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क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी और भारत

  • 18 Nov 2020
  • 17 min read

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी में भारत के शामिल न होने के निर्णय और भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभावों के साथ इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ: 

हाल ही में 10 आसियान (ASEAN) देशों और उनके 5 अन्य मुक्त व्यापार साझेदार देशों (ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान, न्यूज़ीलैंड तथा दक्षिण कोरिया) के बीच ‘क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी’ (Regional Comprehensive Economic Partnership- RCEP) पर हस्ताक्षर किये गए। भारत ने 7 वर्षों  तक इस समझौते की लंबी वार्ता में शामिल रहने के बाद आखिरी मौके पर इससे अलग रहने का निर्णय लिया। RCEP से अलग रहने के पीछे भारत ने इस समझौते में अपने कई मुद्दों और चिंताओं पर आवश्यकता अनुरूप ध्यान नहीं दिये जाने को बड़ा कारण बताया है। हालाँकि वर्तमान समय में वैश्विक व्यापार और अर्थव्यवस्था में हो रहे बड़े बदलावों के बीच विश्व के सबसे बड़े व्यापारिक समझौते से अलग रहने के भारत के इस निर्णय पर कई विशेषज्ञों ने प्रश्न उठाए हैं। इस समझौते की वार्ताओं के दौरान कई मतभेदों को दूर कर लिया गया था परंतु स्थानीय और छोटे व्यवसायियों के हितों से जुड़े मुद्दे तथा ऐसे ही कई अन्य मामलों में अभी भी भारत की आपत्ति बनी हुई है। 

‘क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी’

(Regional Comprehensive Economic Partnership- RCEP): 

  • क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP), आसियान के दस सदस्य देशों तथा पाँच अन्य देशों (ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और न्यूज़ीलैंड) द्वारा अपनाया गया एक मुक्त व्यापार समझौता (FTA) है।
  • इस समझौते पर 15 नवंबर, 2020 को हस्ताक्षर किये गए।
  • RCEP देश विश्व की एक-तिहाई आबादी और वैश्विक जीडीपी के 30% हिस्से (लगभग 26 ट्रिलियन से अधिक) का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • RCEP की अवधारणा नवंबर 2011 में आयोजित 11 वें आसियान शिखर सम्मेलन के दौरान प्रस्तुत की गई और नवंबर 2012 में कंबोडिया में आयोजित 12वें आसियान शिखर सम्मेलन के दौरान इस समझौते की प्रारंभिक वार्ताओं की शुरुआत की गई।  
  • भारत के साथ अन्य 15 सदस्यों द्वारा इस समझौते पर वर्ष 2019 में हस्ताक्षर किये जाने का अनुमान था परंतु भारत द्वारा नवंबर 2019 में इस समझौते से स्वयं को अलग करने के निर्णय के बाद अब बाकी के 15 देशों  द्वारा RCEP पर हस्ताक्षर किये गए हैं।  

समझौते से अलग होने का कारण: 

