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आपराधिक कानून सुधार पर समिति

  • 06 Jul 2020
  • 9 min read

प्रीलिम्स के लिये

गवाह संरक्षण योजना, विधि आयोग

मेन्स के लिये

भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत सरकार के गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) ने आपराधिक कानून में सुधार के लिये एक राष्ट्रीय स्तर की समिति का गठन किया है।

प्रमुख बिंदु: 

  • आपराधिक कानून में सुधार के लिये गठित की गई राष्ट्रीय स्तर की समिति में दिल्ली की ‘नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी’ के कुलपति रणबीर सिंह सहित न्यायिक क्षेत्र  के विशेषज्ञों को शामिल किया गया है।
  • यह समिति विशेषज्ञों के साथ परामर्श करके अपनी रिपोर्ट के लिये ऑनलाइन राय एकत्रित करेगी।
  • रिपोर्ट की यह प्रक्रिया 4 जुलाई, 2020 से शुरू होगी और अगले तीन महीने तक चलेगी। 

आपराधिक न्याय प्रणाली की पृष्ठभूमि: 

  • भारत में आपराधिक कानूनों का संहिताकरण (Codification) ब्रिटिश शासन के दौरान किया गया था जो कमोबेश 21वीं सदी में भी उसी तरह ही है।
  • लॉर्ड थॉमस बबिंगटन मैकाले (Lord Thomas Babington Macaulay) को भारत में आपराधिक कानूनों के संहिताकरण का मुख्य वास्तुकार कहा जाता है।
    • वर्ष 1834 में स्थापित भारत के पहले विधि आयोग की सिफारिशों पर चार्टर एक्ट-1833 के तहत वर्ष 1860 में आपराधिक कानूनों के संहिताकरण के लिये मसौदा तैयार किया गया था। और इसे वर्ष 1862 के शुरुआती ब्रिटिश काल के दौरान ब्रिटिश भारत में लागू किया गया।
  • भारत में आपराधिक कानून भारतीय दंड संहिता, 1860 (Indian Penal Code, 1860), आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 (Code of Criminal Procedure, 1973) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (Indian Evidence Act, 1872) आदि के तहत संचालित होते हैं।

सुधार की आवश्यकता:

  • औपनिवेशिक काल के आपराधिक कानून: आपराधिक न्याय प्रणाली ब्रिटिश औपनिवेशिक न्यायशास्त्र की प्रतिकृति है जिसे राष्ट्र पर शासन करने के उद्देश्य से बनाया गया था न कि नागरिकों की सेवा करने के लिये।
  • प्रभाव-शून्‍यता: आपराधिक न्याय प्रणाली का उद्देश्य निर्दोषों के अधिकारों की रक्षा करना और दोषियों को दंडित करना था किंतु आजकल यह प्रणाली आम लोगों के उत्पीड़न का एक उपकरण बन गई है।
  • विचाराधीन आपराधिक मामलों का बढ़ता बोझ: आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के अनुसार, न्यायिक प्रणाली में (विशेष रूप से ज़िला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में) लगभग 3.5 करोड़ मामले लंबित हैं। 
  • अंडरट्रायल मामलों की बढ़ती संख्या: भारत, दुनिया के सबसे अधिक अंडरट्रायल कैदियों की संख्या वाला देश है। 
    • वर्ष 2015 की एनसीआरबी-प्रिज़न स्टैटिस्टिक्स इंडिया (NCRB-Prison Statistics India) के अनुसार, जेल में बंद कुल जनसंख्या का 67.2% अंडरट्रायल कैदी हैं।
  • जाँच पड़ताल में देरी: भ्रष्टाचार, काम का बोझ और पुलिस की जवाबदेही न्याय की तेज़ और पारदर्शी न्याय देने में एक बड़ी बाधा है।
  • माधव मेनन समिति: इस समिति ने वर्ष 2007 में भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली (Criminal Justice System of India- CJSI) में सुधारों पर विभिन्न सिफारिशों का सुझाव देते हुए अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
  • मालीमठ समिति की रिपोर्ट: इस समिति ने वर्ष 2003 में भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली (CJSI) पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

