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भारतीय अर्थव्यवस्था

भारत और मुक्त व्यापार समझौते

  • 04 Jan 2022
  • 11 min read

प्रिलिम्स के लिये:

मुक्त व्यापार समझौता (FTA), क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP), CECPA, SAFTA, APTA

मेन्स के लिये:

भारत के लिये मुक्त व्यापार समझौते (FTA) से संबंधित मुद्दे, भारत के विभिन्न व्यापार समझौते और आर्थिक विकास में इनकी भूमिका, भारत-इज़रायल संबंध, भारत की विदेशी व्यापार नीति।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने कहा कि भारत एक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के समापन हेतु इजरायल के साथ वार्ता कर रहा है।

  • यह घोषणा दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना की 30वीं वर्षगाँठ के साथ मेल खाती है।

प्रमुख बिंदु

  • मुक्त व्यापार समझौता (FTA)
    • यह दो या दो से अधिक देशों के बीच आयात और निर्यात में बाधाओं को कम करने हेतु किया गया एक समझौता है।
    • एक मुक्त व्यापार नीति के तहत वस्तुओं और सेवाओं को अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं के पार खरीदा एवं बेचा जा सकता है, जिसके लिये बहुत कम या न्यून सरकारी शुल्क, कोटा तथा सब्सिडी जैसे प्रावधान किये जाते हैं।
    • मुक्त व्यापार की अवधारणा व्यापार संरक्षणवाद या आर्थिक अलगाववाद (Economic Isolationism) के विपरीत है।
  • भारत तथा मुक्त व्यापार समझौते:
    • नवंबर 2019 में भारत के क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) से बाहर होने के बाद, 15 सदस्यीय FTA समूह जिसमें जापान, चीन और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं, भारत के लिये निष्क्रिय हो गया।
    • लेकिन मई 2021 में यह घोषणा हुई कि भारत-यूरोपीय संघ की वार्ता, जो 2013 से रुकी हुई थी, फिर से शुरू की जाएगी।
      • कार्य संबंधी इन विभिन्न पहलुओं को आगे बढ़ाने के लिये दोनों पक्ष अब आंतरिक तैयारियों में लगे हुए हैं।
    • भारत के द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौतों को लेकर संयुक्त अरब अमीरात, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा के साथ बातचीत की जा रही है।
    • यूएई के साथ यह समझौता 'अंतिम रूप देने के करीब' था जबकि ऑस्ट्रेलिया के साथ एफटीए 'बहुत उन्नत चरण' में था।
  • भारत के अन्य महत्त्वपूर्ण व्यापार समझौते:
    • भारत और मॉरीशस के बीच व्यापक आर्थिक सहयोग और भागीदारी समझौता (सीईसीपीए)।
    • दक्षिण एशिया तरजीही व्यापार समझौता (SAPTA): यह सदस्य देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा देने के लिये 1995 में लागू हुआ था।
    • दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र (साफ्टा): यह मुक्त व्यापार समझौता, सूचना प्रौद्योगिकी जैसी सभी सेवाओं को छोड़कर, सामान तक ही सीमित है। वर्ष 2016 तक सभी व्यापारिक वस्तुओं के सीमा शुल्क को शून्य करने के लिये समझौते पर हस्ताक्षर किये गए थे।
    • एशिया प्रशांत व्यापार समझौता (एपीटीए):
      • बैंकाक समझौता, यह एक तरजीही टैरिफ व्यवस्था है जिसका उद्देश्य सदस्य देशों द्वारा पारस्परिक रूप से सहमत रियायतों के आदान-प्रदान के माध्यम से अंतर-क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देना है।
  • भारत की विदेश व्यापार नीति संबंधी मुद्दे:
    • खराब विनिर्माण क्षेत्र: हाल की अवधि में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी 14% है।
    • जर्मनी, अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे उन्नत और विकसित देशों के तुलनीय आँकड़े क्रमशः 19%, 11%, 25% और 21% हैं।
      • चीन, तुर्की, इंडोनेशिया, रूस, ब्राज़ील जैसे उभरते और विकासशील देशों के लिये संबंधित आंँकड़े क्रमशः 27%, 19%, 20%, 13%, 9% हैं तथा कम आय वाले देशों के लिये यह हिस्सा 8% है।
    • प्रतिकूल FTA’s: पिछले एक दशक में भारत ने दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्र संघ (आसियान), कोरिया गणराज्य, जापान और मलेशिया के साथ  FTA पर हस्ताक्षर किए।
      • हालाँकि काफी हद तक यह माना जाता है कि भारत के व्यापार भागीदारों को भारत की तुलना में इन समझौतों से अधिक लाभ हुआ है।
    • संरक्षणवाद: आत्मनिर्भर भारत अभियान ने इस विचार को और बढ़ा दिया है कि भारत तेज़ी से एक संरक्षणवादी बंद बाज़ार अर्थव्यवस्था बनता जा रहा है।

