हें अनिश्चित भविष्य की ओर ले जा सकती है और अस्थायी रूप से उत्पादन बंद करने के लिये मजबूर कर सकती है।
  • केरल में डर का वातावरण: राज्य का योगदान कुल उत्पादन में लगभग 75% है, क्योंकि स्थानीय अर्थव्यवस्था रबड़ उत्पादन पर निर्भर करती है, इसलिये गिरती कीमत केरल के गाँवों में बड़ी दहशत पैदा कर सकती है।

प्राकृतिक रबड़:

  • वाणिज्यिक रोपण फसल: रबड़ हेविया ब्रासिलिएन्सिस नामक पेड़ के लेटेक्स से बनाया जाता है। रबड़ को बड़े पैमाने पर रणनीतिक औद्योगिक कच्चे माल के रूप में माना जाता है और इसे रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा एवं औद्योगिक विकास के लिये विश्व स्तर पर विशेष दर्जा दिया गया है।
  • विकास हेतु आवश्यक स्थिति: यह भूमध्यरेखीय फसल है लेकिन विशेष परिस्थितियों में इसे उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में भी उगाया जाता है।
    • तापमान: नम और आर्द्र जलवायु के साथ 25 डिग्री सेल्सियस से ऊपर।
    • वर्षा: 200 सेमी से अधिक।
    • मृदा का प्रकार: समृद्ध जलोढ़ मृदा।
    • इस रोपण फसल के लिये कुशल श्रम की सस्ती और पर्याप्त आपूर्ति की आवश्यकता है।
  • विश्व स्तर पर प्रमुख उत्पादक: थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम, चीन और भारत।
  • प्रमुख उपभोक्ता: चीन, भारत, अमेरिका, जापान, थाईलैंड, इंडोनेशिया और मलेशिया।

भारत में रबड़ उत्पादन की स्थिति:

  • उत्पादन:
    • अंग्रेज़ों ने भारत में पहला रबड़ बागान वर्ष 1902 में केरल में पेरियार नदी के तट पर स्थापित किया था।
    • भारत वर्तमान में उच्चतम उत्पादकता के साथ इस प्राकृतिक सामग्री का पाँचवाँ सबसे बड़ा उत्पादक है।
    • वर्ष 2020-21 की तुलना में वर्ष 2021-22 के दौरान रबड़ का उत्पादन 8.4% बढ़कर 7,75,000 टन हो गया।
      • यह विश्व स्तर पर रबड़ का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता भी बना हुआ है।
      • भारत की कुल प्राकृतिक रबड़ खपत का लगभग 40% वर्तमान में आयात के माध्यम से पूरा किया जाता है।
    • शीर्ष रबड़ उत्पादक राज्य: केरल > तमिलनाडु > कर्नाटक।
  • सरकार की पहलें:
    • रबड़ प्लांटेशन डेवलपमेंट स्कीम और रबड़ ग्रुप प्लांटिंग स्कीम, सरकार के नेतृत्त्व वाली पहल के प्रमुख उदाहरण हैं।
    • रबड़ के बागानों में 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति है।
    • वाणिज्य विभाग ने राष्ट्रीय रबड़ नीति मार्च 2019 में पेश की।
      • नीति में प्राकृतिक रबड़ उत्पादन क्षेत्र और संपूर्ण रबड़ उद्योग मूल्य शृंखला का समर्थन करने के लिये कई प्रावधान शामिल हैं।
        • यह देश में रबड़ उत्पादकों के सामने आने वाली समस्याओं को कम करने के लिये रबड़ क्षेत्र में गठित टास्क फोर्स द्वारा पहचानी गई अल्पकालिक और दीर्घकालिक रणनीतियों पर आधारित है।
        • मध्यम अवधि के ढाँचे (Medium Term Framework-MTF) में प्राकृतिक रबड़ क्षेत्र के सतत् और समावेशी विकास योजना को लागू करके रबड़ बोर्ड के माध्यम से उत्पादकों के कल्याण के लिये प्राकृतिक रबड़ क्षेत्र का समर्थन करने हेतु विकासात्मक एवं अनुसंधान गतिविधियों को निष्पादित किया जाता है।

रबड़ बोर्ड ऑफ इंडिया:

  • इसका मुख्यालय वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के प्रशासन के अंतर्गत केरल के कोट्टायम में अवस्थित है।
  • रबड़ बोर्ड संबंधित अनुसंधान, विकास, विस्तार और प्रशिक्षण गतिविधियों को सहायता और प्रोत्साहित करके देश में रबड़ उद्योग के विकास का कार्य करता है।
  • रबड़ अनुसंधान संस्थान, रबड़ बोर्ड के अधीन है।

आगे की राह

  • सरकार को मिश्रित रबड़ पर आयात शुल्क बढ़ाने की ज़रूरत है ताकि इसे प्राकृतिक रबड़ के बराबर लाया जा सके।
  • मूल्य स्थिरीकरण योजना के तहत सरकार को पुनर्रोपण सब्सिडी और फसल का समर्थन मूल्य बढ़ाकर किसानों की मांगों को पूरा करना चाहिये।

UPSC सिविल सेवा, विगत वर्षों के प्रश्न (PYQ):

प्रिलिम्स:

प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन-सा एक पादप-समूह ‘नवीन विश्व (न्यू वर्ल्ड)’ में कृषि-योग्य बनाया गया तथा इसका प्रचलन ‘प्राचीन विश्व (ओल्ड वर्ल्ड)’ में था?

(a) तंबाकू, कोको और रबड़
(b) तंबाकू, कपास और रबड़
(c) कपास, कॉफी और गन्ना
(d) रबड़, कॉफी और गेहूँ

उत्तर: (a)

व्याख्या:

  • नवीन विश्व अमेरिका को संदर्भित करता है, जिसे कोलंबस ने भारत की अपनी यात्रा के दौरान खोजा था। 15वीं शताब्दी के दौरान प्राचीन विश्व के महाद्वीपों में एशिया, अफ्रीका और यूरोप शामिल थे।
  • तंबाकू अमेरिकी कृषि में सबसे महत्त्वपूर्ण नकदी फसलों में से एक है और उत्तर एवं दक्षिण अमेरिकी महाद्वीपों की मूल उपज है। पहली बार प्राचीन विश्व को इसके बारे में तब ज्ञात हुआ जब 15वीं और 16वीं शताब्दी के दौरान यूरोपीय खोजकर्त्ताओं ने इसे एक दवा के रूप में और मूल अमेरिकियों द्वारा एक   मतिभ्रमक (Hallucinogen) के रूप में इस्तेमाल किया गया।
  • प्राकृतिक रबड़ के वृक्ष दक्षिणी अमेरिका के मूल वृक्ष हैं और वहीं से इसे प्राचीन विश्व में पेश किया गया। कोको का वृक्ष भी अमेज़न बेसिन का मूल वृक्ष है, जिसे प्राचीन विश्व से नवीन विश्व में पेश किया गया था।
  • कपास और गेहूँ का उत्पादन सिंधु घाटी सभ्यता ेमें किया जाता था, अतः ये दोनों फसलें प्राचीन विश्व की मूल फसलें हैं।

अतः विकल्प (a) सही है।

स्रोत: द हिंदू

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