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  • 05 Mar, 2021
  • 13 min read
अंतर्राष्ट्रीय संबंध

नॉलेज डिप्लोमेसी

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में भारतीय विदेश नीति में नॉलेज डिप्लोमेसी की घटती भूमिका व इससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ: 

हाल ही में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा ब्राज़ील के अमेजोनिया-1 उपग्रह का प्रक्षेपण और भारत की "वैक्सीन मैत्री" कूटनीति के तहत ब्राज़ील सहित अन्य देशों को COVID-19 वैक्सीन का निर्यात यह दर्शाता है कि भारत की नॉलेज इकाॅनमी देश की राजनयिक पूंजी में किस प्रकार योगदान दे सकती है।

अंतरिक्ष और फार्मा क्षेत्र की वैश्विक सफलता भारत के ज्ञान उद्योग की कूटनीतिक और "नरम शक्ति" की  क्षमता  की ओर संकेत करती है।

पूर्व में भारत के नॉलेज सेक्टर ने अन्य विकासशील देशों को अपनी नॉलेज इकाॅनमी विकसित करने हेतु एक रोल मॉडल बनने में सहायता की है।

हालाँकि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अंतरिक्ष, फार्मा और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों को छोड़कर नॉलेज इकाॅनमी में इस बढ़त को खो दिया।

नॉलेज इकाॅनमी (Knowledge Economy): 

  • नॉलेज इकाॅनमी एक आर्थिक प्रणाली है जिसमें वस्तुएँ और सेवाएँ मुख्य रूप से ज्ञान-प्रधान गतिविधियों पर आधारित होती हैं, जो तकनीकी तथा वैज्ञानिक नवाचार की तीव्र प्रगति में योगदान देती हैं।
  • नवीन विचार, सूचना और व्यवहार के लिये मानव पूंजी तथा बौद्धिक संपदा पर अधिक निर्भरता इसका महत्त्वपूर्ण तत्त्व है।
  • नॉलेज इकाॅनमी में माइक्रोइकोनॉमिक और मैक्रोइकोनॉमिक वातावरण के भीतर अत्यधिक कुशल कर्मचारियों को शमिल किया जाता है। संस्थान और उद्योग ऐसी नौकरियों के अवसर पैदा करते हैं जिनमें वैश्विक बाज़ार की ज़रूरतों को पूरा करने के लिये विशेष कौशल की आवश्यकता होती है।
  • सैद्धांतिक रूप से ज्ञान और आर्थिक निधि तैयार करने की क्षमता एक व्यक्ति की मौलिक व्यक्तिगत पूंजी होती है। 
  • ज्ञान को श्रम और पूंजी के अलावा एक अतिरिक्त इनपुट के रूप में देखा जाता है। 

नॉलेज डिप्लोमेसी क्या है? 

  • नॉलेज डिप्लोमेसी, दो या दो से अधिक देशों के बीच संबंधों के निर्माण और उन्हें मज़बूत करने में अंतर्राष्ट्रीय उच्च शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार की भूमिका को संदर्भित करती है। 
  • यह अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के लिये एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है, जहाँ शिक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी तथा नवाचार, वैश्विक विकासात्मक राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • नॉलेज डिप्लोमेसी यह स्वीकार करती है कि कई घरेलू मुद्दे अब वैश्विक मुद्दे हैं और इसके विपरीत कई वैश्विक चुनौतियाँ अब घरेलू चुनौतियाँ हैं।
  • नॉलेज डिप्लोमेसी यह स्वीकार करती है कि जैसे-जैसे हम तेज़ी से वैश्वीकरण की ओर बढ़ रहे हैं, इस व्यवस्था के अंतर्गत परस्पर जुड़ा और अन्योन्याश्रित विश्व नए अवसरों के साथ नई चुनौतियाँ और खतरे प्रस्तुत करता है जिन्हें कोई राष्ट्र अकेले संबोधित नहीं कर सकता है।

भारत की नॉलेज डिप्लोमेसी के उदाहरण: 

