हिंदी साहित्य: पेन ड्राइव कोर्स
ध्यान दें:

डेली अपडेट्स

भारतीय समाज

अंबेडकर का लोकतांत्रिक दृष्टिकोण

  • 23 Dec 2022
  • 12 min read

प्रिलिम्स के लिये:

अंबेडकर, बुद्ध, कबीर और महात्मा ज्योतिबा फुले

मेन्स के लिये:

अंबेडकर की लोकतांत्रिक दृष्टि/दृष्टिकोण

चर्चा में क्यों?

कई अध्ययनों में डॉ. बी.आर. अंबेडकर की लोकतंत्र की अवधारणा का मुख्य रूप से सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक दर्शन की दृष्टि के माध्यम से परीक्षण किया गया है।

अंबेडकर की राय में लोकतंत्र निर्माण के कारक:

  • नैतिकता: 
    • बुद्ध और उनके धम्म पर एक दृष्टि इस बात पर प्रकाश डालती है कि कैसे अंबेडकर लोकतंत्र को एक ऐसे दृष्टिकोण के रूप में देखते हैं जो मानव अस्तित्व के प्रत्येक पहलू को प्रभावित करता है।
    • उनके अनुसार समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के स्तंभों के बावजूद लोकतंत्र को नैतिक रूप से भी देखा जाना चाहिये।
    • जाति व्यवस्था में नैतिकता का उपयोग:
      • अंबेडकर ने जाति व्यवस्था, हिंदू सामाजिक व्यवस्था, धर्म की प्रकृति और भारतीय इतिहास की जांँच में नैतिकता के नज़रिये का उपयोग किया।
      • चूँकि अंबेडकर ने लोकतंत्र में हाशिये पर पहुँच चुके समुदायों को अपने विचार के केंद्र में रखा, इसलिये उनके लोकतंत्र के ढाँचे को इन कठोर धार्मिक संरचनाओं और सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्थाओं के भीतर रखना मुश्किल था।
      • इस प्रकार अंबेडकर ने बौद्ध धर्म के सिद्धांतों के आधार पर एक नई संरचना का निर्माण करने का प्रयास किया।
  • व्यक्तिवाद और बंधुत्व की भावना को संतुलित करना:
    • वह अत्यधिक व्यक्तिवाद के आलोचक थे जो बौद्ध धर्म का एक संभावित परिणाम था, क्योंकि ऐसी विशेषताएँ सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देने में सक्रिय रूप से संलग्न होने में विफल रही हैं।  
      • इस प्रकार उनका मानना था कि एक सामंजस्यपूर्ण समाज के लिये व्यक्तिवाद और बंधुत्व के मध्य संतुलन होना आवश्यक है।
  • व्यावहारिकता का महत्त्व: 
    • अंबेडकर व्यावहारिकता को अत्यधिक महत्त्व देते थे।
    • उनके अनुसार, अवधारणाओं और सिद्धांतों का परीक्षण करने की आवश्यकता के साथ ही उन्हें समाज में व्यवहार में लाना जाना आवश्यक था।
    • उन्होंने किसी भी विषय-वस्तु का विश्लेषण करने के लिये तर्कसंगतता और आलोचनात्मक तर्क का उपयोग किया, क्योंकि उनका मानना था कि किसी विषय की पहले तर्कसंगतता की परीक्षा उत्तीर्ण करनी चाहिये, जिसमें विफल होने पर इसे अस्वीकार, परिवर्तित या संशोधित किया जाना चाहिये।

नैतिकता के प्रकार?

