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भारतीय अर्थव्यवस्था

विमुद्रीकरण के विधिक एवं नैतिक पक्ष

  • 07 Dec 2018
  • 7 min read

चर्चा में क्यों?

  • 8 नवंबर, 2016 को रात 8 बजे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्र के संबोधन में अप्रत्याशित रूप से इस बात की घोषणा की गई कि मध्य रात्रि से उच्च मूल्य वर्ग के 500 एवं   1000 के नोट लीगल टेंडर (वैद्य मुद्रा) नहीं रहेंगे अर्थात् सीमित अवधि में सीमित सेवाओं के साथ इसकी वैधता समाप्त हो जाएगी।
  • ध्यातव्य हो कि बड़े नोटों की वैधता के निरस्तीकरण के लिये जारी प्रेस विज्ञप्ति में विमुद्रीकरण नहीं, ‘वैध मुद्रा के चरित्र का निरस्तीकरण’ कहा गया है।

विमुद्रीकरण क्या है?

  • विमुद्रीकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा सरकार किसी भी सीरीज एवं मूल्यवर्ग की मुद्राओं को अवैध घोषित कर चलन से बाहर कर देती है।
  • सामान्यतः इस प्रक्रिया में प्रचलित पुरानी मुद्रा की जगह नई मुद्राएँ लाई जाती हैं। ऐसा कई बार काले धन पर अंकुश एवं जाली मुद्रा पर नियंत्रण हेतु होता है।

नोट वापस लेने की सरकार की शक्ति

  • RBI एक्ट, 1934 की धारा 26 (2) के तहत RBI के केंद्रीय बोर्ड की सिफारिश पर केंद्र सरकार भारत के गजट में अधिसूचना जारी कर किसी भी सीरीज एवं मूल्यवर्ग के नोट को वैध मुद्रा (Legal Tender) के रूप में निरस्त कर सकती है, जो नोटिफिकेशन में निर्दिष्ट तिथि से प्रभावी हो जाएगा।

1946, 1978 और 2016 में नोटों की वापसी में अंतर

  • 1946 एवं 1978 में अध्यादेश लाकर उच्च मूल्य वर्ग (1000, 5000, 10,000) के नोटों को वापस लिया गया, जबकि 2016 में नोटिफिकेशन जारी करके 500 और 1000 के नोट वापस लिये गए।
  • 2016 के नोटिफिकेशन में जमा से पूर्व घोषणा अनिवार्य नहीं थी, जबकि 1978 में जमा से पूर्व ‘घोषणा’ अनिवार्य थी।
  • 1978 के अध्यादेश में जहाँ विमुद्रित नोट का लेन-देन प्रतिबंधित व दंडनीय था, वहीं 2016 का फैसला निर्देशात्मक था। किंतु बाद में सीमित संख्या से अधिक विमुद्रीकृत नोट रखने को दंडात्मक बना दिया गया है।

क्या तात्कालिक करेंसी व्यवस्था की 86  प्रतिशत मुद्रा को अचानक अवैध घोषित किया जा सकता है?

  • आर.बी.आई. एक्ट, 1934 की धारा 26(2) में किसी भी  श्रृंखला (Any Series) एवं मूल्यवर्ग के नोटों की वैधता वापस लेने का उल्लेख है।
  • यदि किसी (Any) का अर्थ न्यायपालिका की दृष्टि से देखें तो ‘शेख मोहम्मद बनाम कलेक्टर ऑफ कस्टम’ मामले में उच्चतम न्यायालय ने कस्टम एक्ट की धारा 111(d) के Any prohibition को Every prohibition माना। साथ ही ‘लखनऊ डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम एम.के. गुप्ता’ के मामले में उच्चतम न्यायालय ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 2(O) की Service of any description को Service of  every description माना है।
  • इस अर्थ में तो आर.बी.आई.नोटों की ‘किसी भी  शृंखला’ के स्थान पर ‘सभी शृंखलाओं’ को वापस ले सकती है।

नोटों का अवैधीकरण क्या मौलिक अधिाकारों का हनन है?

  • उच्चतम न्यायालय के समक्ष आई याचिकाओं में विमुद्रीकरण को मौलिक अधिकारों के हनन का मामला माना गया है। इसके अनुसार खाताधारक व खाताविहीन व्यक्ति के बीच भेद न कर विधि के समक्ष समता का उल्लंघन किया गया है।
  • क्या सीमित नोटों को बदलने की सुविधा देना, अनिवार्य जमा संपत्ति का अधिग्रहण नहीं है? बैंकों की लाइन में खड़ा करवाना व व्यवसाय के लिये पर्याप्त नगदी की सुविधा नहीं देना, क्या जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन नहीं है?

क्या सरकार को विमुद्रीकरण का अधिाकार प्राप्त था?

  • वैसे तो भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 24(2) के अनुसार रिजर्व बैंक के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के सुझाव पर केंद्र सरकार किसी भी मूल्य के नोट के जारी होने पर रोक लगा सकती है।

विमुद्रीकरण के समय जमा धान से जुड़े विधिाक व व्यावहारिक पहलू

  • मात्र 2000 प्रतिदिन या 20 हजार की साप्ताहिक निकासी की सीमा का सामान्यीकरण, शादी व बीमारी के वक्त व्यक्ति के स्वयं के संचित धन की निकासी हेतु पहचान पत्र जैसे साक्ष्यों के प्रस्तुतीकरण एवं निकासी सीमा का आरोपण कहाँ तक तर्कसंगत है?
  • भारत में ग्रामीण ऋण का 46 प्रतिशत को-ऑपरेटिव बैंकों द्वारा दिया जाता है। ऐसे में को-ऑपरेटिव बैंकों में नोट जमा और वापस लेने के अधिकार को प्रतिबंधित करना उचित नहीं है।
  • आदिवासी, खाता विहीन व्यक्ति व मंदबुद्धि, बेघर, पहचान पत्र विहीन लोगों के धन की रक्षा हेतु सरकार की नीति अस्पष्ट थी।
  • नेपाल राष्ट्र में जमा 3.5 करोड़ के भारतीय नोट के विनिमय (exchange) के अनुरोध को RBI द्वारा ठुकराना एवं सांस्कृतिक रूप से व्यावहारिक लेन-देन पर आधारित नेपाल में 10, 000 करोड़ की प्रचलित भारतीय मुद्रा को हवाला का धन मानना अनुचित है।

आगे की दिशा

वैसे तो सरकार के इस विमुद्रीकरण से संपूर्ण भारतवर्ष का जन-जीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ। परंतु जनहित में  यह कितना सफल रहा, यह आने वाले समय में ही ज्ञात हो सकता है। साथ ही इसके विधिक पहलू पर न्यायालय का फैसला ही मार्गदर्शन दे सकता है।

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