  • भारत की नॉलेज डिप्लोमेसी के इतिहास को वर्ष 1950 के दशक के शुरूआती वर्षों से जोड़कर देखा जा सकता है, जब कई विकासशील देशों द्वारा विकास उन्मुख ज्ञान का उपयोग करने के लिये भारत से सहायता की अपेक्षा की गई।
  • इस दौरान एशिया और अफ्रीका के छात्रों में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में अध्ययन के लिये भारतीय विश्वविद्यालयों में प्रवेश प्राप्त करने की उत्सुकता दिखी।
  • खाद्य और कृषि संगठन (FAO), संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन (UNIDO) और अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (IRRI) जैसे वैश्विक संगठनों द्वारा भारतीय विशेषज्ञता तक पहुँच प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की गई थी।
  • दक्षिण कोरिया की सरकार ने लंबी अवधि की योजना बनाने के लिये प्रशिक्षण प्राप्त करने हेतु वर्ष 1960 के दशक की शुरुआत तक अपने अर्थशास्त्रियों को भारतीय योजना आयोग के पास भेजा। वर्ष 1970 के दशक तक दक्षिण कोरिया आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था में भारत से आगे निकल गया था।
  • रेल इंडिया टेक्निकल एंड इकोनॉमिक सर्विसेज़ (RITES), जिसे वर्ष 1974 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा स्थापित किया था, ने अफ्रीका और एशिया में व्यापार करने के साथ ही एक वैश्विक प्रोफाइल अर्जित की।
  • भारत की डेयरी और पशुधन अर्थव्यवस्था के विकास ने भी विश्व का ध्यान आकर्षित किया।
  • वर्तमान में अंतरिक्ष और फार्मा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के कारण भारत कई देशों के उपग्रहों को वैश्विक प्रतिस्पर्द्धी दरों पर अंतरिक्ष में भेज सकता है तथा विकासशील देशों को सस्ती कीमत पर दवाओं एवं टीकों की आपूर्ति कर सकता है।

नॉलेज डिप्लोमेसी के नेतृत्व की चुनौतियाँ:

  • प्रतिभा पलायन: भारत में वर्ष 1970 के दशक से ही स्थानीय प्रतिभाओं का पलायन शुरू हो गया था, तब से इसमें काफी तेज़ी आई है। रोज़गार की बेहतर संभावनाओं के कारण हाल के वर्षों में इसमें तेज़ी से वृद्धि हुई है।
  • चीन से प्रतिस्पर्द्धा: पिछले कुछ वर्षों में चीन इस क्षेत्र में भारत के लिये एक मज़बूत प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरा है, जो अपेक्षाकृत कम कीमतों पर समान गुणवत्ता (यदि बेहतर नहीं) वाले विज्ञान और प्रौद्योगिकी से जुड़े उत्पाद तथा सेवाएँ उपलब्ध करा रहा है।
    • हालाँकि भारत ने आईटी सॉफ्टवेयर में अपनी बढ़त बनाए रखी है, परंतु चीन ने अंतरिक्ष, फार्मा, रेलवे और कई अन्य ज्ञान-आधारित उद्योगों में प्रतिस्पर्द्धी क्षमताओं का विकास किया है।   
  • दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से प्रतिस्पर्द्धा: भारतीयों की अंग्रेज़ी भाषा की अच्छी जानकारी और गणित तथा सांख्यिकी में शिक्षण की अच्छी गुणवत्ता ने भारतीय कंपनियों को डेटा प्रोसेसिंग, बिज़नेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग और सॉफ्टवेयर सेवाओं में प्रतिस्पर्द्धी बने रहने में सक्षम बनाया है।  
    • हालाँकि दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा के कारण इस बढ़त को चुनौती मिलने लगी है।
  • बिगड़ते शिक्षा मानक: भारत की नॉलेज इकाॅनमी की वैश्विक छवि को सबसे बड़ा झटका उच्च शिक्षा क्षेत्र के कारण लगा है।  
    • भारतीय विश्वविद्यालयों और संस्थानों ने अन्य देशों के प्रवासी छात्रों को अपनी ओर इसलिये आकर्षित किया क्योंकि वे विकसित देशों के संस्थानों की तुलना में बहुत ही कम लागत पर अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा प्रदान करते थे।
    • परंतु हाल के वर्षों में प्रवासी छात्रों के बीच भारतीय संस्थानों की यह छवि धूमिल हुई है।
  • बिगड़ता सामाजिक परिवेश: इसके अतिरिक्त भारतीय संस्थानों में आने वाले विदेशी छात्रों की संख्या में गिरावट का कारण अधिकांश संस्थानों में दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता में आई कमी ही नहीं, बल्कि संकीर्ण विचारधाराओं का बढ़ता प्रभाव तथा यहाँ उपलब्ध सामाजिक वातावरण अब उतना विश्ववादी नहीं रह गया है, जैसा कि पहले हुआ करता था।   

