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भारतीय राजनीति

कोर्ट मार्शल

  • 10 Mar 2023
  • 4 min read

प्रिलिम्स के लिये:

कोर्ट मार्शल, न्यायालयी जाँच (कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी), सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम, FIR, दंड प्रक्रिया संहिता।

मेन्स के लिये:

आरोपियों के लिये कोर्ट मार्शल और वैधानिक शरण।

चर्चा में क्यों?

वर्ष 2020 में जम्मू-कश्मीर के शोपियां ज़िले के अमशीपोरा में तीन लोगों की हत्या में शामिल एक कैप्टन को सैन्य न्यायालय द्वारा आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई। हालाँकि उत्तरी सेना के कमांडर द्वारा पुष्टि किये जाने के पश्चात् सज़ा को अंतिम रूप दिया जाएगा।

  • न्यायालयी जाँच (CoI) के पश्चात् कैप्टन का कोर्ट-मार्शल किया गया था और बाद में सबूतों का विश्लेषण करने पर पाया गया कि कैप्टन के आदेश के तहत सैनिकों ने सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम के अंतर्गत अपने अधिकार की सीमा को पार किया था।

कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया:

  • जब सेना चाहती है कि उसके कर्मियों के खिलाफ लगे आरोपों की जाँच हो, तो वह पहले इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये एक न्यायालयी जाँच (CoI) सुनिश्चित करती है।
  • न्यायालयी जाँच शिकायत की पुष्टि करती है लेकिन सज़ा नहीं दे सकती। COI गवाहों के बयान दर्ज करती है, जो दंड प्रक्रिया संहिता (CRPC) की धारा 161 के तहत एक पुलिस अधिकारी द्वारा गवाहों की जाँच के समान है।
  • COI के निष्कर्षों के आधार पर आरोपी अधिकारी के लिये कमांडिंग ऑफिसर द्वारा एक अस्थायी आरोप पत्र तैयार किया जाता है।
    • उसके बाद आरोपों को सुना जाता है (जैसे नागरिकों से जुड़े मामले में मजिस्ट्रेट द्वारा अभियुक्त को प्रारंभिक समन देना) फिर साक्ष्य का सारांश दर्ज किया जाता है।
  • एक बार यह प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद एक जनरल कोर्ट मार्शल (General Court Martial- GCM) को नागरिक मामलों के लिये न्यायिक अदालत द्वारा परीक्षण के संचालन के समान आदेश दिया जाता है।

कानूनी प्रावधान:

  • सेना अधिनियम 1950 की धारा 164 के तहत अभियुक्त एक पूर्व-पुष्टि याचिका के साथ-साथ एक पश्च-पुष्टि याचिका दायर कर सकता है।
    • पूर्व-पुष्टि याचिका सेना कमांडर को भेजी जाएगी, जो इसकी विशेषताओं पर विचार करेगा।
    • चूँकि अधिकारी को बरखास्त कर उसकी रैंक छीन ली जाती है और उसे सेवा से निकाल दिया जाता है तथा सेना के कमांडर द्वारा सज़ा की पुष्टि करने के बाद सरकार को सिफारिस की जाती है।
  • इन विकल्पों के समाप्त हो जाने के बाद अभियुक्त सशस्त्र बल अधिकरण का दरवाज़ा खटखटा सकता है, जो सज़ा को निलंबित कर सकता है।
    • उदाहरण के लिये वर्ष 2017 में अधिकरण ने वर्ष 2010 के माछिल फर्ज़ी मुठभेड़ मामले में दो अधिकारियों सहित पाँच सैन्यकर्मियों को दी गई उम्रकैद की सज़ा को निलंबित कर दिया था।

स्रोत: जनसत्ता

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