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एडिटोरियल

  • 27 Apr, 2020
  • 15 min read
अंतर्राष्ट्रीय संबंध

सुरक्षा परिषद की अस्मिता पर सवाल

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में सुरक्षा परिषद व उससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (United Nations Security Council-UNSC) वैश्विक सुरक्षा प्रबंधन का सबसे बड़ा मंच माना जाता है। इस समय विश्व के समक्ष COVID-19 की महामारी के रूप में जो चुनौती खड़ी हुई है, इसे इक्कीसवीं सदी में मानवता के लिये सबसे बड़ा संकट माना जा रहा है। इस संकट की घड़ी में जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से संकट को समाप्त करने में सक्रिय भूमिका की अपेक्षा थी, तो परिषद स्वयं ही निष्क्रिय अवस्था में है। सुरक्षा परिषद की निष्क्रियता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है इस वैश्विक संकट की घड़ी में सदस्य देश एक-दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं। मानवता के ऊपर मंडरा रहे इस संकट काल में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने घरेलू संघर्ष में उलझे देशों से युद्ध-विराम की अपील की है। लेकिन उनकी अपील के बावज़ूद, संकट के इस वैश्विक परिदृश्य में जिस प्रकार सुरक्षा परिषद अनुपस्थित है, वह वाक़ई एक चिंताजनक स्थिति है।

हालाँकि वैश्विक स्तर पर हो रही आलोचना के बाद कुछ दिन पूर्व ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने सदस्य देशों के साथ अपनी पहली बैठक का आयोजन किया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने विश्व भर में कोरोना वायरस से उत्पन्न संकट पर चर्चा के लिये बुलाई गई अपनी पहली बैठक में COVID-19 से प्रभावित लोगों के साथ एकजुटता दिखाने और एकता बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया है। 

इस आलेख में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के इतिहास, संगठन, उसकी भूमिका तथा सुरक्षा परिषद के संगठन में सुधार की आवश्यकता और भारत की दावेदारी के संदर्भ में विभिन्न पहलूओं पर विमर्श करने का प्रयास किया जाएगा।   

सुरक्षा परिषद: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 

  • सुरक्षा परिषद, संयुक्त राष्ट्र की सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई है, जिसका गठन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वर्ष 1945 में हुआ था।
  • सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्य अमेरिका, ब्रिटेन, फ्राँस, रूस और चीन हैं।
  • सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के पास वीटो का अधिकार होता है। इन देशों की सदस्यता दूसरे विश्व युद्ध के बाद के शक्ति संतुलन को प्रदर्शित करती है। 
  • सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के पास वीटो का अधिकार होता है। इन देशों की सदस्यता दूसरे विश्व युद्ध के बाद के शक्ति संतुलन को प्रदर्शित करती है। 
  • गौरतलब है कि इन स्थायी सदस्य देशों के अलावा 10 अन्य देशों को दो वर्ष के लिये अस्थायी सदस्य के रूप में सुरक्षा परिषद में शामिल किया जाता है।
  • स्थायी और अस्थायी सदस्य क्रमशः एक माह के लिये परिषद के अध्यक्ष बनाए जाते हैं।
  • अस्थायी सदस्य देशों को चुनने का उदेश्य सुरक्षा परिषद में क्षेत्रीय संतुलन कायम करना है। इस अस्थाई सदस्यता के लिये सदस्य देशों में चुनाव होता है।
  • इसमें पाँच सदस्य एशियाई या अफ्रीकी देशों से, दो दक्षिण अमेरिकी देशों से, एक पूर्वी यूरोप से और दो पश्चिमी यूरोप या अन्य क्षेत्रों से चुने जाते हैं।

