हिंदी साहित्य: पेन ड्राइव कोर्स
ध्यान दें:

टू द पॉइंट

नीतिशास्त्र

अमर्त्य सेन

  • 25 Aug 2020
  • 7 min read

सामान्य परिचय

  • अमर्त्य सेन का जन्म वर्ष 1933 में कोलकाता में हुआ था।
  • उनकी शिक्षा कोलकाता के शांतिनिकेतन, ‘प्रेसीडेंसी कॉलेज’ तथा कैंब्रिज के ट्रिनीटी कॉलेज से पूर्ण हुई।
  • वर्तमान में अमर्त्य सेन हावर्ड विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं।
  • इसके अतिरिक्त उन्होंने जादवपुर विश्वविद्यालय, दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स तथा ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में भी अध्यापन का कार्य किया है।
  • वे एक महान अर्थशास्त्री एवं दार्शनिक हैं।

अमर्त्य सेन के कार्य एवं विचार

  • गौरतलब है कि द्वितीय पंचवर्षीय योजना में अमर्त्य सेन का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।
  • अमर्त्य सेन ने महालनोविस के द्विव - विभागीय क‌मियों को दूर करने के लिये चार विभागों वाला एक वैज्ञानिक मॉडल प्रस्तुत किया जिसे ‘राज-सेन मॉडल’ के नाम से जाना जाता है।
  • इस मॉडल को उन्होंने प्रोफेसर के.एन. राज के साथ मिलकर तैयार किया था।
  • उन्होंने जहाँ एक ओर संवृद्धि की आवश्यकता पर बल दिया, वहीं बेरोज़गारी उन्मूलन को प्राथमिकता देने की बात कही।
  • सेन के अनुसार, भारत जैसे देश में गरीबी उन्मूलन के लिये ज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को समुचित संस्थानिक प्रोत्साहन तथा उत्पादन के कारकों को बढ़ावा दिया जाना चाहिये।
  • सेन ने अकाल की बदलती प्रवृत्ति एवं कारणों पर भी समुचित प्रकाश डाला।
  • उनके अनुसार अब अकाल का संबंध खाद्यान्नों के निरपेक्ष अभाव से न होकर सापेक्ष अभाव से हो गया है।
  • अर्थात् बाज़ार में खाद्यान्न की उपलब्धता तो रहती है, परंतु कीमतों के अधिक बढ़ जाने के कारण लोग खरीदने में असमर्थ रहते हैं।
  • इस प्रकार क्रय शक्ति के अभाव में लोग भुखमरी का शिकार होने लगते हैं तथा अकाल दरिद्रता का ही एक पहलू बन जाता है।
  • उन्होंने कहा कि सभी को अधिकार प्राप्त कराने के लिये साक्षरता, शिक्षा तथा स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएँ उपलब्ध कराने की आवश्यकता है।
  • सेन नवउदारवादी भूमंडलीकरण के विरोधी हैं तथा वे ‘ट्रिक्ल डाउन’ थ्योरी को नहीं मानते।
  • वे भारत के संदर्भ में भूमि सुधारों पर अधिक बल देते है।
  • सामान्यत: सेन भूमंडलीकरण, उदारीकरण एवं निजीकरण के ‘आर्थिक सुधारों’ से सहमत हैं, परंतु उनका मानना है कि पूंजीवादी सरकारों को सामाजिक क्षेत्र/सामाजिक सुरक्षा/कल्याणकारी योजनाओं पर भी धन खर्च करना चाहिये।
  • वे मनरेगा एवं खाद्य सुरक्षा जैसी कल्याणकारी योजनाओं का समर्थन करते हैं।
  • सेन के अनुसार, यदि सरकारों को तीव्र आर्थिक विकास दर प्राप्त करनी है तो सामाजिक मदों में अपने खर्च को बढ़ाना चाहिये ताकि लोगों की क्रय शक्ति बढ़े एवं जीवनस्तर में सुधार हो।
  • सरकारों की पहली प्राथमिकता सामाजिक विकास ही होनी चाहिये अर्थात् वे विकास दर के ऊपर सामाजिक विकास को प्राथमिकता देते हैं।
  • शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी उन्मूलन आदि कार्यक्रमों को सरकार को अपने हाथ में लेना चाहिये।
  • वे सरकारों से उपभोक्ता सामग्रियों के वितरण क्षेत्र में भी हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं।
  • वस्तुत: यह आवश्यक नहीं है कि भोजन की पर्याप्त मात्रा होने पर गरीबों को भोजन मिल ही जाएगा क्योंकि महँगाई एवं जमाखोरी आदि के कारण ऐसा भी संभव है कि गरीब लोग भोजन खरीद ही न पाएँ।
  • उनका मानना है कि पूंजीवादी व्यवस्था में समस्या उत्पादन के क्षेत्र में न होकर वितरण के क्षेत्र में है इसलिये वे वितरण प्रक्रिया पर ज़ोर देते हुए ‘एक्टिव रिडिस्ट्रीब्यूशन’ (Active Redistribution) की बात करते हैं।
  • कुल मिलाकर अमर्त्य सेन पूंजीवाद को सही मानते हुए उसके सुधरे हुए रूप के समर्थक हैं।
  • वे आर्थिक सुधारों को धीरे-धीरे एवं सामाजिक सुरक्षा के साथ लागू करने के पक्षधर हैं।

अमर्त्य सेन की शिक्षाएँ

  • अमर्त्य सेन महिला सशक्तीकरण, उनके अधिकारों और समाज में उनकी भागीदारी में वृद्धि पर अत्यधिक बल देते हैं।
  • सेन का कथन है कि ‘‘नारी जाति को बल प्रदान करने पर हम उस भविष्य को हासिल कर सकते हैं जिसे हम प्राप्त करना चाहते हैं।’’
  • वे शिक्षा को अत्यधिक महत्त्व देते हैं। उनका मानना है कि शिक्षा का पिछड़ापन ही गरीबी का मूल कारण है।
  • शिक्षित व्यक्ति अज्ञानता एवं अंधकार से स्वयं को बचाता है तथा संचित धन का सदुपयोग करता है।
  • उनका मानना है कि सरकार को शिक्षा अनिवार्य कर देनी चाहिये ताकि शिक्षित समाज का निर्माण हो सके एवं देश का विकास हो।
  • वस्तुत: अमर्त्य सेन शिक्षा के माध्यम से सशक्त बनने की प्रेरणा देते हैं।
  • अमर्त्य सेन सामाजिक समानता पर बल देते हुए कहते हैं कि सभी को सामर्थ्यवान बनाने के लिये सामाजिक असमानताओं को कम करने एवं मानवीय क्षमताओं के संपूर्ण विकास पर जोर देना होगा।
  • मानवता एवं मानव अधिकारों को प्रमुखता देते हुए उनका कहना है कि ‘‘मानव अधिकार की धारणा हमारी साझी मानवता से बनती है। इन अधिकारों को किसी भी देश की नागरिकता या सदस्यता से प्राप्त नहीं किया जाता है, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति के लिये यह आवश्यक हैं।
  • उनका जीवन नागरिकों की आर्थिक स्वतंत्रता एवं मानव कल्याण हेतु अपने ज्ञान के माध्यम से प्रयास करने पर केंद्रित है।
  • वस्तुत: मानव की आर्थिक स्वतंत्रता के लिये कार्य करने का उनका दृढ़ संकल्प हम सभी के लिये प्रेरणास्रोत है।
एसएमएस अलर्ट
Share Page