  • सामाजिक नैतिकता:  
    • अंबेडकर के अनुसार, सामाजिक नैतिकता का निर्माण अंतःक्रिया के माध्यम से किया गया था और इस तरह की अंतःक्रिया मनुष्य की पारस्परिक मान्यता पर आधारित थी।
    • फिर भी जाति और धर्म की कठोर व्यवस्था के तहत इस तरह की बातचीत संभव नहीं थी क्योंकि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को उसके धर्म या जाति की पृष्ठभूमि के कारण एक सम्मानित इंसान के रूप में स्वीकार नहीं करता था।
    • सामाजिक नैतिकता मनुष्यों के बीच समानता और सम्मान की मान्यता पर आधारित थी।
  • संवैधानिक नैतिकता:  
    • अंबेडकर के लिये संवैधानिक नैतिकता किसी देश में लोकतंत्र की व्यवस्था को बनाए रखने के लिये एक शर्त थी।
      • संवैधानिक नैतिकता का अर्थ है संवैधानिक लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों का पालन करना।  
    • उनका मानना था कि केवल वंशानुगत शासन की उपेक्षा के माध्यम से कानून जो सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं और जनप्रतिनिधियों के साथ-साथ एक राज्य जिसमें लोगों का विश्वास है, के माध्यम से लोकतंत्र को बनाए रखा जा सकता है।
    • एक अकेला व्यक्ति या राजनीतिक दल सभी लोगों की ज़रूरतों या इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता।
    • अंबेडकर ने महसूस किया कि नैतिक लोकतंत्र की ऐसी समझ जाति व्यवस्था के साथ-साथ नहीं चल सकती।
      • ऐसा इसलिये था क्योंकि पारंपरिक जाति संरचना एक पदानुक्रमित नियमों पर आधारित थी, जिसमें व्यक्तियों के बीच कोई पारस्परिक सम्मान नहीं था, इसके अतिरिक्त एक समूह का दूसरे समूह पर पूर्ण आधिपत्य था।

अंबेडकर का भारतीय समाज के प्रति दृष्टिकोण: 

  • वर्ण व्यवस्था:
    • भारतीय समाज के बारे में उनके विश्लेषण के अनुसार, हिंदू धर्म में वर्ण व्यवस्था एक विशिष्ट प्रथा है।
      • विशिष्टता एक राजनीतिक सिद्धांत है जहाँ एक समूह बड़े समूहों के हितों की परवाह किये बिना अपने हितों को बढ़ावा देता है। 
    • अंबेडकर के अनुसार, उच्च जातियाँ, नकारात्मक विशिष्टता (अन्य समूहों पर उनका प्रभुत्त्व) को सार्वभौमिक तौर पर अपनाती हैं और नकारात्मक सार्वभौमिकता नैतिकता को विशिष्ट बनाती है (जिसमें जाति व्यवस्था एवं कुछ समूहों के अलगाव को उचित ठहराया जाता है)।  
    • यह नकारात्मक सामाजिक संबंध मुख्यतः 'अलोकतांत्रिक' है।
    • इस तरह के अलगाव से लड़ने के लिये ही अंबेडकर ने बौद्ध धर्म के लोकतांत्रिक आदर्शों को आधुनिक लोकतंत्र के विचार-विमर्श में लाने का प्रयास किया।
  • लोकतंत्र में धर्म की भूमिका:
    • अंबेडकर के अनुसार, लोकतंत्र का जन्म धर्म से हुआ है तथा इसके बिना जीवन असंभव है।
    • इस प्रकार धर्म के पहलुओं को पूरी तरह से हटा नहीं सकते क्योंकि यह लोकतंत्र के नए संस्करण का पुनर्निर्माण करने का प्रयास करता है जो बौद्ध धर्म जैसे धर्मों के लोकतांत्रिक पहलुओं को अपनाता है।
    • अंत में अंबेडकर महसूस करते हैं कि लोकतांत्रिक जीवन को जीने के लिये समाज में सिद्धांतों और नियमों को अलग करना आवश्यक है।
    • बुद्ध और उनके धम्म के बारे में अंबेडकर व्याख्या करते हैं कि कैसे धम्म, जिसमें प्रज्ञा या सोच व समझ, सिला या अच्छे कार्य और अंत में करुणा या दया शामिल है,  एक 'नैतिक रूप से परिवर्तनकारी' अवधारणा के रूप में उभरता  है जो प्रतिगामी सामाजिक संबंधों को तोड़ता है।

