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एडिटोरियल

  • 06 Aug, 2022
  • 14 min read
शासन व्यवस्था

राजनीति में फ्रीबीज़ (मुफ्त उपहार)

यह एडिटोरियल 05/08/2022 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित “Sop or welfare debate: On freebies” लेख पर आधारित है। इसमें ‘फ्रीबीज़’ पर जारी राजनीतिक संवाद और संबद्ध मुद्दों के बारे में चर्चा की गई है।

भारत में राजनीतिक दल भारतीय मतदाताओं को विभिन्न पेशकशों के माध्यम से लुभाने की होड़ में रहते हैं जिन्हें मुफ्त उपहार या फ्रीबीज़ (Freebies) के रूप में जाना जाता है। हाल के दिनों में यह प्रवृत्ति बढ़ी है जहाँ राजनीतिक दल मतदाताओं के लिये ऐसी पेशकशों के नए-नए तरीके आजमा रहे हैं, क्योंकि पारंपरिक मुफ्त पानी और बिजली अब चुनावी उपहार के रूप में पर्याप्त नहीं रह गए हैं। फ्रीबीज़ के इर्द-गिर्द उभरा यह राजनीतिक संवाद कई खतरे रखता है क्योंकि यह स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के आधार को पर्याप्त रूप से प्रभावित करता है। चुनाव से पहले के ऐसे अव्यवहार्य वायदे मतदाताओं द्वारा सूचित निर्णय ले सकने की क्षमता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते हैं। इस परिदृश्य में ‘फ्रीबीज़ कल्चर’ की अभिकल्पना, निष्पादन और जवाबदेही में व्याप्त अंतराल को दूर करने की आवश्यकता महसूस होती है।

भारत में फ्रीबीज़ का सकारात्मक पक्ष:

  • कल्याणकारी योजनाओं का आधार: फ्रीबीज़ में केवल चुनाव-पूर्व के अव्यवहार्य वादे ही शामिल नहीं हैं, बल्कि कई सेवाएँ भी शामिल हैं जो सरकार अपने संवैधानिक दायित्वों (राज्य नीति के निदेशक सिद्धांत) के तहत नागरिकों को प्रदान करती है, जैसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), मुफ्त कोविड वैक्सीन और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (MGNREGA)।
    • मध्याह्न भोजन योजना ('Mid-day Meal Scheme) पहली बार वर्ष 1956 में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के. कामराज द्वारा फ्रीबीज़ के रूप में ही शुरू की गई थी, जिसे फिर एक दशक बाद राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में अपना लिया गया।
    • एनटी रामाराव द्वारा आंध्र प्रदेश में 2 रुपए प्रति किलोग्राम चावल का वादा वर्तमान में कार्यान्वित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम का मूल आधार है।
    • तेलंगाना की राथू बंधु और ओडिशा की कालिया योजना ‘किसान सम्मान निधि’ की अग्रदूत है।
  • निम्न वर्ग का उत्थान: चूँकि तुलनात्मक रूप से निम्न स्तर के विकास वाले राज्यों में गरीब आबादी का प्रतिशत अधिक है, इन राज्यों में निचले तबके के उत्थान के लिये फ्रीबीज़ अधिक उपयोगी सिद्ध होते हैं।

फ्रीबीज़ के नकारात्मक प्रभाव:

  • सार्वजनिक व्यय का अपवाह: अधिकांश मामलों में फ्रीबीज़ अंततः सार्वजनिक व्यय के अत्यधिक और अनावश्यक अपवाह या निकासी का कारण बनते हैं और राज्यों के आर्थिक बोझ को बढ़ाते हैं, जबकि अधिकांश भारतीय राज्य पहले ही खराब वित्तीय स्थिति से प्रभावित हैं और उनके पास सीमित राजस्व संसाधन ही मौजूद हैं।
  • किसी के लिये उपहार, किसी के लिये आपदा: उपभोक्ता लाभार्थियों के लिये कीमतों को कम करने के परिणामस्वरूप सरकार औद्योगिक और वाणिज्यिक अनुबंधों को अधिभारित करती है ताकि आंतरिक वित्तीय संतुलन बनाए रख सके। इसके परिणामस्वरूप उभरते उद्योगों की प्रतिस्पर्द्धात्मकता कम हो जाती है, जिससे सुस्त औद्योगिक वृद्धि और वाणिज्यिक मूल्य वृद्धि की स्थिति बनती है।
    • इसलिये प्रश्न यह नहीं है कि लाभार्थियों के लिये फ्रीबीज़ कितने सस्ते हैं, बल्कि यह है कि दीर्घावधि में वे अर्थव्यवस्था, जीवन की गुणवत्ता और सामाजिक सामंजस्य के लिये कितने महंगे साबित हो सकते हैं।
  • राजकोषीय घाटे की वृद्धि: सब्सिडी और फ्रीबीज़ सरकारी राजस्व पर दबाव बनाते हैं, जिससे राजकोषीय घाटा बढ़ता है और ब्याज भुगतान में वृद्धि होती है।
  • मतदाताओं के सूचित निर्णयन का विकृत होना: चुनाव अभियानों के दौरान विवेकहीन फ्रीबीज़ की पेशकश और वितरण के रूप में अनियंत्रित लोकलुभावनवाद प्रायः मतदाताओं (विशेष रूप से वंचित वर्ग के मतदाताओं) के मन में पूर्वाग्रह उत्पन्न करता है, क्योंकि वे फ्रीबीज़ के लोभ में बह जाते हैं और इससे अपना प्रतिनिधि चुनने की उनकी सूचित निर्णय क्षमता प्रभावित होती है।
  • अस्थायी प्रकृति: ये फ्रीबीज़ कई बार पहले सार्वभौमिक, फिर वैकल्पिक, फिर अधिभार के रूप में नकारात्मक संक्रमण से गुजरते हैं, जहाँ ये पेशकश केवल तब तक मान्य होते हैं जब तक कि मौजूदा सरकार वित्तीय बाधाओं का सामना नहीं करने लगते और इन लाभों को वापस लेने के लिये विवश नहीं हो जाते।
  • निजी वस्तु-आधारित फ्रीबीज़: निजी वस्तुओं और सेवाओं (Private Goods and Services) पर फ्रीबीज़ कोई वास्तविक सामाजिक लाभ उत्पन्न नहीं करते।
    • उदाहरण के लिये, बिजली का मुफ्त वितरण कोई सामूहिक सामाजिक लाभ प्रदान नहीं करता है, इसलिये इसे निजी वस्तु के रूप में देखा जा सकता है।

सार्वजनिक वस्तुएँ बनाम मेरिट वस्तुएँ बनाम निजी वस्तुएँ

अर्थशास्त्र में उत्पाद या सेवाएँ तीन प्रकार की होती हैं:

  • सार्वजनिक वस्तुएँ (Public Goods): ये उपभोग में गैर-अपवर्जित (Non-Excludable) और गैर-प्रतिद्वंद्वी (Non-Rival) होते हैं, जैसे राष्ट्रीय रक्षा, खाद्य नियंत्रण प्रणाली, रेलवे, राजमार्ग और कोविड पर सूचना आदि।
    • ऐसी सेवाओं का स्वामित्व व्यक्तियों के पास होना कठिन है, भले ही वे इनके लिये भुगतान करने को तैयार हों और ये आवश्यक रूप से सरकारों द्वारा प्रदान की जाती हैं।
  • मेरिट वस्तुएँ (Merit Goods): शुद्ध सार्वजनिक वस्तुओं के विपरीत ‘मेरिट’ वस्तुएँ बाज़ार के माध्यम से प्रदान की जाती हैं, लेकिन आवश्यक नहीं है कि ये सामाजिक कल्याण को अधिकतम करने के लिये पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हों, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, कल्याण सेवा, आवास, अग्नि सुरक्षा, अपशिष्ट संग्रह, सार्वजनिक पार्क आदि।
    • ये व्यक्तिगत स्तर पर व्यक्तियों द्वारा प्राप्त किये जा सकते हैं और वृहत समाज को कुछ लाभ प्रदान कर सकते हैं।
    • उदाहरण के लिये, कोई व्यक्ति ऐसा मास्क खरीद सकता है जो कोविड को दूसरे व्यक्तियों में फैलने से रोकेगा और सामाजिक भलाई को बढ़ावा देगा। इसलिये सरकार द्वारा मास्क का मुफ्त वितरण करना न्यायोचित है।
  • निजी वस्तुएँ (Private Goods): ऐसा उत्पाद या सेवा जो एक निजी स्वामित्व वाले व्यवसाय द्वारा उत्पादित होता है और खरीदार की उपयोगिता या संतुष्टि को बढ़ाने के लिये खरीदा जाता है।
    • बाज़ार अर्थव्यवस्था (Market Economy) में उपभोग की जाने वाली अधिकांश वस्तुएँ और सेवाएँ निजी वस्तुएँ ही हैं और उनकी कीमतें कुछ हद तक आपूर्ति और मांग की बाज़ार शक्तियों द्वारा निर्धारित की जाती हैं।
      • इन्हें व्यक्तिगत स्तर पर प्राप्त किया जा सकता है और ये व्यक्ति को ही सबसे अधिक लाभ प्रदान करते हैं; इससे कोई वास्तविक सामाजिक लाभ प्राप्त नहीं होता है।
  • बिजली के मुफ्त या रियायती वितरण के साथ स्वच्छता आंदोलन की तुलना कर मेरिट और निजी वस्तुओं के बीच के अंतर को स्पष्ट किया गया है।

