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एडिटोरियल

  • 21 Nov, 2019
  • 17 min read
भारतीय अर्थव्यवस्था

संकटग्रस्त दूरसंचार क्षेत्र

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में दूरसंचार क्षेत्र के संदर्भ में न्यायालय के हालिया निर्णय और भारतीय दूरसंचार क्षेत्र के विभिन्न पहलूओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

भारतीय दूरसंचार क्षेत्र के दो प्रमुख संगठनों- भारती एयरटेल और वोडाफोन आइडिया ने इस वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में भारी नुकसान की सूचना दी है। जहाँ एक ओर वोडाफोन आइडिया ने 50,922 करोड़ रुपए के नुकसान की घोषणा की, वहीं भारती एयरटेल ने 22,830 करोड़ रुपए के नुकसान का आँकड़ा बताया। जानकार मान रहे हैं कि दोनों कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर समायोजित एकल राजस्व (Adjusted Gross Revenue-AGR) को लेकर उच्चतम न्यायालय के फैसले का काफी प्रभाव पड़ा है। विदित हो कि हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने दूरसंचार विभाग द्वारा निर्धारित AGR की परिभाषा के खिलाफ दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनियों की याचिका खारिज कर दी थी। दूरसंचार क्षेत्र की दोनों दिग्गज कंपनियों ने यह भी चेतावनी दी थी कि यदि स्थिति बरकरार रहती है और उन्हें किसी प्रकार की राहत नहीं दी जाती तो उनके अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान में रिलायंस जियो के अतिरिक्त दूरसंचार क्षेत्र की सभी प्रमुख कंपनियाँ जैसे- भारती एयरटेल और वोडाफोन आइडिया आदि गंभीर संकट के दौर से गुज़र रही हैं और उन्हें तत्काल सरकारी सहायता की आवश्यकता है।

क्या है विवाद?