आगे की राह: 

  • अंतरिक्ष और फार्मा की सफलता का अनुकरण: यदि ISRO की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धी क्षमता सार्वजनिक नीति और सरकार के समर्थन का परिणाम है, तो फार्मा क्षेत्र को औषध विज्ञान और जैव प्रौद्योगिकी में निजी उद्यम तथा मध्यवर्गीय प्रतिभा के योगदान के कारण वैश्विक सफलता प्राप्त हुई है।
    • अंतरिक्ष और फार्मास्यूटिकल्स के क्षेत्र में विश्व भर के कई देशों तक फैली भारत की वर्तमान वैश्विक कूटनीति दोनों क्षेत्रों में "आत्मनिर्भरता" के लिये 50 वर्षों के निरंतर राजकीय समर्थन का परिणाम है।   
    • अतः इस प्रकार अंतरिक्ष और फार्मा की सफलता की कहानी को ज्ञान के अन्य क्षेत्रों में भी दोहराए जाने की आवश्यकता है।   
  • प्रतिभा पलायन की समस्या को संबोधित करना: सरकारी और निजी क्षेत्र की कंपनियों को भारतीय प्रतिभाओं के लिये रोज़गार की बेहतर संभावनाएँ विकसित करने की आवश्यकता है। 
    • यह देश में एक ब्रेन बैंक की स्थापना में सहायता कर सकता है जो भारत के विकास को मज़बूती प्रदान करेगा। 
  • शिक्षा मानकों में सुधार: यदि भारत अपने मानव संसाधन को वैश्विक प्रतिभा के साथ प्रतिस्पर्द्धा में बढ़त दिलाना चाहता है तो इसके लिये देश के शिक्षा क्षेत्र में व्यापक सुधारों को लागू करने की आवश्यकता होगी।
    • यह सिर्फ नॉलेज डिप्लोमेसी का लाभ उठाने के लिये ही नहीं बल्कि एक अरब से अधिक आबादी वाले देश की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिये भी आवश्यक है।

निष्कर्ष:  

वर्तमान में अंतरिक्ष और फार्मा क्षेत्र भारत के नॉलेज डिप्लोमेसी के एक संकीर्ण पिरामिड के शीर्ष पर हैं। हालाँकि नॉलेज डिप्लोमेसी की पूरी क्षमता का लाभ उठाने के लिये देश में उपलब्ध विभिन्न क्षेत्रों की क्षमताओं के संदर्भ में अभी बहुत कुछ किया जाना आवश्यक है।

अभ्यास प्रश्न:  “अंतरिक्ष और फार्मास्यूटिकल्स क्षेत्र में भारतीय ‘आत्मनिर्भरता’ एक अपवाद है, जबकि ऐसी उपलब्धि सभी क्षेत्रों के लिये सामान्य होनी चाहिये।” इस कथन के संदर्भ में शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग आदि क्षेत्रों में भारत के आत्मनिर्भर होने की आवश्यकता और भारतीय विदेश नीति में इसकी भूमिका की समीक्षा कीजिये।


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