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कृषि कुंभ: तस्वीर बदलने की कवायद

  • 08 Jan 2019
  • 18 min read

संदर्भ


हाल ही में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान में कृषि कुंभ का आयोजन किया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने वीडियो कांफ्रेंसिंग के ज़रिये कृषि कुंभ का उदघाटन किया। ऐसा दावा किया जा रहा है कि इस कुंभ मेले से कृषि भावना को बढ़ाने में मदद मिलेगी। इस मेले में किसानों को विभिन्न फसलों, मत्स्य पालन, पशुपालन सहित अन्य तरीकों से आय दोगुनी करने के तरीके बताए गए। साथ ही, कृषि की हालत को सुधारने के लिये आधुनिक तकनीकों की भी जानकारी दी गई। जहाँ एक तरफ इस कृषि मेले को खेती-किसानी की तस्वीर को बदलने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ देश के अलग-अलग हिस्से में सरकार के खिलाफ किसानों का विरोध प्रदर्शन भी आए दिन सुर्ख़ियों में रहता है।

  • लिहाजा, यह सवाल उठना लाजिमी है कि किसानों के लिये सरकार द्वारा चलाए जाने वाली ढेरों योजनाओं की क्या सार्थकता है? यह सवाल इसलिये भी उठता है कि फसल बीमा से लेकर मिट्टी तक के लिये योजनाएँ चलाए जाने के बाद भी कृषि की हालत बेहतर नहीं हो पा रही। इतना ही नहीं, खेती-बाड़ी को अब देश में एक जोखिम भरा व्यवसाय भी माना जाने लगा है।
  • ऐसे में सवाल यह है कि जो कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की निर्धारक शक्ति रही है, वह मौजूदा वक्त में अपने अस्तित्व की लड़ाई क्यों लड़ रही है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम उन समस्याओं का समाधान खोजने में लगे हैं जिन्हें हम अभी तक समझ ही नहीं सके हैं? या फिर यह समझ लिया जाए कि योजनाओं के क्रियान्वयन में ही हमारी सरकारें नाकाम साबित हो रही हैं। ऐसे में हमें न केवल खेती-किसानी के समक्ष चुनौतियों पर विचार करने की ज़रूरत है बल्कि इस मुद्दे को पहली पंक्ति में खड़ा कर देने की भी आवश्यकता है।

सरकार द्वारा कृषि को बेहतर बनाने हेतु किये गए प्रयास

  • फरवरी, 2004 में राष्‍ट्रीय किसान आयोग का गठन किया गया था। उसके बाद देश में आयोग की सिफारिशों के आधार पर किसानों के लिये राष्‍ट्रीय नीति मंज़ूर की गई। इसका मकसद कृषि क्षेत्र की आर्थिक स्‍थिति में सुधार लाने के साथ-साथ किसानों की कुल आय में भी बढ़ोतरी करना था। मौजूदा सरकार ने भी कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
  • भारत सरकार ने राज्यों के लिये Model Agricultural Land Leasing Act, 2016 जारी किया था जिसके तहत भू-धारक वैधानिक रूप से कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों के लिये आपसी सहमति से भूमि लीज पर दे सकते हैं। अप्रैल, 2016 में ही राष्‍ट्रीय कृषि मंडी स्‍कीम यानी ई-नाम के तहत बेहतर मूल्‍य खोज सुनिश्‍चित करके, पारदर्शिता और प्रतियोगिता के ज़रिये कृषि मंडियों में क्रांति लाने की एक नवाचारी मंडी प्रक्रिया प्रारंभ की गई।
  • पुरानी योजनाओं के विस्‍तृत अध्‍ययन के बाद उनमें सुधार किया गया है और दुनिया की सबसे बड़ी किसान अनुकूल फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और मौसम आधारित फसल बीमा योजना शुरू की गई है।
  • देश में कुल 14.2 करोड़ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है जिसमें 65 फीसदी भूमि ऐसी है जहाँ सिंचाई की सुविधा नहीं है। लिहाज़ा, 2015 में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना यानी PMKSY को मंज़ूरी मिली। इसका मकसद सिंचाई हेतु निवेश में एकरूपता लाना, कृषि योग्य क्षेत्र का विस्तार करना, पानी की बर्बादी को कम करने के लिये खेतों में ही जल का इस्तेमाल करने की दक्षता को बढ़ाना है। साथ ही इसके ज़रिये सिंचाई में निवेश को आकर्षित करना भी एक लक्ष्य है। ‘कृषि समुद्री उत्‍पाद प्रसंस्‍करण एवं कृषि प्रसंस्‍करण क्‍लस्‍टर विकास योजना’ का नाम बदलकर ‘प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना’ के रूप में नए तरीके से पेश करने की कोशिश की गई है जिसका मकसद खाद्य प्रसंस्‍करण क्षेत्र के विकास को तीव्र गति प्रदान कर किसानों को उनकी उपज की बेहतर कीमत दिलाना है।
  • इसके अलावा, यूनिवर्सल मृदा स्‍वास्‍थ्‍य कार्ड योजना, देश में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिये परंपरागत कृषि विकास योजना, किसान तथा कृषि आधारित उद्योगों को जोड़ने के लिये Model Contract Farming and Service Act, 2018 जारी किया गया। लेकिन इन सबके बावजूद कृषि एक जोखिम भरा व्यवसाय बन गया है।