RCEP-Members

  • व्यापार घाटा: पिछले कुछ वर्षों के दौरान आसियान और एशिया के कुछ अन्य देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते के परिणामस्वरूप विभिन्न देशों के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार घाटे में ही रहा है।
  • केंद्रीय वित्त मंत्री के अनुसार, मुक्त और वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था के नाम पर भारत में विदेशों से सब्सिडी युक्त उत्पादों के आयात और अनुचित उत्पादन लाभ की गतिविधियों की अनुमति दे दी गई है।
  • केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2018-19 में RCEP के 11 देशों के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार घाटे में रहा।
  • स्थानीय उत्पादकों के हितों की रक्षा:  इस समझौते में शामिल होने के पश्चात् भारत में स्थानीय और छोटे उत्पादकों को कड़ी प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ सकता है। 
  • RCEP समझौते के तहत सदस्य देशों के बीच वस्तुओं के आयात पर लगने वाले टैरिफ को 92% तक कम करने की बात कही गई है।       
  •  उदाहरण के लिये आयात शुल्क में कटौती होने से भारत के कृषि, डेयरी उत्पाद और अन्य ‘सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम’ (MSMEs) जैसे अन्य संवेदनशील क्षेत्रों को क्षति हो सकती है। 
  • गौरतलब है कि वर्ष 2019 में भारत में डेयरी उत्पादों के आयात पर औसत लागू  टैरिफ 34.8%, जबकि औसत बाध्य टैरिफ 63.8% रहा। भारत में दुग्ध उत्पादन उद्योग छोटे स्तर पर परिवारों द्वारा पाले गए पशुओं के योगदान से संचालित होता है, जबकि ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में औद्योगिक स्तर पर आधुनिक विधियों से दुग्ध उत्पादन किया जाता है। 
    • वर्ष 2017 में एक डेयरी फार्म में पशुओं के औसत झुंड का आकार अमेरिका में 191, ओशिनिया में 355, यूनाइटेड किंगडम में 148 और डेनमार्क में 160 था, जबकि भारत यह में सिर्फ 2 ही था।  
  • अन्य मतभेद: इसके अतिरिक्त भारत द्वारा उठाए गए कई मुद्दों जैसे-आयात की सीमा, उत्पाद की उत्पत्ति का स्थान, डेटा सुरक्षा और आधार वर्ष आदि पर भी सहमति नहीं बन सकी।
  • गौरतलब है कि RCEP समझौते के तहत भारत द्वारा ‘रूल्स ऑफ ओरिजिन’ (Rules of Origin) को सख्त बनाने और ऑटो ट्रिगर तंत्र को मज़बूत करने पर ज़ोर दिया गया था, हालाँकि समझौते में इन मुद्दों पर भारत की चिंताओं को दूर करने का अधिक प्रयास नहीं किया गया।
    • रूल्स ऑफ ओरिजिन, किसी उत्पाद की राष्ट्रीयता या राष्ट्रीय स्रोत के निर्धारण के लिये एक महत्त्वपूर्ण मापदंड है। कई मामलों में आयात की गई वस्तुओं पर शुल्क और प्रतिबंध का निर्धारण उनकी राष्ट्रीयता के आधार पर किया जाता है।
    • ऑटो ट्रिगर तंत्र आयात शुल्क में कमी या उसे पूर्णतया समाप्त करने की दशा में आयात में होने वाली अप्रत्याशित वृद्धि को रोकने के लिये एक व्यवस्था है।
    • पिछले कुछ वर्षों में चीन द्वारा दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार समझौता (SAFTA) और बांग्लादेश के ड्यूटी फ्री रूट का लाभ लेकर भारत में कपड़ों के साथ अन्य कई उत्पादों को अत्यधिक मात्रा में पहुँचाया गया है। ऐसे में रूल्स ऑफ ओरिजिन और ऑटो ट्रिगर तंत्र के माध्यम से चीनी उत्पादों के आयात पर नियंत्रण लगाया जा सकता है।
  • इसके अतिरिक्त भारत द्वारा टैरिफ कटौती के लिये वर्ष 2013 की बजाय वर्ष 2019 को आधार वर्ष के रूप में स्वीकार करने की मांग की गई थी। क्योंकि वर्ष 2014-19 के बीच भारत द्वारा कई उत्पादों पर आयात शुल्क में बढ़ोतरी की गई है।
  • साथ ही भारत द्वारा अपने बाज़ार को खोलने के बदले अन्य देशों को भारतीय श्रमिकों और सेवा क्षेत्र के लिये नियमों में ढील देने की मांग की गई थी। 
  • इस समझौते में चीन के साथ तनाव के बीच एक चीनी नेतृत्त्व वाले समझौते में शामिल होना भारत के लिये नई बाधाएँ खड़ी कर सकता है। 

RCEP से अलग होने का प्रभाव:       

  • RCEP से अलग होने के निर्णय के साथ भारत ने क्षेत्र के बड़े बाज़ारों तक अपनी पहुँच बढ़ाने का एक मौका खो दिया है। 
  • भारत के इस निर्णय के बाद RCEP सदस्यों के साथ भारत के द्विपक्षीय व्यापार संबंधों के प्रभावित होने की आशंका भी बढ़ गई है क्योंकि इस समूह में शामिल अधिकांश देश RCEP के अंदर अपने व्यापार को मज़बूत करने को अधिक प्राथमिकता देंगे।
  • ऑस्ट्रेलिया और जापान द्वारा भारत को RCEP में शामिल करने के कई असफल प्रयासों से इस बात की भी चिंता बनी हुई है कि भारत का निर्णय हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत-जापान-ऑस्ट्रेलिया की साझेदारी को प्रभावित कर सकता है। 
  • हमारे पड़ोसी देशों द्वारा भारत पर महत्त्वपूर्ण निर्णयों और योजनाओं के कार्यान्वयन में देरी का आरोप लगाया जाता रहा है। हाल के वर्षों में भारत द्वारा ‘एक्ट ईस्ट नीति’ पर विशेष बल देने के बावजूद  RCEP से बाहर रहने का निर्णय तर्कसंगत नहीं लगता। 

RCEP में शामिल होने के संभावित लाभ: 

  • वर्तमान में COVID-19 महामारी, अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध और ब्रेक्ज़िट (Brexit) के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था में उत्पन्न हुई अनिश्चितता के बीच यह समझौता अर्थव्यवस्था को पुनः गति प्रदान करने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
  • RCEP, सदस्य देशों की अर्थव्यवस्था में सुधार लाने, समावेशी विकास, रोज़गार के अवसरों का विकास और आपूर्ति शृंखला को मज़बूत बनाने में भी सहायक हो सकता है। 
  • हालाँकि इस समझौते में शामिल अन्य देशों जैसे- फिलीपींस और वियतनाम भी चीन के साथ राजनीतिक विवाद के अतिरिक्त द्विपक्षीय व्यापार में बड़े व्यापारिक घाटे का सामना कर रहे हैं, परंतु इन देशों ने वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए इस समझौते में बने रहने का निर्णय लिया है।  
  • RCEP में शुरुआत से ही शामिल होकर भारत समूह के महत्त्वपूर्ण नियमों के निर्धारण की निगरानी और उनमें संशोधन हेतु आवश्यक हस्तक्षेप कर सकता था।

