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अंतर्राष्ट्रीय संबंध

गहराते नेपाल-चीन संबंधः भारत के लिये मुश्किलें

  • 19 Dec 2018
  • 7 min read


भूमिका


फरवरी 2018 में नेपाल का प्रधानमंत्री बनने के पश्चात् के.पी.ओली अपनी पहली विदेश यात्रा पर भारत आये। ऐतिहासिक तौर पर देखा जाए तो नेपाल तथा भारत के संबंध प्राचीन एवं स्वाभाविक रूप से संबंध सौहार्द्रपूर्ण ही रहे हैं। अप्रैल 2015 में नेपाल में आए भूकंप में भारत की सक्रिय मदद के बाद दोनों देशों के संबंध एक नई ऊँचाई पर पहुँच गए थे, लेकिन हाल ही में नेपाल में नवीन संविधान के प्रावधानों को लागू करने के साथ उपजे मधेशी विवाद ने भारत-नेपाल संबंधों में गिरावट ला दी। साथ ही चीन से किये गये नए समझौतों से ऐसा प्रतीत होता है कि नेपाल चीन को भारत का विकल्प बनाने की कोशिश कर रहा है क्योंकि नेपाल द्वारा चीन की वन बेल्ट रोड परियोजना पर हस्ताक्षर करने के साथ तिब्बत से होकर नेपाल तक रेल लाइन बिछाने का भी समझौता चीन से किया है वहीँ चीन ने नेपाल के लिए आने वाले वर्षों में तेल आपूर्ति की भी घोषणा की है।इन समझौतों ने भारत और नेपाल के संबंधों में संशय की स्थिति उत्पन्न कर दी है।

भारत-नेपाल संबंध

  • नेपाल की विशिष्ट भू-अवस्थिति के कारण यह भारत के लिये अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है। नेपाल भारत के लिये जल, आंतरिक सुरक्षा, बाह्य सुरक्षा और व्यापारिक हितों को सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। नेपाल में जलविद्युत की व्यापक संभावनाएँ मौजूद हैं और भारत कई परियोजनाओं में नेपाल के साथ मिलकर भी काम कर रहा है, किंतु इसमें भारत और नेपाल के बीच बढ़ते अविश्वास और चीनी कम्पनियों की मौजूदगी ने गतिरोध उत्पन्न किया है।
  • भारत नेपाल को विशाखापत्तनम बन्दरगाह का उपयोग करने और बांग्लादेश के रास्ते भूमि पारगमन की सुविधा भी उपलब्ध करा चुका है लेकिन फिर भी नेपाल चीन को भारत के विकल्प के रूप में खोजने की कोशिश कर रहा है।
  • यह बात सही है कि नेपाल के पहाड़ी नेताओं की भारत विरोधी मानसिकता, भारत द्वारा वहाँ चलाई जा रही परियोजनाओं में देरी, नेपाल में भारत की लोकप्रियता में गिरावट और हाल की नाकेबंदी की घटना को उचित ढंग से न सुलझा पाने के कारण नेपाल में भारत की उपस्थिति कमज़ोर हुई है।
  • नेपाल के अन्य देशों के साथ होने वाले व्यापार का लगभग 90% भारत से होकर गुजरता है। साथ ही, काठमाण्डू और तियानजिन बंदरगाह के बीच की दूरी लगभग 3,000 किमी. है, जबकि काठमाण्डू से कोलकाता करीब 900 किमी. दूर है।
  • इसके अलावा, नेपाल और चीन के मध्य कोई भी सीमावर्ती सम्पर्क मार्ग सुचारु रूप से कार्यरत नहीं है। अतः नेपाल द्वारा चीन से नज़दीकी कितनी कारगर होगी, इस पर संदेह है।
  • ध्यातव्य है कि भारत को चीन की ‘वन बेल्ट वन रोड’ परियोजना से आपत्ति है, क्योंकि यह भारत के सामरिक हितों की दृष्टि से प्रतिकूल है जबकि नेपाल ने इस परियोजना का भाग बनने के लिये अपनी स्वीकृति दे दी है।
  • 1950 से नेपाल, भारत और चीन के मध्य एक ‘बफर स्टेट’ बना हुआ है। भारत के साथ नेपाल के सांस्कृतिक और सामाजिक संबंध बहुत प्रगाढ़ रहे हैं, किंतु चीन नेपाल में अपनी भूमिका बढ़ाने के लिये सदैव नेपाली लोगों में भारत विरोधी भावनाएँ भड़काता रहा है।

चीन किन कारणों से नेपाल में अपना वर्चस्व बढ़ाना चाहता है?

  • नेपाल में बसे लगभग 20 हजार तिब्बतियों की चीन विरोधी गतिविधियों पर नज़र रखना। दूसरा, नेपाल के साथ भारत के संबंध कमज़ोर करना और तीसरा, नेपाल में चीन समर्थक राजनीतिक वर्ग तैयार करना। नेपाल को अपने प्रभाव में करके चीन, भारत के बौद्ध धर्म की प्रमुखता को भी चुनौती देना चाहता है।
  • नेपाल भी सदैव भारत से संतुलन के लिये चीनी कार्ड खेलता रहा है। इसकी शुरुआत 1955 में राजा महेन्द्र बीर बिक्रम शाह के समय से ही हो चुकी थी। 1980 के दशक में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने नेपाल के चीन की ओर झुकाव के विरुद्ध सख्त रवैया अपनाया था।
  • सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता में भारतीय दावेदारी के प्रश्न पर नेपाल विरोध में जाकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गलत संदेश दे सकता है।

नेपाल-चीन के मज़बूत रिश्तों का भारत पर क्या प्रभाव होगा?


चीन-नेपाल के बढ़ते संबंध भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिये ख़तरनाक साबित हो सकते हैं। इससे माओवाद, ड्रग्स, अवैध हथियारों की आवाजाही बढ़ने के ख़तरे हैं। चीन के बढ़ते प्रभाव के कारण भारत नेपाल में अपनी पैठ खो देगा, साथ ही चीन अरुणाचल प्रदेश व सिक्किम में अपनी सक्रियता बढ़ा सकता है।

निष्कर्ष


यह कहना सही नहीं होगा कि चीन कभी भी नेपाल के लिये भारत का विकल्प बन सकता है क्योंकि भारत एवं नेपाल और नेपाल-चीन की भौगोलिक एवं सांस्कृतिक भिन्नताएँ हैं। भारत-नेपाल के संबंध न केवल सांस्कृतिक रूप से मज़बूत हैं बल्कि भौगोलिक कारण भी इन संबंधों को मज़बूती प्रदान करते हैं। लेकिन फिर भी इस बात पर भारत को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है कि कहीं नेपाल किसी अन्य देश के साथ मिलकर हमारे लिये परेशानी का सबब न बन जाए। इसलिये तत्काल कूटनीतिक स्तर पर प्रभावशाली निर्णय लेने की ज़रूरत है।

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