सुरक्षा परिषद को प्राप्त शक्तियाँ

  • सुरक्षा परिषद संयुक्त राष्ट्र का सबसे शक्तिशाली निकाय है जिसकी प्राथमिक ज़िम्मेदारी अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा कायम रखना है।
  • इसकी शक्तियों में शांति अभियानों का योगदान, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों को लागू करना तथा सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों के माध्यम से सैन्य कार्रवाई करना शामिल है।
  • यह सदस्य देशों पर बाध्यकारी प्रस्ताव जारी करने का अधिकार वाला संयुक्त राष्ट्र का एकमात्र निकाय है।
  • संयुक्त राष्ट्र चार्टर के तहत सभी सदस्य देश सुरक्षा परिषद के निर्णयों का पालन करने के लिये बाध्य हैं।
  • मौजूदा समय में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों के पास वीटो पॉवर है। वीटो पॉवर का अर्थ होता है ‘निषेधाधिकार’
  • स्थाई सदस्यों के निर्णय से अगर कोई भी एक स्थाई सदस्य सहमत नहीं है तो वह वीटो पाॅवर का इस्तेमाल करके उस निर्णय को रोक सकता है।

सुरक्षा परिषद और वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था

  • स्वास्थ्य को आम तौर पर व्यक्तिगत और विभिन्न देशों का घरेलू विषय माना जाता रहा है। विशेष कर तब तक, जब तक स्वास्थ्य से जुड़ी कोई चुनौती कई देशों में एक साथ न उठ खड़ी हो।
  • इस सदी के प्रारंभ में हमने देखा था कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एचआईवी/एड्स का मुद्दा उठा था। यह पहला मौका था जब सुरक्षा परिषद में किसी बीमारी को सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखा गया और उस समय वैश्विक प्रशासन के सबसे बड़े सुरक्षा मंच पर परिचर्चा हुई थी।
  • सुरक्षा परिषद द्वारा इस मुद्दे पर चर्चा करने का परिणाम यह हुआ कि अफ्रीका के युद्धरत देशों में शांति स्थापना के प्रयासों में एड्स की बीमारी को भी शामिल करने पर सहमति बन गई। वर्ष 2000 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने एड्स की बीमारी को सुरक्षा का मुद्दा घोषित किया। इसके लिये सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव संख्या 1308 को मंज़ूरी दी थी।
  • इसके प्रस्ताव के अंतर्गत इस बात पर ज़ोर दिया गया था कि एचआईवी/एड्स महामारी की अगर रोकथाम न की गई, तो इससे पूरे अफ्रीका की स्थिरता और सुरक्षा को खतरा है।
  • इसी तरह, वर्ष 2014 में जब पश्चिमी अफ्रीका में इबोला वायरस की महामारी फैली, तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने इस पर एक प्रतिक्रियात्मक कदम उठाया और अपने शांति अभियानों के अंतर्गत इस महामारी से निपटने का लक्ष्य भी शामिल किया। इसी के बाद सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 3177 में इस बात पर ज़ोर दिया गया था कि इबोला वायरस की महामारी की रोकथाम के लिये संयुक्त राष्ट्र के सभी अनुषांगिक संगठनों को आपसी समन्वय के साथ काम करना चाहिये।
  • दुर्भाग्यवश COVID-19 महामारी के बीच संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के किसी भी सदस्य देश ने इस तरह का कोई प्रस्ताव नहीं सामने रखा है। जबकि ज़रूरत ये है कि महामारी से निपटने के लिये तमाम देशों में आपसी सहमति बनाने की कोशिश की जानी चाहिये।

सुरक्षा परिषद में परिवर्तन की आवश्यकता क्यों?

  • सुरक्षा परिषद की स्थापना वर्ष 1945 की भू-राजनीति के हिसाब से की गई थी। मौजूदा भू-राजनीति द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि से अब काफी अलग हो चुकी है।
  • शीतयुद्ध समाप्त के बाद से ही इसमें सुधार की ज़रूरत महसूस की जा रही है। इसमें कई तरह के सुधार की आवश्यकता है जिसमें संगठनात्मक बनावट और प्रक्रिया सबसे अहम है।
  • मौजूदा समय में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 5 स्थायी देशों में यूरोप का सबसे ज़्यादा प्रतिनिधित्व है। जबकि यहाँ विश्व की कुल आबादी का मात्र 5 प्रतिशत ही निवास करती है।
  • अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका का कोई भी देश सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं है। जबकि संयुक्त राष्ट्र का 50 प्रतिशत से अधिक कार्य अकेले अफ्रीकी देशों से संबंधित है।
  • शांति स्थापित करने वाले अभियानों में अहम भूमिका निभाने के बावज़ूद भारत जैसे अन्य देशों के पक्ष को मौजूदा सदस्यों द्वारा नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
  • संयुक्त राष्ट्र संघ के ढाँचे में सुधार की आवश्यकता इसलिये भी है क्योंकि इसमें अमेरिका का वर्चस्व है। अमेरिका अपनी सैन्य और आर्थिक शक्ति के बल पर संयुक्त राष्ट्र संघ और अन्य  अंतराष्ट्रीय संगठनों की भी अनदेखी करता रहा है।

भारत सुरक्षा परिषद का दावेदार क्यों?

