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फॉरेस्ट-प्लस 2.0 कार्यक्रम

  • 28 Sep 2019
  • 5 min read

चर्चा में क्यों?

यूएस एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (USAID) और भारत के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) ने 25 सितंबर, 2019 को आधिकारिक तौर पर फॉरेस्ट-प्लस 2.0 (Forest-PLUS 2.0) कार्यक्रम लॉन्च कर दिया है।

पृष्ठभूमि

  • फॉरेस्ट-प्लस 2.0, टिकाऊ वन परिदृश्य प्रबंधन के उद्देश्य पर आधारित पायलट प्रोजेक्ट्स फॉरेस्ट-प्लस का दूसरा संस्करण है, जिसने 2017 में अपने पाँच साल पूरे किये हैं।
  • इसका उद्देश्य ‘निर्वनीकरण एवं वन निम्नीकरण से होने वाले उत्सर्जन में कटौती’ (REDD +) में भाग लेने हेतु भारत की क्षमता निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना था।
  • इसमें सिक्किम, रामपुर, शिवमोग्गा और होशंगाबाद के चार पायलट प्रोजेक्ट शामिल थे।
  • इसके अंतर्गत वन प्रबंधन के लिये क्षेत्र परीक्षण, नवीन उपकरण और दृष्टिकोण विकसित किया गया।
  • सिक्किम में जैव-ब्रिकेट्स (Bio-Briquettes) का संवर्द्धन, रामपुर में सौर ताप प्रणाली की शुरुआत और होशंगाबाद में एक कृषि- वानिकी मॉडल का विकास इस कार्यक्रम की कुछ उपलब्धियाँ थीं।
  • बायो-ब्रिकेट्स विकासशील देशों में प्रयोग किया जाने वाले कोयला और चारकोल का जैव-ईंधन विकल्प हैं।

फॉरेस्ट-प्लस 2.0

  • यह दिसंबर 2018 में शुरू किया गया पाँच वर्षीय कार्यक्रम है।
  • यह वन परिदृश्य (Forest Landscape) प्रबंधन हेतु पारितंत्र प्रबंधन और पारिस्थितिकीय सेवाओं के संवर्द्धन के लिये उपकरणों और तकनीकों का विकास करने पर केंद्रित है।
  • अमेरिका की एक परामर्शदात्री और इंजीनियरिंग कंपनी टेट्रा टेक ARD को कार्यक्रम लागू करने का दायित्व सौंपा गया है और नई दिल्ली स्थित IORA इकोलॉजिकल सॉल्यूशंस नामक पर्यावरण सलाहकार समूह इसका कार्यान्वयन भागीदार है।
  • फॉरेस्ट-प्लस 2.0 में तीन भू-परिदृश्यों (Landscapes) में पायलट प्रोजेक्ट्स शामिल हैं - बिहार में गया, केरल में तिरुवनंतपुरम और तेलंगाना में मेडक।
  • इन स्थलों का चयन उनके भू-परिदृश्यों में विविधता के आधार पर किया गया है।
  • बिहार एक वनाभाव वाला क्षेत्र है, तेलंगाना अपेक्षाकृत एक सूखा क्षेत्र है जहाँ सामुदायिक आजीविका संवृद्धि की पर्याप्त संभावना है और केरल जैव-विविधता से समृद्ध है।

फॉरेस्ट-प्लस 2.0 के लक्ष्य

  • 1,20,000 हेक्टेयर भूमि का बेहतर प्रबंधन।
  • 12 मिलियन डॉलर मूल्य की नई और समावेशी आर्थिक गतिविधियाँ।
  • 800,000 घरों को लाभान्वित करना।
  • पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के लिये भू-परिदृश्य के प्रबंधन में तीन प्रोत्साहन तंत्रों का प्रदर्शन।

इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये कार्यक्रम की कार्रवाई के तीन केंद्रबिंदु निम्नलिखित हैं-

  1. वन प्रबंधन में कई सेवाओं के लिये उपकरण विकसित करना। जैसे स्वचालित वन नियोजन प्रक्रियाओं और मॉडल वन प्रबंधन योजनाओं के लिये नवाचारी एप्स। परिणामस्वरूप जल प्रवाह और गुणवत्ता, आजीविका एवं वनाश्रित समुदायों के लचीलेपन आदि में सुधार होने की आशा है।
  2. वित्तीयन का लाभ उठाने के लिये प्रोत्साहन-आधारित उपकरणों का विकास करना। उदाहरण के लिये ऐसे भुगतान तंत्र का विकास जिसमे एक नगरपालिका या उद्योग डाउनस्ट्रीम जल के उपयोग के लिये अपस्ट्रीम वन समुदायों को भुगतान करे ताकि वनों का बेहतर संरक्षण हो सके।
  3. वनों पर निर्भर लोगों के लिये आर्थिक अवसरों के सृजन हेतु मॉडल्स और संरक्षण उद्यमों की स्थापना करना तथा निजी क्षेत्र से निवेश जुटाना।

स्रोत : टाइम्स ऑफ इंडिया

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