  • गौरतलब है कि दूरसंचार क्षेत्र को राष्ट्रीय दूरसंचार नीति, 1994 के तहत उदारीकृत किया गया और भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम, 1885 की धारा (4) के तहत दूरसंचार कंपनियों को विभिन्न लाइसेंस जारी किये गए।
  • प्रारंभ में लाइसेंस के लिये निश्चित शुल्क इतना अधिक था कि दूरसंचार सेवा प्रदाता भुगतान उसका भुगतान करने में समर्थ नहीं थे। जिसके चलते सेवा प्रदाता लाइसेंस शुल्क के विरुद्ध एक जुट होने लगे और सरकार के समक्ष अपना विरोध दर्ज करने लगे।
  • शुल्क विरोध के बाद सरकार ने वर्ष 1999 की राष्ट्रीय दूरसंचार नीति तैयार की। उल्लेखनीय है कि इस नीति के तहत लाइसेंसधारियों को एक निश्चित लाइसेंस शुल्क से राजस्व-साझाकरण शुल्क में स्थानांतरित करने का विकल्प दिया गया। जिसे वर्ष 1999 में पूर्णतः लागू कर दिया गया।
    • सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि लाइसेंस शुल्क के एवज में अब सरकार, दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के ‘सकल राजस्व’ की भागीदार या हिस्सेदार बन गई थी।
  • गौरतलब है कि सरकार यह शुल्क ‘समायोजित सकल राजस्व’ या AGR मद (Head) के तहत वसूल रही थी।
    • सामान्य अर्थों में सकल राजस्व की जो मात्रा शुल्क की गणना में प्रयोग की जाती है उसे समायोजित सकल राजस्व (Adjusted Gross Revenue-AGR) कहते हैं।
  • शुरुआत में राजस्व साझाकरण के तहत लाइसेंस शुल्क के रूप में 15 प्रतिशत AGR तय किया गया, जिसे बाद के वर्षों में घटाकर 13 प्रतिशत कर दिया गया और अंततः वर्ष 2013 में यह 8 प्रतिशत कर दिया गया।
  • नियम लागू होने के बाद वर्ष 2005 में सेलुलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (COAI) ने AGR गणना के लिये प्रयोग होने वाली सरकार की परिभाषा को चुनौती दी।
  • गौरतलब है कि दूरसंचार विभाग (DoT) और दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के विवाद मुख्यतः AGR की परिभाषा से संबंधी था। DoT का तर्क था AGR में दूरसंचार और गैर-दूरसंचार दोनों सेवाओं से प्राप्त होने वाले राजस्व को शामिल किया जाना चाहिये।
  • जबकि दूरसंचार कंपनियों का मानना था कि AGR में उनकी मुख्य सेवाओं से प्राप्त राजस्व को ही शामिल किया जाना चाहिये, न कि किसी निवेश या अचल संपत्तियों की बिक्री से प्राप्त लाभांश, ब्याज आय या लाभ को।
  • वर्ष 2015 में दूरसंचार विवाद समाधान एवं अपील प्राधिकरण (TDSAT) ने अपना फैसला दूरसंचार कंपनियों के पक्ष में सुनाया और यह माना कि AGR की परिभाषा में गैर-प्रमुख स्रोतों से प्राप्त राजस्व और पूंजीगत प्राप्तियों के अतिरिक्त सभी प्राप्तियों को शामिल किया जाएगा।
    • इसमें गैर-प्रमुख स्रोतों से प्राप्त राजस्व का अर्थ किराया, अचल संपत्तियों की बिक्री, लाभांश और ब्याज आदि से है।
  • TDSAT के निर्णय के पश्चात् दूरसंचार विभाग ने इसे उच्चतम न्यायालय के समक्ष चुनौती दी और न्यायालय ने अपने हालिया निर्णय में दूरसंचार कंपनियों के दावे को खारिज कर दिया है।
  • साथ ही उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार को कंपनियों से AGR की वसूली की अनुमति दे दी है, जो कि विभाग के अनुमान के मुताबिक लगभग 92,641 करोड़ रुपए है, यदि इसमें स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क की राशि भी शामिल की जाए तो यह राशि बढ़कर 1.4 लाख करोड़ रुपए तक पहुँच सकती है।
    • स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क वह शुल्क है जो मोबाइल एक्सेस सेवा प्रदान करने वाले लाइसेंसधारियों द्वारा अपने AGR के प्रतिशत के रूप में भुगतान किया जाना आवश्यक होता है। इसी के लिये सरकार द्वारा समय-समय पर दरें अधिसूचित की जाती हैं।
  • ध्यातव्य है कि यह पूरी राशि कुल 15 दूरसंचार सेवा प्रदाताओं पर बकाया है। हालाँकि, उनमें से लगभग 10 ने या तो संचालन बंद कर दिया है या उन पर दिवालिया होने की कार्यवाही चल रही है।
    • इसमें रिलायंस कम्युनिकेशंस, टेलीनॉर, टाटा टेलीसर्विसेज, एयरसेल और वीडियोकॉन जैसी बड़ी कंपनियाँ शामिल हैं।
  • न्यायालय के निर्णय से सबसे अधिक भारती एयरटेल और वोडाफोन आइडिया के प्रभावित होने की उम्मीद है, क्योंकि आँकड़ों के अनुसार जहाँ एक ओर भारती एयरटेल का कुल बकाया लगभग 42,000 करोड़ रुपए है, वहीं वोडाफोन आइडिया के लिये यह राशि लगभग 40,000 करोड़ रुपए के आस-पास है।
  • कई जानकारों का मानना है कि सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय का उन कंपनियों, जिन पर बकाया राशि अधिक है, पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ेगा। परंतु इसका एक अन्य पक्ष यह भी है कि इस निर्णय से सरकार की राजस्व प्राप्ति में वृद्धि होगी।

भारत में दूरसंचार क्षेत्र

  • आँकड़ों के मुताबिक जून 2019 तक भारत 1,186.63 मिलियन ग्राहक आधार के साथ दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा दूरसंचार बाज़ार है और इसमें पिछले डेढ़ दशक में काफी वृद्धि दर्ज की गई है।
  • भारत की मोबाइल या उपकरण अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और आने वाले वर्षों में यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
  • इसके अलावा, भारत वैश्विक स्तर पर सबसे बड़े डेटा उपभोक्ताओं में से एक है। इस संदर्भ में नवीन आँकड़ों के अनुसार, देश में प्रत्येक स्मार्टफोन द्वारा प्रतिमाह औसतन 9.8GB डेटा का प्रयोग किया जाता है।
  • भारतीय दूरसंचार क्षेत्र की तीव्र वृद्धि में मज़बूत उपभोक्ता आधार के साथ-साथ भारत सरकार की उदार और सुधारवादी नीतियों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।
    • गौरतलब है कि दूरसंचार क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की सीमा को 74 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 प्रतिशत कर दिया गया है। 100 प्रतिशत में से 49 प्रतिशत, स्वचालित मार्ग के ज़रिये और बाकी विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड (FIPB) के माध्यम से किया जाएगा।