  • 1.3 बिलियन आबादी के साथ भारत, दुनिया का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला देश है। यहाँ  विश्व की कुल जनसंख्या का करीब 1/5वाँ हिस्सा निवास करता है।
  • भारत विश्व की उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति है। वैश्विक स्तर पर भारत के बढ़ते आर्थिक कद ने भारत के दावों को और मज़बूत किया है। मौजूदा समय में भारत विश्व की छठवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
  • भारत को अब विश्व व्यापार संगठन, ब्रिक्स और जी-20 जैसे आर्थिक संगठनों में सबसे प्रभावशाली देशों में गिना जाता है।
  •  भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से विश्व शांति को बढ़ावा देने वाली रही है।
  • भारत संयुक्त राष्ट्र की सेना में सबसे ज़्यादा सैनिक भेजने वाला देश है।

अन्य समूह भी कर रहे हैं सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग

  • जी-4 समूह: भारत, जर्मनी, ब्राज़ील और जापान ने मिलकर जी-4 नामक समूह बनाया है। ये देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यता के लिये एक-दूसरे का समर्थन करते हैं। जी-4 समूह का मानना है कि सुरक्षा परिषद को और अधिक प्रतिनिधित्त्वपूर्ण, न्यायसंगत व प्रभावी बनाने की ज़रूरत है।
  • L-69 समूह: ये समूह भारत, एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के क़रीब 42 विकासशील देशों के एक समूह की अगुवाई कर रहा है। L-69 समूह ने UNSC सुधार मोर्चा पर तत्काल कार्रवाई की मांग की है।
  • अफ्रीकी समूह: अफ्रीकी समूह में 54 देश शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों की वकालत करने वाला दूसरा महत्त्वपूर्ण समूह है। इस समूह की मांग है कि अफ्रीका के कम से कम दो राष्ट्रों को वीटो की शक्तियों के साथ सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाया जाए।

सुरक्षा परिषद के सुधार में बाधाएँ

  • सुरक्षा परिषद के 5 स्थायी सदस्य देश अपने वीटो पाॅवर को छोड़ने के लिये तैयार नहीं हैं और न ही वे इस अधिकार को किसी अन्य देश को देने पर सहमत हैं। 
  • संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन सुरक्षा परिषद में किसी भी बड़े बदलाव के विरोध में हैं।
  • अमेरिका जहाँ बहुपक्षवाद के खिलाफ है। तो वहीं रूस भी किसी तरह के सुधार के पक्ष में नहीं है। सुरक्षा परिषद में एशिया का एकमात्र प्रतिनिधि होने की मंशा रखने वाला चीन भी संयुक्त राष्ट्र में किसी तरह का सुधार नहीं चाहता। चीन नहीं चाहता कि भारत और जापान सुरक्षा परिषद के सदस्य बने।

निष्कर्ष 

इस वैश्विक संकट की घड़ी में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को पूर्व की भांति सक्रियता दिखानी चाहिये ताकि विश्व व्यवस्था के सम्मुख अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के महत्त्व को कम कर के न आँका जाए। वर्तमान परिस्थितियों के सामान्य हो जाने पर संयुक्त राष्ट्र को सुरक्षा परिषद् में सुधार की दिशा में भी कार्यरत होना चाहिये। निश्चित रूप से, स्थायी सदस्यता भारत को वैश्विक राजनीति के स्तर पर अमेरिका, ब्रिटेन, फ्राँस, चीन और रूस के समकक्ष लाकर खड़ा कर देगा। अतः संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिये भारत को भी और अधिक गंभीर प्रयास करने की आवश्यकता है।

प्रश्न- ‘बदलते वैश्विक परिदृश्य में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है।’ विश्लेषण कीजिये।


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