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पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986

  • 29 Jun 2021
  • 13 min read

परिचय

पर्यावरण की सुरक्षा एवं पर्यावरण में सुधार करने के उद्देश्य से पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम (Environment (Protection Act-EPA), 1986 को अधिनियमित किया गया था।

  • यह केंद्र सरकार को सभी रूपों में पर्यावरण प्रदूषण को रोकने और देश के विभिन्न हिस्सों में विशिष्ट पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने के लिये प्राधिकरण स्थापित करने हेतु अधिकृत करता है।
  • यह अधिनियम पर्यावरण के संरक्षण और सुधार हेतु सबसे व्यापक कानूनों में से एक है।

पृष्ठभूमि: EPA का अधिनियमन जून, 1972 (स्टॉकहोम सम्मेलन) में स्टॉकहोम में आयोजित "मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन" को देश में प्रभावी बनाने हेतु किया गया। ज्ञातव्य है कि भारत ने 'मानव पर्यावरण में सुधार के लिये उचित कदम उठाने हेतु आयोजित' इस सम्मेलन में भाग लिया था।

संवैधानिक प्रावधान:

  • EPA को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 253 के तहत अधिनियमित किया गया था,  जो अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को प्रभावी करने के लिये कानून बनाने का प्रावधान करता है।
  • संविधान का अनुच्छेद 48A निर्दिष्ट करता है कि राज्य पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने तथा देश के वनों और वन्यजीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा।
  • अनुच्छेद 51A में प्रावधान है कि प्रत्येक नागरिक पर्यावरण की रक्षा करेगा।

अधिनियम का विस्तार क्षेत्र: यह अधिनियम जम्मू-कश्मीर राज्य सहित पूरे भारत में लागू है।

