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एडिटोरियल

  • 07 Jan, 2022
  • 16 min read
जीव विज्ञान और पर्यावरण

शुद्ध शून्य उत्सर्जन: महत्त्व और चुनौतियाँ

यह एडिटोरियल 05/01/2022 को ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित “The Road To Net Zero” लेख पर आधारित है। इसमें शुद्ध शून्य कार्बन उत्सर्जन में भारत के योगदान और वर्ष 2070 तक अपने शुद्ध-शून्य लक्ष्य को पूरा करने में निजी क्षेत्र की भूमिका के संबंध में चर्चा की गई है।

संदर्भ

ग्लोबल वार्मिंग, लगातार बाढ़ एवं आग की समस्या, कोविड-19 महामारी और कई अन्य समस्याओं से पीड़ित हमारी पृथ्वी अस्तित्वगत संकट से गुज़र रही है और मानवता के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिये वैज्ञानिक और अभिनव उपायों की तत्काल आवश्यकता रखती है। 

इस संदर्भ में भारत ने UNFCCC के COP-26 में अपनी वर्द्धित जलवायु प्रतिबद्धताओं— ‘पंचामृत’ की घोषणा की, जिसमें वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य कार्बन उत्सर्जन (Net-Zero Carbon Emission) तक पहुँचने की प्रतिबद्धता शामिल है।   

भारत द्वारा शुद्ध-शून्य लक्ष्य की घोषणा करना इस दृष्टिकोण से एक बड़ा कदम है, क्योंकि वह ग्लोबल वार्मिंग के प्रमुख योगदानकर्त्ताओं में से एक नहीं है, फिर भी एक स्वैच्छिक दायित्व-बोध से आगे बढ़ा है। उल्लेखनीय है कि भारत का ऐतिहासिक संचयी उत्सर्जन विश्व के कुल उत्सर्जन का मात्र 4.37% है।  

इस घोषणा के बाद वर्ष 2070 के अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये भारत को विशेष रूप से एक सुगम नवीकरणीय ऊर्जा संक्रमण, इलेक्ट्रिक वाहनों के अधिकाधिक अंगीकरण और सार्वजनिक क्षेत्र के साथ-साथ निजी क्षेत्र की वृहत भागीदारीता पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता होगी।  

