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एनसीडब्ल्यू के दायरे का विस्तार

  • 01 Feb 2022
  • 10 min read

प्रिलिम्स के लिये:

महिलाओं के कल्याण के लिये कानूनी ढांँचा, राष्ट्रीय महिला आयोग की पृष्ठभूमि और जनादेश।

मेन्स के लिये:

देश में महिलाओं की बढ़ती ज़रूरतें, राष्ट्रीय महिला आयोग की पृष्ठभूमि और जनादेश।

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में राष्ट्रीय महिला आयोग (National Commission for Women- NCW) का 30वांँ स्थापना दिवस (31 जनवरी) मनाया गया।

  • प्रधानमंत्री के मुताबिक, देश में महिलाओं की बढ़ती ज़रूरतों को देखते हुए एनसीडब्ल्यू का दायरा बढ़ाया जाना चाहिये।

प्रमुख बिंदु 

राष्ट्रीय महिला आयोग के दायरे का विस्तार करने की आवश्यकता:

  • नए भारत का विकास:
    • आत्मनिर्भर भारत (Atmanirbhar Bharat) अभियान ने देश के विकास और महिलाओं की क्षमता के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य किया है। 
      • यह परिवर्तन प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे रहा है क्योंकि प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (Pradhan Mantri MUDRA Yojana) में लगभग 70% महिला लाभार्थी शामिल हैं।
      •  देश में पिछले 6-7 वर्षों में महिला स्वयं सहायता समूहों की संख्या में तीन गुना वृद्धि देखी गई है।
      • इसी तरह वर्ष 2016 के बाद उभरे 60 हज़ार से ज़्यादा  स्टार्टअप्स में से 45 फीसदी में कम-से-कम एक महिला निदेशक शामिल है।
  • समाज में पुरानी सोच:
    • कपड़ा से लेकर डेयरी उद्योग महिलाओं के कौशल और शक्ति के कारण आगे बढ़े हैं।
    • हालाँकि यह खेदजनक है कि पुरानी सोच वाले लोगों के विचार से महिलाओं की भूमिकाएँ केवल घरेलू काम तक ही सीमित हैं।
  • महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध:

NCW की पृष्ठभूमि और जनादेश:

  • पृष्ठभूमि:
    • भारत में महिलाओं की स्थिति पर गठित समिति (CSWI) ने लगभग पाँच दशक पहले शिकायतों के निवारण की सुविधा एवं महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक विकास में तीव्रता लाने हेतु निगरानी कार्यों को पूरा करने के लिये ‘राष्ट्रीय महिला आयोग’ की स्थापना की सिफारिश की थी।
    • महिलाओं के लिये राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (1988-2000) सहित अन्य सभी समितियों और आयोगों ने महिलाओं के लिये एक शीर्ष निकाय के गठन की सिफारिश की।
    • राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990 के तहत राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना जनवरी 1992 में एक वैधानिक निकाय के रूप में की गई थी।
    • आयोग का गठन 31 जनवरी 1992 को ‘जयंती पटनायक’ की अध्यक्षता में किया गया था।
      • आयोग में एक अध्यक्ष, एक सदस्य सचिव और पांच अन्य सदस्य होते हैं। NCW के अध्यक्ष को केंद्र सरकार द्वारा नामित किया जाता है।
  • जनादेश और कार्य:
    • इसका प्राथमिक उद्देश्य उपयुक्त नीति निर्माण और विधायी उपायों के माध्यम से महिलाओं को उनके उचित अधिकारों को सुरक्षित करने में सक्षम बनाना और जीवन के सभी क्षेत्रों में समानता एवं समान भागीदारी हासिल करने में सक्षम बनाने की दिशा में प्रयास करना है।
    • इसके कार्यों में शामिल हैं:
      • महिलाओं के लिये संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों की समीक्षा करना।
      • उपचारात्मक विधायी उपायों की सिफारिश करना।
      • शिकायतों के निवारण को सुगम बनाना।
      • महिलाओं को प्रभावित करने वाले सभी नीतिगत मामलों पर सरकार को सलाह देना।
    • इसने बड़ी संख्या में शिकायतें प्राप्त की हैं और त्वरित न्याय प्रदान करने के लिये कई मामलों में स्वत: संज्ञान लिया है।
    • इसने बाल विवाह, प्रायोजित कानूनी जागरूकता कार्यक्रमों, पारिवारिक महिला लोक अदालतों के मुद्दे को उठाया और कानूनों की समीक्षा की, जैसे:

महिलाओं के कल्याण हेतु प्रमुख कानूनी ढाँचा:

आगे की राह

  • NCW अधिनियम में संशोधन: वर्तमान भारत में महिलाओं की भूमिका में लगातार वृद्धि हो रही है तथा राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की भूमिका का विस्तार समय की आवश्यकता है।
    • इस संदर्भ में राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990 को अधिक कठोर और प्रभावी बनाने के लिये इसमें संशोधन किया जाना चाहिये।
    • इसके अलावा राज्य आयोगों को भी अपने दायरे का विस्तार करना चाहिये।
  • विवाह की न्यूनतम आयु को बढ़ाना: बेटियों की शादी की उम्र को बढ़ाकर 21 वर्ष करने का प्रयास किया जा रहा है ताकि कम उम्र में शादी बेटियों की शिक्षा व कॅरियर में बाधा न बने।
  • महिलाओं के खिलाफ हिंसा को संबोधित करना: महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा समानता, विकास, शांति के साथ-साथ महिलाओं और लड़कियों के मानवाधिकारों की पूर्ति में एक बाधा बनी हुई है।
    • कुल मिलाकर सतत् विकास लक्ष्यों (SDGs) का वादा-’किसी को पीछे नहीं छोड़ना’, महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा को समाप्त किये बिना पूरा नहीं किया जा सकता है।
  • समग्र प्रयास: महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों का समाधान केवल कानून के तहत अदालतों में ही नहीं किया जा सकता है बल्कि इसके लिये एक समग्र दृष्टिकोण और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बदलना आवश्यक है।
    • इसके लिये कानून निर्माताओं, पुलिस अधिकारियों, फोरेंसिक विभाग, अभियोजकों, न्यायपालिका, चिकित्सा और स्वास्थ्य विभाग, गैर-सरकारी संगठनों, पुनर्वास केंद्रों सहित सभी हितधारकों को एक साथ मिलकर कार्य करने की आवश्यकता है।

स्रोत: द हिंदू

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