लोकतांत्रिक कार्य करने के लिये अंबेडकर द्वारा रखी गई शर्तें: 

  • समाज में असमानताओं से निपटना:
    • समाज में कोई स्पष्ट असमानता और उत्पीड़ित वर्ग नहीं होना चाहिये।
    • कोई एक ऐसा वर्ग नहीं होना चाहिये जिसके पास सभी विशेषाधिकार हों और न ही एक ऐसा वर्ग जिस पर सभी उत्तरदायित्त्व हों।
  • मज़बूत विपक्ष:
    • उन्होंने एक मज़बूत विपक्ष के अस्तित्त्व पर ज़ोर दिया।
    • लोकतंत्र का मतलब है वीटो पावर। लोकतंत्र वंशानुगत प्राधिकरण या निरंकुश प्राधिकरण का विरोधाभास है, जहाँ चुनाव एक आवधिक वीटो के रूप में कार्य करते हैं जिसमें लोग एक सरकार के गठन हेतु वोट देते हैं और संसद में विपक्ष एक तत्काल वीटो के रूप में कार्य करता है जो सत्ता में सरकार की निरंकुश प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाता है।
  • स्वतंत्रता:
    • इसके अतिरिक्त उन्होंने तर्क दिया कि संसदीय लोकतंत्र स्वतंत्रता के लिये एक जुनून पैदा करता है; विचारों और मतों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता, सम्मानपूर्ण जीवन जीने की स्वतंत्रता, जिसका मूल्य हो वह कार्य करने की स्वतंत्रता।
    • लेकिन हम कमज़ोर विपक्ष के साथ मानव स्वतंत्रता सूचकांक में भारत की समानांतर गिरावट और इसके परिणामस्वरूप लोकतांत्रिक साख में गिरावट देख सकते हैं।
  • कानून और प्रशासन में समानता:
    • अंबेडकर ने कानून और प्रशासन में समानता को भी बरकरार रखा।  
    • सभी के साथ समानता का व्यवहार किया जाना चाहिये और वर्ग, जाति, लिंग, नस्ल आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिये।  
    • उन्होंने संवैधानिक नैतिकता के विचार को आगे बढ़ाया। 
      • उनके लिये संविधान केवल कानूनी कंकाल है, लेकिन मांस वह है जिसे वह संवैधानिक नैतिकता कहते हैं।  

 UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्षों के प्रश्न (PYQs)  

प्रश्न. निम्नलिखित में से किन दलों की स्थापना डॉ. बीआर अंबेडकर ने की थी? (2012)

  1. द पीजेंट्स एंड वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया 
  2. अखिल भारतीय अनुसूचित जाति संघ
  3.  स्वतंत्र लेबर पार्टी

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: B

  • द पीजेंट्स एंड वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया का गठन वर्ष 1947 में पुणे के केशवराव जेधे, शंकरराव मोरे और अन्य लोगों द्वारा किया गया था। अतः कथन 1 सही नहीं है।
  • अखिल भारतीय अनुसूचित जाति संघ की स्थापना वर्ष 1942 में बीआर अंबेडकर ने की थी और इस पार्टी ने वर्ष 1946 के आम चुनावों में भाग लिया था। अतः 2 सही है।
  • स्वतंत्र लेबर पार्टी (आईएलपी) का गठन भी वर्ष 1936 में बीआर अंबेडकर द्वारा किया गया था, जिसने बॉम्बे के प्रांतीय चुनावों में भाग लिया था। अतः 3 सही है।

अतः विकल्प (b) सही उत्तर है।

स्रोत: द हिंदू

एसएमएस अलर्ट
Share Page