कृषि एक जोखिम भरा व्यवसाय क्यों?

  • दरअसल, कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का केंद्रबिंदु और भारतीय जीवन की धुरी है। आर्थिक जीवन का आधार, रोज़गार का प्रमुख स्रोत और विदेशी मुद्रा अर्जन का ज़रिया होने की वज़ह से कृषि को देश की आधारशिला कहा जाए तो कोई गलत नहीं होगा।
  • कुल श्रम शक्ति का लगभग 52 फीसद भाग कृषि एवं कृषि से संबंधित गतिविधियों से ही अपना गुज़र-बसर करता है लेकिन, मौजूदा वक्त में यह जोखिम भरा व्यवसाय बन गया है। दरअसल, ऐसा कई कारणों से है। कृषि में जोखिम फसल उत्पादन, मौसम की अनिश्चितता, फसल की कीमतों, कर्ज़ और नीतिगत फैसलों से जुड़ा हुआ है।
  • कीमतों में जोखिम का मुख्य कारण-पारिश्रमिक लागत से भी कम आय, बाज़ार की अनुपस्थिति और बिचौलियों द्वारा अत्यधिक मुनाफा कमाना है। बाज़ारों की अकुशलता, उत्पादन को बनाए रखने में किसानों की असमर्थता, घाटे के खिलाफ सरकारी बीमा में बहुत कम लचीलापन आदि कारण भी इस जोखिम के लिये ज़िम्मेदार हैं।
  • गरीबी तथा कर्ज़दार होने के कारण किसान अपनी उपज को कम कीमत पर बिचौलियों को बेचने के लिये मज़बूर होते हैं। भारत में कृषि क्षेत्र में निवेश का अभाव देखने को मिलता है, जिसकी बड़ी वज़ह यह है कि कृषि को आज फायदे का व्यवसाय नहीं माना जाता है।
  • वैश्वीकरण और उदारीकरण की नीतियों के तहत भारतीय बाज़ार के द्वार विदेशी कृषि उत्पादों के लिये खोल दिए जाने से कृषि व्यवस्था पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इसके अलावा बढ़ती महँगाई, गिरता भू-जल स्तर और भूमि की घटती उर्वरता की वज़ह से भी कृषि घाटे का सौदा बन गई है।

क्या वाकई कृषि के सामने अस्तित्व को बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है?