शुद्ध-शून्य में भारत का योगदान

  • भारत के नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य: भारत के नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य लगातार अधिक महत्त्वाकांक्षी होते गए हैं, जहाँ पेरिस में वर्ष 2022 तक 175 GW प्राप्त कर लेने की घोषणा से आगे बढ़ते हुए उसने संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलन में वर्ष 2030 तक 450 GW और अब COP26 में वर्ष 2030 तक 500 GW क्षमता प्राप्त कर लेने के लक्ष्य की घोषणा की है।   
    • भारत ने वर्ष 2030 तक गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों से 50% स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता के लक्ष्य की भी घोषणा की है, जो 40% के मौजूदा लक्ष्य का विस्तार करता है और जिसे पहले ही लगभग हासिल कर लिया गया है।  
    • भारत ने ‘ग्रे हाइड्रोजन’ और ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ के लिये हाइड्रोजन ऊर्जा अभियान (Hydrogen Energy Mission) की भी घोषणा की है।  
    • ऊर्जा दक्षता के मामले में ‘कार्य-निष्पादन, उपलब्धि और व्यापार’ (Perform, Achieve and Trade- PAT) की बाज़ार-आधारित योजना ने अपने पहले और दूसरे चक्र के दौरान 92 मिलियन टन CO2 समकक्ष उत्सर्जन को कम करने में सफलता पाई है। 
  • परिवहन क्षेत्र में सुधार: भारत ’FAME’ योजना [Faster Adoption and Manufacturing of (Hybrid &) Electric Vehicles Scheme] के साथ अपने ई-मोबिलिटी रूपांतरण में गति ला रहा है।  
    • भारत ने भारत स्टेज- IV (BS-IV) से तेज़ी से आगे बढ़ते हुए भारत स्टेज-VI (BS-VI) उत्सर्जन मानदंड को 1 अप्रैल, 2020 तक अपनाए जाने की घोषणा की (जिसे मूल रूप से वर्ष 2024 तक अपनाया जाना था)।
    • पुराने और अयोग्य वाहनों को चरणबद्ध रूप से हटाने के लिये एक स्वैच्छिक ‘व्हीकल स्क्रैपिंग पॉलिसी’ अपनाई गई है जो मौजूदा योजनाओं को पूरकता प्रदान करती है।   
    • भारतीय रेलवे भी इस दिशा आगे बढ़ी है, जहाँ वर्ष 2023 तक सभी ब्रॉड गेज रूट्स के पूर्ण विद्युतीकरण का लक्ष्य निर्धारित किया है।    
  • इलेक्ट्रिक वाहनों को भारत का समर्थन: भारत उन गिने-चुने देशों में शामिल है जो वैश्विक [email protected] अभियान का समर्थन करते हैं, जिसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि वर्ष 2030 तक बिक्री किये जाते नए वाहनों के कम-से-कम 30% इलेक्ट्रिक हों।   
    • ग्लासगो में आयोजित COP26 में जलवायु परिवर्तन के संबंध में पाँच तत्वों (जिसे ‘पंचामृत’ नाम दिया दिया है) की भारत द्वारा वकालत इसी दिशा में जताई गई प्रतिबद्धता है।  
    • भारत ने इलेक्ट्रिक वाहन पारितंत्र को विकसित करने और बढ़ावा देने के लिये कई उपाय किये हैं:
      • FAME योजना में सुधार के साथ ‘FAME-II’ (Faster Adoption and Manufacturing of Electric Vehicles- II) योजना का कार्यान्वयन
      • आपूर्तिकर्त्ता पक्ष हेतु उन्नत रसायन सेल (ACC) के लिये उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना
      • इलेक्ट्रिक वाहनों के निर्माताओं के लिये हाल ही में शुरू की गई ‘ऑटो और ऑटोमोटिव घटकों के लिये PLI योजना’।
  • सरकारी योजनाओं की भूमिका: प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना ने 88 करोड़ परिवारों को कोयला-आधारित रसोई ईंधन से LPG गैस कनेक्शन की ओर आगे बढ़ने में मदद की है।   
    • उजाला योजना के तहत 367 मिलियन से अधिक LED बल्ब वितरित किये गए हैं, जिससे प्रतिवर्ष 38.6 मिलियन टन CO2 की कमी हुई है।   
    • इन दो और ऐसी अन्य पहलों ने भारत को वर्ष 2005 और वर्ष 2016 के बीच अपने सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन तीव्रता में 24% की कमी लाने में मदद की है। 
  • निम्न-कार्बन संक्रमण में उद्योगों की भूमिका: भारत में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र पहले से ही जलवायु चुनौती से निपटने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, जहाँ ग्राहकों और निवेशकों की बढ़ती जागरूकता के साथ-साथ बढ़ती नियामक और प्रकटीकरण आवश्यकताओं से सहायता मिल रही है। 
    • उदाहरण के लिये, भारतीय सीमेंट उद्योग ने अग्रणी उपाय किये हैं और विश्व स्तर पर सर्वाधिक क्षेत्रवार निम्न-कार्बन स्तर पर पहुँचने की अभूतपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। 
    • भारत की जलवायु नीति का इसके निजी क्षेत्र के कार्यों और प्रतिबद्धताओं के साथ अधिकाधिक तालमेल हुआ है।

संबद्ध चुनौतियाँ

  • नवीकरणीय ऊर्जा की ओर सुगम ट्रांजिशन की बाधाएँ: नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता वाली भूमि की पहचान और भूमि मंज़ूरी की अधिक समय लेने वाली प्रक्रियाएँ।    
    • ग्रिड के साथ नवीकरणीय ऊर्जा के एक बड़े हिस्सा को एकीकृत करना एक अन्य अवरोध है। 
    • तथाकथित डीकार्बोनाइज़ेशन हेतु कठिन (Hard to Decarbonize) क्षेत्रों में नवीकरणीय ऊर्जा के प्रवेश को सक्षम करने में भी चुनौतियाँ सामने आ सकती हैं। 
  • कोयला-संचालित कंपनियों के लिये चुनौतियाँ: सेवा क्षेत्र में कार्यरत कंपनियों के लिये कोयले से गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन/परिवहन की ओर ट्रांजिशन/अवस्थांतर अपेक्षाकृत आसान होता है। 
    • लेकिन निम्न-कार्बन ट्रांजिशन की ओर बढ़ना उन कंपनियों के लिये अत्यधिक चुनौतीपूर्ण है जो बड़े पैमाने पर कोयले से संचालित हैं और देश के आधे से अधिक उत्सर्जन में योगदान करती हैं।  
  • ईवी विनिर्माण के लिये प्रौद्योगिकी और कुशल श्रम की कमी: भारत बैटरी, सेमीकंडक्टर्स, कंट्रोलर जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स के उत्पादन में तकनीकी रूप से पिछड़ा हुआ है।   
    • इलेक्ट्रिक वाहनों की सर्विसिंग लागत अधिक होती है जिसके लिये उच्च स्तर के कौशल की आवश्यकता होती है। भारत में ऐसे कौशल विकास के लिये समर्पित प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों का अभाव है। 
  • EVs अवस्थांतर से संबद्ध उपभोक्ता संबंधी समस्याएँ: वर्ष 2018 में भारत में केवल 650 चार्जिंग स्टेशन मौजूद थे, जो पड़ोसी समकक्ष देशों की तुलना में पर्याप्त कम है जहाँ 5 मिलियन से अधिक चार्जिंग स्टेशन संचालित हैं।   
    • चार्जिंग स्टेशनों की कमी के कारण उपभोक्ताओं के लिये लंबी दूरी की यात्रा करना अनुपयुक्त हो जाता है। 
    • इसके साथ ही, एक आम इलेक्ट्रिक कार की लागत पारंपरिक ईंधन से संचालित कार की औसत कीमत से बहुत अधिक है।  