तनाव में है दूरसंचार क्षेत्र

  • जहाँ एक ओर दूरसंचार क्षेत्र में शानदार वृद्धि देखने को मिल रही है, वहीं उसे कई बड़ी बाधाओं का सामना भी करना पड़ रहा है।
  • आँकड़े बताते हैं कि देश का दूरसंचार उद्योग तकरीबन 4 लाख करोड़ रुपए से अधिक के कर्ज के बोझ में दबा हुआ है।
  • यहाँ तक कि कई अवसरों पर सरकार ने भी यह स्वीकार किया है कि दूरसंचार क्षेत्र काफी तनाव और संकट से गुज़र रहा है और इसे तत्काल राहत की आवश्यकता है।
  • गौरतलब है कि दूरसंचार कंपनियों को राहत देने के उद्देश्य से सरकार ने हाल ही में सेक्टर में वित्तीय संकट की जाँच करने और इसे कम करने के उपायों की सिफारिश के लिये सचिवों की एक समिति गठित की थी। यह कदम उच्चतम न्यायालय के फैसले के कुछ दिन बाद आया था।

राजीव गौबा समिति

केंद्र सरकार ने कैबिनेट सचिव राजीव गौबा की अध्यक्षता में सचिवों की एक समिति (CoS) का गठन किया है, जो दूरसंचार क्षेत्र के लिए एक राहत पैकेज पर विचार करेगी। पैनल में वित्त, कानून और दूरसंचार मंत्रालय के सचिव शामिल होंगे

दूरसंचार क्षेत्र की चुनौतियाँ

  • उल्लेखनीय है कि दूरसंचार कंपनियों को अपनी क्षमता का विस्तार करने के लिये स्पेक्ट्रम की आवश्यकता होती है, परंतु भारत में यह एक दुर्लभ संसाधन है। अन्य देशों की तुलना में भारत में, वाणिज्यिक उपयोग के लिये उपलब्ध स्पेक्ट्रम की मात्रा काफी कम है।
  • सरकार द्वारा एक अत्यधिक लागत पर स्पेक्ट्रम की नीलामी करना मोबाइल ऑपरेटरों के लिये कम कीमत और अच्छी स्पीड से सेवाएँ प्रदान करना मुश्किल बना देता है। हालाँकि जिओ (JIO) की शुरुआत के साथ इस क्षेत्र में काफी बड़ी क्रांति आई है। परंतु अभी भी एक लंबा रास्ता बाकी है।
  • सेवा प्रदाताओं के लिये अर्द्ध ग्रामीण और ग्रामीण क्षेत्रों में पहुँचना काफी महँगा होता है, क्योंकि इन क्षेत्रों में बिजली और सड़कों जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी देखी जाती है।
  • भारत में लगभग 25 प्रतिशत टावर्स ही फाइबर नेटवर्क से जुड़े हैं, जबकि विकसित राष्ट्रों में यह आँकड़ा तकरीबन 70 प्रतिशत से अधिक है।
  • कभी-कभी राज्य सरकारें फाइबर आदि बिछाने की अनुमति देने के लिए एक बड़ी राशि शुल्क के रूप में लेती हैं, साथ कंपनियों को इस प्रकार की अनुमति लेने में भी काफी लंबा समय लगता है।
  • देश की प्रमुख दूरसंचार कंपनियाँ नुकसान और वित्तीय तनाव की बात स्वीकार कर चुकी हैं। इससे पता चलता है कि वर्तमान टैरिफ प्रणाली दूरसंचार के लिये आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं है।

