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06 Mar 2026
सामान्य अध्ययन पेपर 2
अंतर्राष्ट्रीय संबंध
Q. वैश्विक दक्षिण में भारत के नेतृत्व के महत्त्व पर चर्चा कीजिये। इसका ऐतिहासिक संदर्भ इसकी वर्तमान स्थिति और पहलों को कैसे प्रभावित करता है? (उत्तर 200 शब्दों में दीजिये)
उत्तर
हल करने का दृष्टिकोणः
- वैश्विक दक्षिण, इसकी साझा चुनौतियों और सहयोग और एकजुटता को बढ़ावा देने वाले नेता के रूप में भारत की बढ़ती भूमिका को परिभाषित कीजिये।
- भारत के नेतृत्व योगदान पर प्रकाश डालिये। इन प्रयासों को भारत की ऐतिहासिक भूमिका से जोड़िये तथा इसके उपनिवेशवाद विरोधी समर्थन और दक्षिण-दक्षिण सहयोग पर ज़ोर दीजिये।
- भारत के नेतृत्व को ऐतिहासिक सहानुभूति और आधुनिक पहल का मिश्रण बताते हुए निष्कर्ष निकालिये।
परिचय
ग्लोबल साउथ में वे देश शामिल हैं जिन्हें अक्सर विकासशील माना जाता है, मुख्य रूप से अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका में स्थित हैं, जो गरीबी और आय असमानता जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इस संदर्भ में, भारत का नेतृत्व तेजी से महत्त्वपूर्ण हो गया है क्योंकि यह इन देशों के बीच एकजुटता और सहयोग को बढ़ावा देता है। हाल ही में, भारत ने ‘एक सतत् भविष्य के लिये एक सशक्त वैश्विक दक्षिण’ थीम के साथ तीसरे वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ शिखर सम्मेलन की मेजबानी की।
मुख्य भाग
वैश्विक दक्षिण में भारत के नेतृत्व का महत्त्वः
- विकासशील देशों के लिये वकालतः भारत अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर विकासशील देशों के लिये एक शक्तिशाली रूप में कार्य करता है तथा ऋण राहत और सतत् विकास जैसे मुद्दों पर वकालत करता है।
- उदाहरण के लिये, वैश्विक विकास समझौते के लिये इसके हालिया प्रस्ताव का उद्देश्य इन देशों के बीच बढ़ते ऋण स्तर को संबोधित करना है।
- स्वास्थ्य सुरक्षाः स्वास्थ्य समानता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने में उसके सक्रिय दृष्टिकोण से स्पष्ट होती है।
- वैक्सीन मैत्री पहल के माध्यम से, भारत ने बांग्लादेश और नेपाल सहित 100 से अधिक देशों को कोविड-19 टीके की आपूर्ति की, जिससे वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा बढ़ाने में इसकी भूमिका मज़बूत हुई
- जलवायु कार्रवाई नेतृत्वः भारत जलवायु संबंधी पहलों में अग्रणी है, जैसे कि अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन, जो युगांडा और केन्या जैसे देशों में सौर ऊर्जा अपनाने को बढ़ावा दे रहा है, जो जलवायु परिवर्तन से काफी प्रभावित हैं।
- आर्थिक सशक्तिकरणः व्यापार संवर्द्धन और क्षमता निर्माण पहलों के माध्यम से, जैसे कि व्यापार गतिविधियों के लिये 2.5 मिलियन डॉलर की घोषित निधि, भारत का लक्ष्य वैश्विक दक्षिण देशों के साथ आर्थिक अंतर्संबंधों को बढ़ाना है, जिससे मोजाम्बिक जैसे देशों को अपने कृषि निर्यात को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी।
- सांस्कृतिक एवं तकनीकी सहयोगः कई विकासशील देशों के साथ भारत के ऐतिहासिक संबंध और साझा सांस्कृतिक विरासत सहयोग को बढ़ावा देते हैं।
- भारतीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग (ITEC) जैसे कार्यक्रम स्थानीय क्षमताओं को बढ़ाने के लिये प्रशिक्षण एवं कौशल विकास प्रदान करते हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ
ग्लोबल साउथ में एक नेता के रूप में भारत की यात्रा उसके उत्तर-औपनिवेशिक इतिहास में गहराई से निहित है। 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद, भारत उत्पीड़ित और हाशिये पर पड़े लोगों की आवाज के रूप में उभरा, जिसने वैश्विक मंच पर आत्मनिर्णय और समानता की वकालत की। इसके औपनिवेशिक अतीत ने समान सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे अन्य विकासशील देशों के साथ एकजुटता की भावना पैदा की है।’
यह ऐतिहासिक संदर्भ भारत की वर्तमान पहलों को प्रभावित करता है तथा सहयोगात्मक ढाँचे के माध्यम से वैश्विक दक्षिण को सशक्त बनाने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
- उपनिवेशवाद विरोधी वकालतः भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन में एक प्रमुख खिलाड़ी था, जिसने अफ्रीका और एशिया में विभिन्न स्वतंत्रता आंदोलनों का समर्थन किया। यह ऐतिहासिक भूमिका वैश्विक दक्षिण के कई देशों के साथ स्थायी संबंधों को बढ़ावा देती है।
- दक्षिण-दक्षिण सहयोगः विकासशील देशों के बीच सहयोग पर भारत का ज़ोर भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन जैसे मंचों की स्थापना से स्पष्ट है, जो संवाद और साझेदारी को बढ़ावा देता है।
- सांस्कृतिक संबंधः वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ भारत का साझा इतिहास और सांस्कृतिक संबंध सहयोग के लिये आधार तैयार करते हैं। भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग (आईटीईसी) कार्यक्रम जैसी पहल प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के अवसर प्रदान करती है।
- एकजुटता की विरासतः शीत युद्ध काल के दौरान भारत के अनुभवों ने अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर विकासशील देशों के अधिकारों के लिये इसकी वकालत को आकार दिया तथा इसे उनकी चिंताओं को उठाने वाले एक अग्रणी देश के रूप में स्थापित किया।
निष्कर्ष
वैश्विक दक्षिण में भारत के नेतृत्व की विशेषता ऐतिहासिक सहानुभूति और समकालीन पहलों का मिश्रण है जिसका उद्देश्य विकासशील देशों के बीच एकजुटता को बढ़ावा देना है। अपने समृद्ध सांस्कृतिक लोकाचार का लाभ उठाकर और एक समावेशी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की वकालत करके, भारत वैश्विक मंचों पर वैश्विक दक्षिण की सामूहिक आवाज को बढ़ा सकता है। अपने ऐतिहासिक अनुभवों में निहित, भारत की पहल वसुधैव कुटुम्बकम- ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ के दर्शन के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य वैश्विक दक्षिण की आम चुनौतियों का समाधान करना और अधिक न्यायसंगत वैश्विक व्यवस्था को बढ़ावा देना है।