आगे की राह

  • नवीकरणीय ऊर्जा मिश्रण: पवन और सूर्य के प्रकाश जैसे स्रोतों की हर जगह चौबीसों घंटे आपूर्ति संभव नहीं है, इसलिये सौर, पवन और हाइड्रोजन आधारित ऊर्जा के विविध ऊर्जा मिश्रण की ओर आगे बढ़ना विवेकपूर्ण होगा।   
    • भारत को निकट और तत्काल भविष्य में अवसंरचना क्षेत्र में निवेश, क्षमता निर्माण और बेहतर ग्रिड एकीकरण जैसे क्षेत्रों में कार्य करना चाहिये।  
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करना: चूँकि उद्योग भी GHG उत्सर्जन में योगदान करते हैं, इसलिये किसी भी जलवायु कार्रवाई को औद्योगिक और वाणिज्यिक गतिविधियों से उत्पन्न होने वाले उत्सर्जन को कम करने या समाप्त करने की आवश्यकता होगी। 
    • सेवा क्षेत्र में संलग्न कंपनियाँ नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग का विस्तार कर और आपूर्ति शृंखला भागीदारों के साथ सहयोग कर अपने उत्सर्जन को आसानी से कम कर सकती हैं। वे नवीकरणीय स्रोतों से अपनी 50% बिजली की सोर्सिंग कर कार्बन-तटस्थ बन सकते हैं।  
    • कोयला-संचालित कंपनियों के लिये, यह 'ऊर्जा-ट्रांजिशन मूवमेंट' जलवायु प्रौद्योगिकियों में निवेश करने और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के उपयोग का विस्तार करने का अवसर प्रदान करता है।  
  • इलेक्ट्रिक वाहन को प्रोत्साहन: EVs समग्र ऊर्जा सुरक्षा स्थिति में सुधार लाने में योगदान करेंगे क्योंकि देश कच्चे तेल की अपनी कुल आवश्यकता का 80% से अधिक आयात करता है, जिसका मूल्य लगभग 100 बिलियन डॉलर है।   
    • EVs की चार्जिंग संबंधी बाधाओं को कम करने के लिये स्थानीय बिजली आपूर्ति तंत्र से बिजली ले सकने वाले चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर निजी आवासों, पेट्रोल एवं सीएनजी पंपों जैसे सार्वजनिक उपयोगिताओं और मॉल, रेलवे स्टेशनों एवं बस डिपो जैसे वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों की पार्किंग सुविधाओं में स्थापित किये जा सकते हैं।     
  • EVs में R&D को बढ़ावा देना: भारतीय बाज़ार को स्वदेशी प्रौद्योगिकियों के लिये प्रोत्साहन की आवश्यकता है, जो रणनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टिकोण से भारत के अनुकूल हों। 
    • चूँकि कीमतों को कम करने के लिये स्थानीय अनुसंधान एवं विकास में निवेश आवश्यक है, इसलिये स्थानीय विश्वविद्यालयों और मौजूदा औद्योगिक केंद्रों का सहयोग लेना उपयुक्त होगा।
    • भारत को यूनाइटेड किंगडम जैसे देशों के साथ मिलकर कार्य करना चाहिये और इलेक्ट्रिक वाहनों के विकास को सुसंगत बनाना चाहिये।

निष्कर्ष

यदि तापमान में वृद्धि को पेरिस समझौते की सीमाओं के भीतर रखना है तो भविष्य के संचयी उत्सर्जन को शेष कार्बन बजट तक सीमित करते हुए वैश्विक शुद्ध-शून्य तक पहुँचने हेतु निर्णायक रूप से कार्य करने की आवश्यकता है।

अभ्यास प्रश्न: शुद्ध-शून्य कार्बन उत्सर्जन में भारत के योगदान और वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य के अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये भारत द्वारा किये जा सकने वाले उपायों की चर्चा कीजिये।


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