राष्ट्रीय दूरसंचार नीति 2018

वर्ष 2018 में दूरसंचार विभाग (DoT) ने नई दूरसंचार नीति जारी की थी। ध्यातव्य है कि इसके तहत, वर्ष 2022 तक 40 लाख नए रोज़गार सृजन करने के महत्त्वपूर्ण लक्ष्य के साथ ही अन्य कई सुविधाओं का भी प्रावधान किया गया था।

नीति के प्रमुख बिंदु

  • वर्ष 2020 तक सभी नागरिकों को 50 mbps की ब्रॉडबैंड सेवा उपलब्ध कराना।
  • 2020 तक देश की सभी ग्राम पंचायतों को 1 gbps स्पीड वाले ब्रॉडबैंड से जोड़ना।
  • इस कनेक्टिविटी को 2022 तक 10 gbps स्पीड वाले ब्रॉडबैंड में बदलना।
  • नई पीढ़ी की प्रौद्योगिकी के लिये दूरसंचार क्षेत्र में 2022 तक 100 अरब डॉलर का निवेश आकर्षित करना।
  • मोबाइल सब्सक्राइबर घनत्व (Unique Mobile Subscriber Density) को वर्ष 2022 तक 65 प्रतिशत तक बढ़ाना।
  • इसके अलावा इस नीति में नेशनल फाइबर अथॉरिटी के गठन के प्रस्ताव के साथ वर्चुअल नेटवर्क ऑपरेटर्स पर भी चर्चा की गई है।
  • 50 प्रतिशत घरों तक लैंडलाइन ब्रॉडबैंड की पहुँच सुनिश्चित करना तथा लैंडलाइन पोर्टेबिलिटी सेवाएँ प्रारंभ करना।
  • डिजिटल संचार के लिये टिकाऊ और किफायती पहुँच सुनिश्चित करने हेतु स्पेक्ट्रम के इष्टतम मूल्य निर्धारण (Optimal Pricing of Spectrum) की नीति अपनाई जाएगी।
  • कानूनी और नियामिकीय व्यवस्था को सुसंगत बनाकर गोपनीयता तथा डेटा संरक्षण संबंधी प्रावधानों को शामिल करना।

आगे की राह

  • केंद्र सरकार दूरसंचार कंपनियों के मध्य मूल्य प्रतियोगिता समाप्त करने के लिये न्यूनतम मूल्य निर्धारित कर सकती है।
  • AGR के लिये जो 8 प्रतिशत निर्धारित किया गया है, जिसमें 5 प्रतिशत यूनिवर्सल सर्विस लेवी (Universal Service Levy-USL) के रूप में लिया जाता है, जो कि विश्व में सबसे अधिक है।
    • दूरसंचार क्षेत्र की मांग है कि इसे कम करके 3 प्रतिशत किया जाए।
  • दूरसंचार क्षेत्र की समस्याओं का समाधान करके सेवा की गुणवत्ता में सुधार करना चाहिये।
  • एक बेहतर व्यावसायिक वातावरण के लिये दीर्घकालिक दृष्टि योजना (Long-Term Vision Plan) का निर्माण करना चाहिये।
  • फाइबर आदि बिछाने की अनुमति प्रक्रिया को शिथिल किया जाना चाहिये, ताकि दूरसंचार कंपनियों को परेशानी का सामना न करना पड़े।

निष्कर्ष

दूरसंचार क्षेत्र का भविष्य बहुत उज्ज्वल है क्योंकि शिक्षा से लेकर सुरक्षा तक इसकी भूमिका लगभग हर स्थान पर दिखाई देती है। दूरसंचार क्षेत्र की वर्तमान गंभीर आर्थिक स्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता और उम्मीद के अनुसार न्यायालय का वर्तमान निर्णय क्षेत्र को और अधिक प्रभावित कर सकता है। ऐसे में आवश्यक है कि सरकार क्षेत्र को आर्थिक संकट से उभरने के लिये राहत पैकेज प्रदान करे, ताकि अर्थव्यवस्था के विकास में इस क्षेत्र की भूमिका को भी बढ़ाया जा सके।

प्रश्न: दूरसंचार क्षेत्र को लेकर न्यायलय के हालिया निर्णय के संदर्भ में भारतीय दूरसंचार क्षेत्र की स्थिति पर चर्चा कीजिये।


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