ईपीए अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ 

  • केंद्र सरकार की शक्तियाँ: केंद्र सरकार के पास राज्य सरकारों के साथ मिलकर पर्यावरण की रक्षा और सुधार के उद्देश्य से आवश्यक सभी उपाय करने की शक्ति होगी।
  • इसके अलावा केंद्र सरकार को निम्नलिखित अधिकार हैं:
    • पर्यावरण प्रदूषण की रोकथाम, नियंत्रण और उपशमन के लिये एक राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम की योजना बनाना और उसे क्रियान्वित करना।
    • पर्यावरण की गुणवत्ता में सुधार के लिये विभिन्न पहलुओं पर मानक निर्धारित करना।
    • विभिन्न स्रोतों से पर्यावरण प्रदूषकों के उत्सर्जन या निर्वहन के लिये मानक निर्धारित करना।
    • उन क्षेत्रों पर कुछ सुरक्षा उपायों के अधीन प्रतिबंध लगाना, जिनमें किसी उद्योग, उद्योगों के समूह या ऐसी प्रक्रियाओं का संचालन हो रहा है।
    • केंद्र सरकार इस अधिनियम के तहत विभिन्न उद्देश्यों के लिये अधिकारियों की नियुक्ति कर सकती है और उन्हें संबंधित शक्तियाँ एवं कार्य सौंप सकती है।
  • अधिनियम के अनुसार केंद्र सरकार को निम्रलिखित निर्देश देने की शक्ति है:
    • किसी उद्योग के संचालन या प्रक्रिया को बंद करने, उसका निषेध या विनियमन करने की शक्ति।
    • बिजली, पानी या किसी अन्य सेवा की आपूर्ति को रोकने या विनियमन करने की शक्ति।
  • प्रदूषक उत्सर्जन पर प्रतिबंध: किसी भी व्यक्ति या संगठन को निर्धारित मानकों से अधिक पर्यावरण प्रदूषक उत्सर्जित करने की अनुमति नहीं होगी।
  • प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का अनुपालन: कोई भी व्यक्ति प्रक्रिया का अनुपालन न करते हुए या निर्धारित सुरक्षा उपायों का पालन किये बिना किसी भी खतरनाक पदार्थ को नहीं रखेगा।
  • प्रवेश और निरीक्षण की शक्तियाँ: केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किसी भी व्यक्ति को किसी भी स्थान पर (आवश्यक सहायता के साथ) निम्नलिखित कारणों से प्रवेश करने का अधिकार होगा:
    • अधिनियम के अंतर्गत दिये गए किसी भी आदेश, अधिसूचना एवं निर्देशों के अनुपालन के निरीक्षण हेतु।
    • वह किसी भी उपकरण, औद्योगिक संयंत्र, रिकॉर्ड, रजिस्टर, दस्तावेज़ या किसी अन्य भौतिक वस्तु की जाँच (और यदि आवश्यक हो तो ज़ब्त करने के लिये) के उद्देश्य से इस अधिनियम के तहत दंडनीय अपराध हेतु प्रमाण प्रस्तुत कर सकता है।
  • पर्यावरण प्रयोगशालाओं की स्थापना: अधिनियम के अनुसार केंद्र सरकार के पास निम्नलिखित शक्तियाँ हैं:
    • पर्यावरण प्रयोगशालाएँ स्थापित करना।
    • ऐसी प्रयोगशाला को सौंपे गए कार्यों को करने के लिये किसी भी प्रयोगशाला या संस्थान को पर्यावरण प्रयोगशालाओं के रूप में मान्यता देना।
    • केंद्र सरकार को पर्यावरण प्रयोगशालाओं के कार्यों को निर्दिष्ट करने वाले नियम बनाने का भी अधिकार है।
  • सरकारी विश्लेषक की नियुक्ति: किसी मान्यता प्राप्त पर्यावरण प्रयोगशाला को हवा, पानी, मिट्टी या अन्य पदार्थ के नमूनों के विश्लेषण के लिये केंद्र सरकार एक सरकारी विश्लेषक की नियुक्ति कर सकती है।
  • अपराधों के लिये दंड: अधिनियम के किसी भी प्रावधान का अनुपालन न करना या उल्लंघन करना अपराध माना जाता है।
    • EPA के तहत किसी भी अपराध का दंड पाँच साल तक की कैद या एक लाख रुपए तक का जुर्माना या दोनों एक साथ हो सकता है।
  • कंपनियों द्वारा अपराध: यदि इस अधिनियम के तहत किसी कंपनी द्वारा कोई अपराध किया जाता है, तो जब तक यह साबित न हो जाए कि अपराधी कौन है;  अपराध के समय नियुक्त वह प्रत्येक व्यक्ति, जो कंपनी का सीधा प्रभारी है, दोषी माना जाता है।
  • सरकारी विभागों द्वारा अपराध: यदि इस अधिनियम के तहत सरकार के किसी विभाग द्वारा कोई अपराध किया गया है, तो विभाग के प्रमुख को अपराध का दोषी माना जाएगा जब तक कि अपराध अन्यथा साबित न हो।
    • विभाग के प्रमुख के अलावा कोई भी अधिकारी यदि दोषी साबित होता है तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है तथा तद्नुसार दंडित किया जा सकता है।
  • अपराधों का संज्ञान: कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के तहत किसी भी अपराध का संज्ञान नहीं लेगा बशर्ते शिकायत निंमलिखित में से किसी के द्वारा न की गई हो:
    • केंद्र सरकार या उसकी ओर से कोई प्राधिकरण।
    • एक ऐसा व्यक्ति, जो केंद्र सरकार या उसके प्रतिनिधि प्राधिकरण को 60 दिनों का नोटिस सौंपने के पश्चात् न्यायालय के पास आया हो।

अधिनियम की कमियाँ 

  • अधिनियम का पूर्ण केंद्रीकरण: अधिनियम का एक संभावित दोष इसका केंद्रीकरण हो सकता है। जहाँ व्यापक शक्तियाँ केंद्र को प्रदान की जाती हैं और राज्य सरकारों के पास कोई शक्ति नहीं होती है। ऐसे में केंद्र सरकार इसकी मनमानी एवं दुरुपयोग के लिये उत्तरदायी है।
  • कोई सार्वजनिक भागीदारी नहीं: अधिनियम में पर्यावरण संरक्षण के संबंध में सार्वजनिक भागीदारी के बारे में भी कोई बात नही कही गई है, जबकि, मनमानी को रोकने और पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिये नागरिकों को पर्यावरण संरक्षण में शामिल करने की आवश्यकता है।
  • सभी प्रदूषकों को शामिल न किया जाना: यह अधिनियम प्रदूषण की आधुनिक अवधारणा जैसे शोर, अधिक बोझ वाली परिवहन प्रणाली और विकिरण तरंगों को प्रदूषकों की सूची में शामिल नहीं करता है, जो पर्यावरण प्रदूषण के महत्त्वपूर्ण कारक हैं।

राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण (National Environment Appellate Authority- NEAA) और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal-NGT)

  • इसकी स्थापना राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण अधिनियम, 1997 के तहत केंद्र सरकार द्वारा की गई थी।
  • NEAA की स्थापना उन क्षेत्रों में लगाए गए प्रतिबंध के संबंध में अपील सुनने के लिये की गई थी, जिनमें पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत कुछ सुरक्षा उपायों के अधीन कोई उद्योग या प्रक्रिया का संचालन नहीं किया जाएगा।
  • हालाँकि NEAA (राष्ट्रीय पर्यावरण न्यायाधिकरण के साथ) को अपर्याप्त पाया गया, जिससे पर्यावरणीय मामलों को अधिक कुशलतापूर्वक और प्रभावी ढंग से निपटाने के लिये एक संस्था की मांग बढ़ गई।
    • अतः पर्यावरण संरक्षण से संबंधित मामलों के प्रभावी और शीघ्र निपटान के लिये राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत वर्ष 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की स्थापना की गई थी।
    • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के साथ NGT छह अन्य कानूनों के तहत दीवानी मामलों को भी सुलझाता है।

EPA के तहत जारी महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ 

  • तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना (1991): यह तटीय हिस्सों से जुड़ी गतिविधियों को नियंत्रित करती है।
    • दिसंबर 2018 में केंद्रीय कैबिनेट ने तटीय विनियमन क्षेत्र (Coastal Regulation Zone- CRZ) अधिसूचना, 2018 को मंज़ूरी दी।
  • विकास परियोजना अधिसूचना का पर्यावरणीय प्रभाव आकलन।

पर्यावरण संरक्षण के लिये अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन जिसका भारत एक हस्ताक्षरकर्त्ता है:

  • ज़ोन परत को नष्ट करने वाले पदार्थों पर वियना कन्वेंशन के लिये मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल, 1987
  • खतरनाक अपशिष्टों के सीमा पार संचलन पर बेसल कन्वेंशन, 1989
  • रॉटरडैम कन्वेंशन, 1998
  • स्थायी कार्बनिक प्रदूषकों (POPs) पर स्टॉकहोम कन्वेंशन
  • जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC), 1992
  • जैव विविधता पर कन्वेंशन (CBD), 1992
  • मरुस्थलीकरण का मुकाबला करने के लिये संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCCDD), 1994
  • इंटरनेशनल ट्रॉपिकल टिम्बर एग्रीमेंट (1983) और द इंटरनेशनल ट्रॉपिकल टिम्बर ऑर्गनाइजेशन (ITTO), 1994:
    • इंटरनेशनल ट्रॉपिकल टिम्बर एग्रीमेंट (ITTA), 1983 द्वारा स्थापित ITTO वर्ष 1985 में स्थापित हुआ और वर्ष 1987 में प्रभाव में आया।
    • ITTO अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और उष्णकटिबंधीय जलवायु में पाई जाने वाली लकड़ियों के उपयोग एवं इससे जुड़े संसाधनों के लिये स्थायी प्रबंधन से संबंधित मुद्दों पर चर्चा, परामर्श और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की सुविधा प्रदान करता है।
    • ITTA (वर्ष 1983) में निहित समझौते पर वर्ष 1994 में बातचीत हुई एवं यह 1 जनवरी, 1997 को लागू हुआ।
    • इस संगठन में 57 सदस्य देश हैं। भारत ने वर्ष 1996 में ITTA की पुष्टि की।
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