आगे की राह:   

  • RCEP से अलग बने रहने की स्थिति में: 
    • यदि आने वाले दिनों में भी RCEP द्वारा भारत की चिंताओं को दूर नहीं किया जाता है और भारत इस समझौते में शामिल नहीं होता है तो उस स्थिति में भारत को एशिया के प्रमुख देशों के साथ मज़बूत द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर कार्य करना होगा, जिससे RCEP से अलग रहने के कारण होने वाले किसी भी व्यावसायिक नुकसान से बचा जा सके।     
    • साथ ही भारत को मुक्त व्यापार समझौते में शामिल देशों के साथ व्यापार घाटे को शीघ्र ही कम करने के लिये निर्यात बढ़ाने पर विशेष ध्यान देना होगा। इन देशों के अधिकारियों और आर्थिक क्षेत्र प्रतिनिधियों के साथ चर्चा के माध्यम से टैरिफ, गुणवत्ता या अन्य समस्याओं का समाधान किया जाना चाहिये। 
    • भारत को अपने निर्यात में विविधता पर भी विशेष ज़ोर देना होगा, साथ ही विश्व के उन उभरते बाज़ारों में भी निर्यात को बढ़ाने पर ध्यान दिया जाना चाहिये जहाँ भारतीय उत्पादों की पहुँच अभी भी सीमित है। 
    • भारत द्वारा यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को मज़बूत करने के साथ बिम्सटेक (BIMSTEC) जैसे समूहों के माध्यम से क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं के साथ आपूर्ति शृंखला को मज़बूत करने का प्रयास किया जाना चाहिये।
  • RCEP में शामिल होने की स्थिति में:
    • RCEP सदस्यों द्वारा समझौते में भारत की सदस्यता का विकल्प खुला रखा गया है, ऐसे में यदि भविष्य में भारत इस समझौते में शामिल होने का निर्णय लेता है तो उसे अन्य सदस्यों के समक्ष मज़बूती से अपना पक्ष रखना होगा।
    • इस समझौते में शामिल होने के लिये भारत को अपनी अर्थव्यवस्था में बड़े सुधार करने होंगे जिससे इस समझौते का अधिकतम लाभ प्राप्त किया जा सके। 
    • हाल के वर्षों में भारत द्वारा कई व्यापक आर्थिक सुधारों को लागू किया गया है, ‘व्यापार सुगमता सूचकांक’ और ‘वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता सूचकांक’ में अपनी स्थिति को मज़बूत करते हुए वह एक आत्मनिर्भर भारत की दिशा में आगे बढ़ा है।
    • ऐसे में यदि ये सुधार भविष्य में भारत के आधार और प्रतिस्पर्द्धी क्षमता को प्रभावी ढंग से मज़बूत करते हैं, तो भारत RCEP में शामिल होकर अपने विकास की दर को कई गुना बढ़ा सकता है।   

निष्कर्ष:   

वर्तमान समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था में आई गिरावट के बीच RCEP इस चुनौती से बाहर निकलने का एक मज़बूत विकल्प प्रदान करता है। हालाँकि वर्तमान परिस्थिति में चीन, ऑस्ट्रेलिया न्यज़ीलैंड आदि देशों के बड़े उत्पादकों को भारतीय बाज़ार में पहुँच की खुली छूट देना कुछ स्थानीय उद्योगों के लिये एक बड़ी चुनौती का कारण बन सकता है। परंतु 21वीं सदी के वैश्वीकरण के इस दौर में अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धा में शामिल होने के लिये इस संरक्षणवादी नीति को लंबे समय तक नहीं बनाए रखा जा सकता। ऐसे में सरकार को स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला को मज़बूत करते हुए विकास के संभावित क्षेत्रों की पहचान कर लक्षित योजनाओं, निवेश नीति में सुधार आदि के माध्यम से अर्थव्यवस्था को मज़बूती प्रदान करने पर ध्यान देना होगा।

अभ्यास प्रश्न: ‘COVID-19 महामारी के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था में आई गिरावट के बीच  ‘क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी’ अर्थव्यवस्था को पुनः गति प्रदान करने का एक महत्त्वपूर्ण विकल्प हो सकता है।’ इस कथन के संदर्भ में भारत द्वारा इस समझौते से अलग रहने के निर्णय और इसके प्रभावों की समीक्षा कीजिये।

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