  • दरअसल, ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि देश में खेती-किसानी के मौजूदा हालात कृषि के अस्तित्व को ही चुनौती देने लगे हैं। एक तरफ, किसानों की बदहाली है तो दूसरी तरफ, साल-दर-साल बढ़ रही किसानों द्वारा आत्महत्या की खबरें चिंतित करती हैं। वस्तुतः किसान समुदाय के युवाओं में कृषि के प्रति आकर्षण में लगातार कमी आ रही है।
  • मौजूदा समय में कृषि के प्रति युवाओं की बेरुखी को देखकर लगता है कि देश की अगली पीढ़ी में खेती-किसानी के प्रति लगाव पैदा करना सबसे बड़ा मुद्दा होगा। एक अध्ययन के अनुसार, केवल दो फीसद किसानों के बच्चे ही कृषि को अपना पेशा बनाना चाहते हैं। इसकी आहट हमें 2011 की जनगणना में भी मिलती है जिसका अध्ययन करने पर पता चलता है कि पिछले 20 सालों से रोज़ाना 2000 किसान खेती छोड़ रहे हैं। फिर, यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि हमारे युवा कृषि को अपना पेशा बनाएंगे।
  • युवाओं द्वारा कृषि को नकारने की कई वज़हें हैं। पहली, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी लगातार किसान-आत्महत्या के आँकड़ों से सरकार को सचेत कर रही है। एनसीआरबी  के मुताबिक, 2016 में 11,370; 2015 में 12,602; जबकि 2014 में 12,360 किसानों ने आत्महत्या की थी। ज़ाहिर है हमारी सरकारें इन आत्महत्याओं को रोकने में नाकाम रहीं हैं।
  • दूसरा, युवाओं को कृषि एक रोज़गार के रूप में लुभाने में नाकाम रही है। हालत यह है कि कृषि को अपना करियर चुनने के बाद भी युवाओं को रोज़गार नसीब नहीं हो रहा है। दरअसल, राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक यानी नाबार्ड जैसी कई संस्थाएँ कृषि के छात्रों को नहीं बल्कि प्रबंधन के छात्रों को रोज़गार दे रही हैं।
  • फिर सवाल यह उठता है कि इन कृषि विश्वविद्यालयों का क्या औचित्य है? ये कृषि अनुसंधान और विकास के नाम पर बच्चों का दाखिला तो कर लेती हैं लेकिन, पढ़ाई पूरी होने के बाद हकीकत में इनका उपयोग नहीं किया जाता। यही कारण है कि कृषि विश्वविद्यालयों से डिग्री हासिल करने वाले ये युवा दूसरे व्यवसायों को अपनाने को मजबूर हैं।
  • निम्न उत्पादकता समेत सरकार की नीतियाँ भी युवाओं को कृषि अपनाने से रोक रही हैं। लिहाज़ा, इसे ‘कृषि प्रतिभा का पलायन' कहना गलत नहीं होगा।

कृषि में निम्न उत्पादकता के कारण

  • गौरतलब है कि भारत की आधी से ज़्यादा आबादी कृषि पर निर्भर है। लेकिन किसानों द्वारा आत्महत्या का रास्ता अपनाना और कर्ज़-माफी के लिये प्रदर्शन जैसे नकारात्मक कारणों के चलते ही कृषि चर्चा में रहती है। गौर करें तो, इन सभी समस्याओं के केंद्र में कृषि की निम्न उत्पादकता ही है।
  • दरअसल, इसके तीन मुख्य कारक हैं- पहला है मानवीय कारक। इसके अंतर्गत सामाजिक प्रथाओं और रीति-रिवाजों को शामिल किया जाता है। भारतीय किसानों का भाग्यवादी दृष्टिकोण और नई कृषि तकनीकों से उनकी दूरी कृषि में निवेश को बेकार कर देता है। खेती पर जनसंख्या का बढ़ता बोझ भी निम्न उत्पादकता का बड़ा कारण है।
  • दूसरा है तकनीकी कारक। हम जानते हैं कि भारत में मुख्य रूप से मानसून आधारित कृषि की जाती है। हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे क्षेत्रों को छोड़ दिया जाए तो, भारत के अधिकतर हिस्सों में किसानों को मानसून की अनिश्चितता पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
  • इसके अलावा, उच्च उत्पादकता वाले बीजों का अभाव, किसानों के पास मृदा परख तकनीक की कमी और कीटों, रोगाणुओं तथा चूहों जैसे अन्य कृंतकों से बचाव की वैज्ञानिक पद्धति की जानकारी का न होना भी बड़ी समस्या है। जाहिर है, इससे खेतों की उत्पादकता पर बुरा असर पड़ता है। लखनऊ में आयोजित कृषि कुंभ में भी इसी पहलू पर किसानों को जागरूक करने का प्रयास किया गया।
  • तीसरा है संस्थागत कारक। दरअसल, यह कारक सबसे अहम है। संस्थागत कारक से सरकार की नीतियाँ सीधे तौर पर जुड़ी हुईं हैं। मौजूदा वक्त में सरकार और किसानों के बीच न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर रस्साकशी इसी का दूसरा पहलू है।
  • इसके अलावा, जोत का छोटा आकार, किसानों के पास कृषि में निवेश के लिये साख का अभाव, कृषि उत्पादों के लिये उपयुक्त बाज़ार का अभाव भी मुख्य कारण हैं। साथ ही, कृषि में संस्थागत सुधारों के प्रति नौकरशाहों में उदासीनता का भाव, राजनेताओं में इच्छाशक्ति की कमी और सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण भी किसानों की स्थिति बेहतर नहीं हो पा रही है।