    • इस समिति ने कहा था कि मौजूदा प्रणाली ‘अभियुक्तों के पक्ष में अधिक झुकी हुई है और इसमें अपराध पीड़ितों के लिये न्याय पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।

    • इस समिति ने भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली (CJSI) में सुधार हेतु विभिन्न सिफारिशें प्रदान की हैं किंतु इन्हें लागू नहीं किया गया था।

सुधार के सुझाव: 

  • ‘आपराधिक कानून’ को एक राज्य एवं उसके नागरिकों के बीच संबंधों की सबसे स्पष्ट अभिव्यक्ति माना जाता है इसलिये भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में किसी भी संशोधन को कई सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिये।
    • अपराध पीड़ितों के अधिकारों की पहचान करने के लिये कानूनों में सुधार हेतु ‘पीड़ित होने का कारण’ पर खास तौर पर ज़ोर दिया जाना चाहिये। उदाहरण: पीड़ित एवं गवाह संरक्षण योजनाओं का शुभारंभ, अपराध पीड़ित बयानों का उपयोग, आपराधिक परीक्षणों में पीड़ितों की भागीदारी में वृद्धि, मुआवजे एवं पुनर्स्थापन हेतु पीड़ितों की पहुँच में वृद्धि।
  • नए अपराधों के निर्माण और अपराधों के मौजूदा वर्गीकरण के पुनर्मूल्यांकन को आपराधिक न्यायशास्त्र के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित किया जाना चाहिये जो पिछले चार दशकों में काफी बदल गए हैं। 
    • उदाहरण: ‘दंड की डिग्री’ (Degree of Punishments) देने के लिये आपराधिक दायित्व को बेहतर तरीके से वर्गीकृत किया जा सकता है। नए प्रकार के दंड जैसे- सामुदायिक सेवा आदेश, पुनर्स्थापन आदेश तथा पुनर्स्थापना एवं सुधारवादी न्याय के अन्य पहलू भी इसकी तह में लाए जा सकते हैं।
  • अपराधों का वर्गीकरण भविष्य में होने वाले अपराधों के प्रबंधन के लिये अनुकूल तरीके से किया जाना चाहिये।
    • IPC के कई अध्यायों में दुहराव की स्थिति हैं। लोक सेवकों के खिलाफ अपराध, अधिकारियों की अवमानना, सार्वजनिक शांति और अतिचार पर अध्यायों को फिर से परिभाषित एवं संकुचित किया जा सकता है।
  • किसी कार्य को एक अपराध के रूप में सूचीबद्ध करने से पहले पर्याप्त बहस के बाद ही मार्गदर्शक सिद्धांतों को विकसित किया जाना चाहिये।
    • असैद्धांतिक अपराधीकरण न केवल अवैज्ञानिक आधार पर नए अपराधों के निर्माण की ओर जाता है बल्कि आपराधिक न्याय प्रणाली में मनमानी भी करता है।
  • एक ही तरह के अपराधों के लिये अलग-अलग तरीके से सजा का प्रावधान और सजा की प्रकृति को तय करने में न्यायाधीशों का विवेक ‘न्यायिक पूर्वदाहरण’ या ‘न्यायिक मिसाल’ (Judicial Precedent) के सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिये।

आगे की राह:

  • भारत को एक स्पष्ट नीति मसौदा तैयार करना होगा जो मौजूदा आपराधिक कानूनों में परिकल्पित किये जाने वाले परिवर्तनों की सूचना दे। इसके लिये पुलिस, अभियोजन, न्यायपालिका एवं जेल सुधार को एक साथ करने की आवश्यकता होगी।
  • आपराधिक कानूनों में सुधार, मुख्य रूप से समाज में शांति लाने के लिये ‘सुधारवादी न्याय’ पर आधारित होना चाहिये। 

स्रोत: द हिंदू

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