भारत-इज़रायल संबंध

  • ऐतिहासिक संबंध:
    • दोनों देशों के बीच सामरिक सहयोग 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान शुरू हुआ।
    • 1965 में इज़रायल ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में भारत को M-58 160-mm मोर्टार गोला बारूद की आपूर्ति की।
    • यह उन कुछ देशों में से एक था जिसने 1998 में भारत के पोखरण परमाणु परीक्षणों की निंदा नहीं करने का फैसला किया था।
  • आर्थिक:
    • भारत एशिया में इज़राइल का तीसरा सबसे बड़ा व्यापार भागीदार है और विश्व स्तर पर सातवां सबसे बड़ा व्यापार भागीदार है।
    • दोनों देशों के बीच वर्तमान में 4.14 बिलियन अमेरिकी डॉलर का व्यापार है (अप्रैल 2020 - फरवरी 2021), एक ऐसा आंँकड़ा जिसमें रक्षा व्यापार शामिल नहीं है जो बढ़ रहा है।
    • इजरायल की कंपनियों ने भारत में ऊर्जा, नवीकरणीय ऊर्जा, दूरसंचार, रियल एस्टेट, जल प्रौद्योगिकियों में निवेश किया है और भारत में अनुसंधान एवं विकास केंद्र या उत्पादन इकाइयां स्थापित करने पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं।
    • इज़रायल-भारत औद्योगिक अनुसंधान एवं विकास और तकनीकी नवाचार कोष (I4F) से पहले अनुदान प्राप्तकर्त्ता की घोषणा जुलाई 2018 में की गई थी, जिसमें कुशल जल उपयोग, संचार बुनियादी ढाँचे में सुधार, सौर ऊर्जा उपयोग के माध्यम से भारतीयों और इज़रायलियों के जीवन को बेहतर बनाने हेतु काम करने वाली कंपनियों को शामिल किया गया है। 
      • इस फंड का उद्देश्य इज़रायली उद्यमियों को भारतीय बाज़ार में प्रवेश कराने में मदद करना है।
  • रक्षा:
    • इज़रायल लगभग दो दशकों से भारत के शीर्ष चार हथियार आपूर्तिकर्त्ताओं में से एक है, हर वर्ष लगभग 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर की सैन्य बिक्री होती है।
    • भारतीय सशस्त्र बलों ने पिछले कुछ वर्षों में इज़रायली हथियार प्रणालियों की एक विस्तृत शृंखला को शामिल किया है, इसमें फाल्कन AWACS (हवाई चेतावनी और नियंत्रण प्रणाली) तथा हेरॉन, सर्चर-द्वितीय तथा हारोप ड्रोन से लेकर बराक एंटी मिसाइल रक्षा प्रणालियों और स्पाइडर विमान भेदी मिसाइल प्रणाली शामिल हैं।
    • अधिग्रहण में कई इज़रायली मिसाइलें और सटीक-निर्देशित युद्ध सामग्री भी शामिल है, जिसमें ‘पायथन’ और ‘डर्बी’ हवा-से-हवा में मार करने वाली मिसाइलों से लेकर ‘क्रिस्टल मैज़’ तथा स्पाइस-2000 बम शामिल हैं।
    • भारत और इज़रायल के बीच द्विपक्षीय रक्षा सहयोग पर संयुक्त कार्य समूह (JWG) की 15वीं बैठक में, दोनों देश सहयोग के नए क्षेत्रों की पहचान करने के लिये एक व्यापक दस-वर्षीय रोडमैप तैयार करने हेतु एक टास्क फोर्स बनाने पर सहमत हुए हैं।
  • कृषि:
  • कोविड-19 प्रतिक्रिया:
    • वर्ष 2020 में एक इज़रायली टीम बहु-आयामी मिशन के साथ भारत पहुँची, जिसका कोड नेम ‘ऑपरेशन ब्रीदिंग स्पेस’ था, इसे कोविड-19 प्रतिक्रिया पर भारतीय अधिकारियों के साथ काम करने हेतु बनाया गया था।

Israel

आगे की राह 

  • यह देखते हुए कि भारत किसी बड़े-व्यापार सौदे का पक्ष नहीं है, यह एक सकारात्मक व्यापार नीति एजेंडे का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा होगा।
  • भारत के व्यापार नीति ढांँचे को आर्थिक सुधारों द्वारा समर्थित होना चाहिये, जिसके परिणामस्वरूप यह एक खुली, प्रतिस्पर्द्धात्मक और तकनीकी रूप से नवीन भारतीय अर्थव्यवस्था हो।
  • राष्ट्रवाद, देशीवाद और संरक्षणवाद लोगों की इस भावना का फायदा उठाते हैं कि उन्हें पीछे छोड़ दिया जाता है और उन्हें व्यवस्था से बाहर कर दिया जाता है।
  • इसलिये हमें आर्थिक नेटवर्क में सार्वभौमिक समावेश सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है जो व्यक्तियों और परिवारों को वित्तीय सुरक्षा प्राप्त करने और बेहतरी के अवसरों को प्राप्त करने की अनुमति देता है।

स्रोत: द हिंदू  

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