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चीन का नया हाई-टेक विमान-वाहक पोत फुजियान

  • 04 Jul 2022
  • 11 min read

प्रिलिम्स के लिये:

फ़ुज़ियान, ईएमएएलएस, कैटापोल्ट्स, दक्षिण चीन सागर।

मेन्स के लिये:

चीन का विमानवाहक पोत फ़ुजियान और भारत की चिंता, प्रौद्योगिकी का स्वदेशीकरण

चर्चा में क्यों?

हाल ही में चीन ने अपने पहले नई पीढ़ी के स्वदेशी विमान-वाहक पोत (Indigenous Aircraft Carrier), टाइप 003, फुजियान (Type 003, Fujian) का अनावरण किया।

  • अमेरिका के बाद अब चीन के पास सबसे अधिक विमान-वाहक पोत हैं।

 फुजियान

  • फुजियान के बारे में:
    • फुजियान का नाम चीन के पूर्वी तटीय प्रांत के नाम पर रखा गया है जो ताइवान के पास स्थित है।
    • फुजियान वर्तमान में चीन द्वारा संचालित दो अन्य वाहकों में शामिल है जिनमें पहला शेडोंग (टाइप 001) है जिसे वर्ष 2019 में कमीशन किया गया तथा दूसरा लियाओनिंग (टाइप 002), जिसे वर्ष 1998 में यूक्रेन से सेकेंड-हैंड खरीदा गया।
      • टाइप 003 विमान-वाहक पोत अपने पूर्ववर्तियों शेडोंग और लियाओनिंग की तुलना में तकनीकी रूप से अधिक उन्नत है।
  • विशेषताएँ:
    • फुजियान का कुल भार 80,000 टन है, जो मौजूदा चीनी वाहकों की तुलना में बहुत अधिक है और अमेरिकी नौसेना के विमान-वाहक पोतों के बराबर है।
    • फुजियान को नवीनतम लॉन्च तकनीक- इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एयरक्राफ्ट लॉन्च सिस्टम (Electromagnetic Aircraft Launch System- EMALS) से सुसज्जित किया गया है, जिसे पहले अमेरिकी नौसेना द्वारा विकसित किया गया था।
    • इसमें टेक-ऑफ और लैंडिंग हेतु एक सीधा फ्लैट-टॉप फ्लाइट डेक भी मौजूद है।
      • दो मौजूदा जहाज़ स्की जंप-स्टाइल रैंप (Ski Jump-Style Ramp) मौजूद हैं। स्की-जंप एक ऊपर की ओर घुमावदार रैंप होता है जिसका उपयोग विमान द्वारा रनवे के रूप में किया जाता है तथा यह विमान के आवश्यक टेक-ऑफ रोल से छोटा होता है।

चीन के लिये इस विमान का महत्त्व:

  • चीन ने लगभग पूरे दक्षिण चीन सागर पर दावा किया है और ताइवान को चीनी मुख्य भूमि से अलग करने वाले जलडमरूमध्य में शक्ति के प्रदर्शन के रूप में नौसेना तैनात की है।
  • फुजियान के साथ चीन को दक्षिण चीन सागर और ताइवान जलडमरूमध्य में काम करने के लिये और अधिक जगह मिलने की संभावना है।
  • हिंद महासागर में भारतीय नौसेना की एक बड़ी उपस्थिति है, लेकिन फुज़ियान की क्षमताएँ चीन को भारत के क्षेत्र में जाने का रास्ता प्रदान करती हैं, जहाँ वह अपनी उपस्थिति बढ़ा रही है।
  • चीन ने पहले ही श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह को कर्ज के एवज में लीज़ के तौर पर हासिल कर लिया है, चीन अरब सागर पर पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह का आधुनिकीकरण कर रहा है और रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण ‘हॉर्न ऑफ अफ्रीका, राष्ट्र जिबूती में अपने नौसैनिक अड्डे का विस्तार कर रहा है।
  • हालाँकि भले ही चीन अपनी सैन्य शक्ति का विस्तार कर रहा है परंतु यू.एस. बहुत आगे है। वर्तमान में संयुक्त राज्य अमेरिका 11 परमाणु-संचालित जहाज़ों के साथ विमान वाहक के क्षेत्र में दुनिया में अग्रणी है, इसके बाद चीन, ब्रिटेन और इटली का स्थान है।

EMALS:

  • परिचय:
    • यह एक प्रक्षेप्य प्रणाली है जो हवाई जहाज़ों को अतिरिक्त दबाव देने में मदद करती है। एक बार जब प्रक्षेपक को छोड़ दिया जाता है, तो इससे जुड़ा विमान थोड़े समय में बड़ी गति के साथ आगे बढ़ता है, जो इसे रनवे के अंत तक पहुँचने से पहले उड़ान भरने के लिये आवश्यक गति प्राप्त करने में मदद करता है।
      • प्रक्षेपक ‘असिस्टेड टेक-ऑफ बट अरेस्ट रिकवर’ या कैटोबार ऐसी ही एक प्रणाली है। इसमें एक विमान प्रक्षेपक की मदद से पूरी तरह से सपाट स्थान (डैक) से उड़ान भरता है।
    • प्रक्षेप्य प्रणाली दो प्रकार की होती है- भाप से चलने वाली और विद्युत चुंबकीय प्रणाली जिन्हें EMALS कहा जाता है।
      • पूर्व प्रक्षेप्य प्रणाली में आग दहन के लिये वाष्प दाब का उपयोग किया जाता था, EMALS रैखिक प्रेरण मोटर्स का उपयोग करता है। उत्पन्न विद्युत चुंबकीय बल का उपयोग विमान को जाने के लिये किया जाता है।
      • स्टीम कैटापोल्ट्स की तुलना में EMALS अधिक विश्वसनीय है, इसमें कम रखरखाव की आवश्यकता होती है, तेज़ी से रिचार्ज होता है, वाहक पर ज़्यादा जगह नहीं लेता है और ऊर्जा कुशल होता है।
  • भारत की स्थिति:
    • वर्ष 2017 में अमेरिका ने भारत को अपनी EMALS तकनीक प्रदान की जिसे अमेरिकी रक्षा कंपनी जनरल एटॉमिक्स एरोनॉटिकल सिस्टम्स इंक द्वारा विकसित किया गया था।
    • भारत ने इस प्रणाली को स्थापित करने की संभावना का पता लगाया, लेकिन नौसेना ने बजट की कमी के कारण योजना को छोड़ दिया।
    • हालाँकि बंगलूरू में राज्य के स्वामित्व वाली भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड कथित तौर पर एक EMALS मॉडल पर काम कर रही है जिसे निकट भविष्य में भारतीय युद्धपोतों पर CATOBAR संचालन के लिये परीक्षण किया जा सकता है।

भारत में विमान-वाहक की स्थिति:

  • आईएनएस विक्रमादित्य:
    • यह भारतीय नौसेना का सबसे बड़ा विमान-वाहक पोत है और रूसी नौसेना के सेवामुक्त एडमिरल गोर्शकोव/बाकू से परिवर्तित युद्धपोत है।
    • आईएनएस विक्रमादित्य एक संशोधित कीव-श्रेणी का विमान-वाहक पोत है जिसे नवंबर 2013 में सेवा में अधिकृत किया गया था।
    • यह एक कोणीय स्की-जंप के साथ शॉर्ट टेक-ऑफ लेकिन अरेस्ट रिकवरी या STOBAR तंत्र पर काम करता है।
      • STOBAR एक विमान-वाहक के डेक से विमान के प्रक्षेपण और पुनर्प्राप्ति के लिये उपयोग की जाने वाली प्रणाली है, जो "कैटापल्ट-असिस्टेड टेक-ऑफ बट अरेस्ट रिकवरी" के साथ "शॉर्ट टेक-ऑफ एंड वर्टिकल लैंडिंग" के तत्त्वों को जोड़ती है।
  • आईएनएस विक्रांत:

विगत वर्षों के प्रश्न:

प्रश्न: निम्नलिखित में से कौन सा 'आईएनएस अस्त्रधारिणी' का सबसे अच्छा वर्णन है, जो हाल ही में खबरों में था? (2016) 

(a) उभयचर (एम्फिब) युद्ध जहाज़
(b) परमाणु संचालित पनडुब्बी
(c) टारपीडो लॉन्च और रिकवरी पोत
(d) परमाणु संचालित विमान वाहक

उत्तर: (c)

व्याख्या:

  • आईएनएस अस्त्रधारिणी एक स्वदेश निर्मित टॉरपीडो लॉन्च और रिकवरी पोत है। इसे 6 अक्तूबर, 2015 को कमीशन किया गया था।
  • अस्त्रधारिणी का डिजाइन नौसेना विज्ञान और प्रौद्योगिकी प्रयोगशाला (NSTL), शाफ़्ट शिपयार्ड तथा आईआईटी खड़गपुर का एक सहयोगात्मक प्रयास था।
  • यह अस्त्रधारिणी के लिये एक उन्नत प्रतिस्थापन है जिसे 17 जुलाई, 2015 को बंद कर दिया गया था।
  • इसमें कटमरैन के रूप का एक अनूठा डिज़ाइन है जो इसकी बिजली की आवश्यकता को काफी कम करता है और इसे स्वदेशी स्टील के साथ बनाया गया है।
  • यह उच्च समुद्री राज्यों में काम कर सकता है और परिक्षणों के दौरान विभिन्न प्रकार के टारपीडो को तैनात करने और पुनर्प्राप्त करने के लिये टारपीडो लॉन्चर्स के साथ एक बड़ा डेक क्षेत्र है।
  • जहाज़ में आधुनिक बिजली उत्पादन और वितरण, नेविगेशन और संचार प्रणाली भी है।
  • जहाज़ की 95% प्रणालियाँ स्वदेशी डिज़ाइन की हैं, इस प्रकार यह 'मेक इन इंडिया' दृष्टिकोण लिये नौसेना के निरंतर प्रयास को प्रदर्शित करता है।
  • आईएनएस अस्त्रधारिणी का उपयोग डीआरडीओ की नौसेना प्रणाली प्रयोगशाला, एनएसटीएल द्वारा पानी के नीचे हथियारों और प्रणालियों के तकनीकी परीक्षण के लिये विकसित किया जाएगा। अतः विकल्प (C) सही उत्तर है।
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