आगे की राह

  • दरअसल, कृषि में सुधार के लिये मौजूदा सरकार ने कई पहलें की हैं। लेकिन, किसान-आत्महत्या के लगातार मामलों से पता चलता है कि स्थिति बेहतर नहीं हो पा रही। दूसरी तरफ, कृषि और युवाओं के बीच बढ़ रही दूरी के कारण कृषि के सामने कई चुनौतियाँ खड़ी हो गईं हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि इन चुनौतियों से कैसे निबटा जाए? अतः ऐसी स्थिति में सबसे पहले, सरकार को चाहिये कि वह  कृषि योजनाओं के उचित क्रियान्वयन पर ज़ोर दे।
  • अक्सर देखा जाता है कि कृषि क्षेत्र के लिये सरकार की ढेरों योजनाओं के बावजूद भी किसानों की स्थिति में संतोषजनक सुधार नहीं हो पाता। जाहिर है कि योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन के अभाव में ही समस्याओं का हल नहीं हो पाता। एक तरफ जहाँ किसानों को खाद और सिंचाई से जुड़ी योजनाओं से लाभ न मिल पाना एक समस्या है, वहीं बीमा योजनाओं में उचित क्षतिपूर्ति नहीं मिल पाना चिंता का विषय है।
  • अगर सरकार चाहती है कि कृषि क्षेत्र में युवाओं की भागीदारी संतोषजनक स्तर तक पहुँचे, तो कुछ विशेष कदम उठाने होंगे। सबसे पहले कृषि संस्थानों में कृषि के छात्रों के लिये रोज़गार सुनिश्चित करना होगा। इन संस्थानों में कृषि के छात्रों को वरीयता देने के लिये उनके लिये सीटों को आरक्षित करना होगा ताकि कृषि को करियर बनाने वाले छात्रों को रोज़गार संबंधी सुरक्षा मिल सके।
  • इसके अलावा, भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय वन सेवा की तर्ज पर अलग से भारतीय कृषि सेवा प्रारंभ करना भी एक उपाय हो सकता है। इससे न केवल कृषि विनियामक तंत्र सुदृढ़ होगा बल्कि कृषि का अध्ययन करने वाले छात्रों का भी कृषि क्षेत्र में प्रशासनिक सेवा जैसे बड़े पदों पर बैठने का सपना पूरा हो सकेगा।
  • कृषि को व्यवसाय के रूप में अपनाने वालों के लिये कृषि को फायदे का सौदा और इसे आकर्षक बनाना होगा। इसके लिये महज़ नीतियों के उपयुक्त क्रियान्वयन की आवश्यकता है।
  • एक अन्य उपाय के रूप में देखा जाए, तो अनुबंध कृषि भी एक बेहतर विकल्प हो सकता है। इससे न केवल किसानों को फसल की बेहतर कीमत मिल पाएगी बल्कि, फसल की बर्बादी को भी रोका जा सकेगा। इसके अलावा, स्वामीनाथन कमिटी की सिफारिशों को धरातल पर उतारना होगा। लागत का डेढ़ गुना वाली सिफारिश को अमलीज़ामा पहनाकर सरकार किसानों की हालत को बेहतर करने की दिशा में एक बेहतर कदम उठा सकती है।
  • हालाँकि, सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया है लेकिन सरकार को समझना होगा कि इस वादे को पूरा करना आसान नहीं है।
  • आर्थिक सर्वे 2012-13 के मुताबिक, किसानों की सालाना औसत आय 77,112 रुपए थी जबकि हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा गठित अशोक दलवाई समिति के मुताबिक किसानों की सालाना औसत आय 77,976 रुपए है। इससे साफ है कि पिछले पाँच सालों में किसानों की आय में मामूली इज़ाफा हुआ है। जाहिर है, यह एक नाजुक मसला है जिस पर संजीदगी से विचार करने की ज़रूरत है।
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