दृष्टि के NCERT कोर्स के साथ करें UPSC की तैयारी और जानें
ध्यान दें:

UP PCS Mains-2025

  • 04 Mar 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 2 सामाजिक न्याय

    Q. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) को भारत में मानवाधिकारों की रक्षा करने में अक्सर अप्रभावी क्यों देखा जाता है? (उत्तर 125 शब्दों में दीजिये)

    उत्तर

    हल करने का दृष्टिकोणः

    • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का संक्षिप्त परिचय दीजिये।
    • इसकी सीमाओं के साथ-साथ इसके कार्यों पर भी प्रकाश डालिये।
    • आगे की राह बताते हुए निष्कर्ष निकालिये।

    परिचय

    भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की स्थापना 1993 में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम के तहत मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिये की गई थी। आयोग मानवाधिकारों का प्रहरी है और इसका उद्देश्य इसके उल्लंघनों का समाधान करना है। जागरूकता बढ़ाने और सिफारिशें प्रदान करने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका के बावजूद, NHRC को अक्सर "दंतहीन बाघ" के रूप में देखा जाता है, जिससे मानवाधिकारों की रक्षा में इसकी प्रभावशीलता के बारे में चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।

    मुख्य भाग

    राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के कार्यः

    • किसी लोक सेवक द्वारा मानव अधिकारों के किसी उल्लंघन या ऐसे उल्लंघन की रोकथाम में लापरवाही की जाँच करना, चाहे वह स्वप्रेरणा से हो या उसके समक्ष प्रस्तुत याचिका पर या न्यायालय के आदेश पर।
    • किसी न्यायालय में लंबित मानव अधिकारों के उल्लंघन के आरोप से संबंधित किसी कार्यवाही में हस्तक्षेप करना।
    • कैदियों की जीवन स्थितियों का अध्ययन करने के लिये जेलों और हिरासत स्थलों का दौरा करना तथा उसके आधार पर सिफारिशें करना।
    • मानव अधिकारों की सुरक्षा के लिये संवैधानिक और अन्य कानूनी सुरक्षा उपायों की समीक्षा करना तथा उनके प्रभावी कार्यान्वयन के लिये उपायों की सिफारिश करना।
    • आतंकवादी कृत्यों सहित उन कारकों की समीक्षा करना जो मानव अधिकारों के आनंद को बाधित करते हैं तथा उपचारात्मक उपायों की सिफारिश करना।

    NHRC की अप्रभावीताः

    • सीमित प्रवर्तन शक्तियाँः NHRC के पास अपनी सिफारिशों को लागू करने का अधिकार नहीं है, जिसका अर्थ है कि यह सरकार को केवल सलाह दे सकता है, कार्रवाई के लिये बाध्य करने की शक्ति नहीं रखता है।
      • सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एच.एल. दत्तु ने NHRC को "दंतविहीन बाघ" कहा है क्योंकि "अधिनियम में एक प्रावधान है, जो उन्हें केवल सिफारिशें करने की अनुमति देता है।"
    • संसाधनों की कमीः अपर्याप्त धन और स्टाफ के कारण NHRC की गहन जाँच और आउटरीच कार्यक्रम संचालित करने की क्षमता में बाधा आती है, जिससे मानवाधिकार उल्लंघनों से निपटने में इसकी प्रभावशीलता प्रभावित होती है।
    • राजनीतिक हस्तक्षेपः आयोग को अक्सर राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ता है, जिससे इसकी स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है और यह संवेदनशील मुद्दों पर विचार करने या शक्तिशाली राज्य अभिनेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने से हतोत्साहित हो सकता है।
    • लंबित मामलों की संख्याः लंबित शिकायतों की संख्या बढ़ने से पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी होती है, जिससे मानवाधिकार संबंधी महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर प्रभावी प्रतिक्रिया देने की NHRC की क्षमता पर जनता का भरोसा कम होता है।
    • जन जागरूकता का अभावः अनेक नागरिक NHRC के कार्यों और शिकायत दर्ज करने के तरीके से अनभिज्ञ हैं, जिससे जन सहभागिता सीमित हो रही है तथा अधिकारों की वकालत करने में आयोग की प्रभावशीलता सीमित हो रही है।
    • अप्रभावी निगरानीः मानवाधिकार स्थितियों की NHRC की निगरानी की अक्सर यह कह कर आलोचना की जाती है कि यह अपर्याप्त है तथा उल्लंघनों पर अपर्याप्त अनुवर्ती कार्रवाई और प्राधिकारियों को की गई सिफारिशें भी अपर्याप्त हैं।

    आगे की राहः

    • NHRC को अपनी सिफारिशों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिये अधिक सशक्त प्रवर्तन शक्तियाँ प्रदान करें।
    • लंबित मामलों के समाधान के लिये पर्याप्त धन एवं संसाधन उपलब्ध कराएं।
    • स्पष्ट दिशानिर्देशों के माध्यम से NHRC की स्वतंत्रता को राजनीतिक हस्तक्षेप से सुरक्षित रखें।
    • नागरिकों को मानवाधिकारों और NHRC की भूमिका के बारे में शिक्षित करने के लिये सार्वजनिक अभियान शुरू करें
close
Share Page
images-2
images-2