आगे की राह

  • कल्याण और फ्रीबीज़ के बीच अंतर को समझना: फ्रीबीज़ को आर्थिक दृष्टिकोण से और करदाताओं के पैसे के संबंध में समझा जाना चाहिये।
    • सब्सिडी और फ्रीबीज़ के बीच के अंतर को समझना भी आवश्यक हैं क्योंकि सब्सिडी न्यायसंगत हैं और विशेष रूप से लक्षित लाभ विशिष्ट मांगों की पूर्ति का उद्देश्य रखते हैं। फ्रीबीज़ इनसे अलग हैं जो राजनीतिक लाभ के लिये लोकलुभावन पर अधिक आश्रित हैं।
  • धन का तार्किक और निर्देशित उपयोग: सरकारों और राज्यों में ज़रूरतमंदों की सहायता के लिये सब्सिडी कार्यक्रम के सृजन की क्षमता होनी चाहिये, लेकिन ऐसे कार्यक्रमों को बुनियादी सुविधाओं में अधिक निवेश करने के लिये एक स्पष्ट तर्क प्रदान करना चाहिये और राज्य के आर्थिक हितों को बनाए रखने के लिये धन के उपयोग का स्पष्ट निर्देश होना चाहिये।
  • मतदाता जागरूकता: लोकतंत्र में फ्रीबीज़ की प्रवृत्ति को अवरुद्ध करने या इसकी अनुमति देने की शक्ति मतदाताओं के पास होती है। तर्कहीन फ्रीबीज़ को विनियमित करने और यह सुनिश्चित करने के बीच आम सहमति की आवश्यकता है कि मतदाता तर्कहीन वादों से प्रभावित न हों।
    • इसके लिये मतदान वर्ग की ओर से शाश्वत सतर्कता की आवश्यकता है।
  • सहकारी संघवाद को सुदृढ़ करना: सहकारी संघवाद (Cooperative federalism) केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय का निर्माण करेगा ताकि वे राष्ट्रीय विकास एजेंडा की ओर ध्यान केंद्रित कर सकें। यह तर्कहीन राजनीतिक एजेंडा की आवश्यकता को कम कर सकता है और राष्ट्र को समग्र रूप से सामूहिक विकास की ओर ले जा सकता है।
  • न्यायिक हस्तक्षेप: इस विषय पर संसद में एक रचनात्मक बहस और चर्चा कठिन है क्योंकि फ्रीबीज़ संस्कृति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रत्येक राजनीतिक दल पर प्रभाव रखती है। इसलिये उपायों का प्रस्ताव करने के लिये न्यायिक हस्तक्षेप और भागीदारी की आवश्यकता है।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में राजनीतिक दलों द्वारा दिये जाने वाले उपहारों को विनियमित करने के तरीके पर सिफारिशें देने के लिये एक शीर्ष प्राधिकरण के निर्माण की अनुशंसा की है।
  • ECI के आदर्श आचार संहिता को प्रबल करना: भारत का निर्वाचन आयोग सूचित मतदाता व्यवहार के हेरफेर को रोकने के लिये चुनाव घोषणापत्र को प्रभावी ढंग से विनियमित करने हेतु राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के मार्गदर्शन के लिये आदर्श आचार संहिता को लागू करने पर विचार कर सकता है।
  • फ्रीबीज़ के बजाय कौशल विकास पर ध्यान देना: किसी आदमी को मछली दी जाए तो वह एक दिन पेट भर सकेगा, लेकिन उसे मछली पकड़ना सीखा दिया जाए तो वह जीवन भर के लिये अपना पेट भरने में सक्षम हो जाएगा। इस दृष्टिकोण से लोगों को फ्रीबीज़ देने के बजाय उन्हें उपयोगी कौशल प्रदान अधिक बेहतर होगा।
    • बुनियादी आवश्यकताओं के क्षेत्र में सब्सिडी प्रदान करना सकारात्मक दृष्टिकोण है, जैसे छोटे बच्चों के लिये मुफ्त शिक्षा और स्कूलों में मुफ्त भोजन।
    • यदि राजनीतिक दल प्रभावी आर्थिक नीतियों की राह पर आगे बढ़ते हैं, जहाँ कल्याणकारी योजनाओं की लक्षित आबादी तक बेहतर पहुँच हो तो आधारभूत संरचना और विकास अपना ध्यान स्वयं रख लेंगे और लोगों को इस तरह के फ्रीबीज़ की आवश्यकता नहीं होगी।

अभ्यास प्रश्न: ‘‘फ्रीबीज़ कल्चर समृद्धि का मार्ग नहीं है, बल्कि वित्तीय आपदा का एक त्वरित पासपोर्ट है।’’ टिप्पणी कीजिये।


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