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UP PCS Mains-2025

  • 10 Mar 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 3 अर्थव्यवस्था

    प्रश्न. तिलहन, दालों और बागवानी की ओर फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिये कई महत्त्वपूर्ण मुद्दों का समाधान करना आवश्यक है। चर्चा कीजिये। (उत्तर 200 शब्दों में दीजिये)

    उत्तर

    हल करने का दृष्टिकोणः

    • फसल विविधीकरण को परिभाषित कीजिये और उदाहरण के माध्यम से समझाइये।
    • फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के लाभों के साथ-साथ चुनौतियों को भी बताइये। इसके संवर्धन हेतु सरकारी पहलों का उल्लेख कीजिये।
    • उचित निष्कर्ष प्रस्तुत कीजिये।

    उत्तरः

     परिचय

    फसल विविधीकरण से आशय किसी खेत में विभिन्न प्रकार की फसलों या फसल प्रणालियों को अपनाने की कृषि पद्धति से है। यह मूल्य संवर्धित फसलों से मिलने वाले विविध लाभों और विपणन के पूरक अवसरों को ध्यान में रखता है। उदाहरण के लिये उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र में प्रचलित पारंपरिक कृषि प्रणाली “बारहनाजा” में वर्ष भर 12 प्रकार की फसलें उगाई जाती हैं, जिससे पोषण और आर्थिक सुरक्षा दोनों को बढ़ावा मिलता है।

    मुख्य भाग

    फसल विविधीकरण के लाभः

    उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि: विविधीकरण विभिन्न फसलों के माध्यम से जोखिम को बाँटकर कुल कृषि उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ा सकता है।

    जैव विविधता और पारिस्थितिकी सेवाएँ: यह जैव विविधता को बढ़ावा देकर मृदा स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में सहायता करता है।

    आर्थिक स्थिरता: किसान एक ही फसल पर निर्भर रहने के बजाय आय के विविध स्रोत प्राप्त कर सकते हैं।

    पोषण सुरक्षा में वृद्धि: विभिन्न प्रकार की फसलों का उत्पादन समुदायों के बेहतर पोषण में योगदान देता है।

    फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने में चुनौतियाँः

    बाजार और मूल्य अस्थिरता: भारत दालों का प्रमुख उत्पादक होने के बावजूद मूल्य अस्थिरता और सीमित खरीद व्यवस्था के कारण दालों का आयात करता है।

    भंडारण और अवसंरचना की कमी: खराब फसलोपरांत प्रबंधन के कारण भारत में प्रतिवर्ष लगभग 90,000 से 1,00,000 करोड़ रुपये का नुकसान होता है, जिसमें 35–50% नुकसान अपर्याप्त कोल्ड स्टोरेज के कारण होता है।

    अनुसंधान और विकास की कमी: तिलहन और दालों की उच्च उत्पादक और कीट प्रतिरोधी किस्मों के विकास में अपेक्षाकृत कम शोध हुआ है।

    ऋण और बीमा तक सीमित पहुँच: छोटे किसान बागवानी परियोजनाओं के लिये ऋण प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करते हैं।

    कृषि विस्तार सेवाओं की कमी: कई क्षेत्रों में किसान अभी भी गेहूँ और चावल जैसी पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहते हैं क्योंकि उन्हें विविधीकरण के लाभों की जानकारी नहीं है।

    सिंचाई और जल संसाधन: विभिन्न फसलों की जल आवश्यकताएँ अलग-अलग होती हैं और अपर्याप्त सिंचाई व्यवस्था विविधीकरण में बाधा बनती है।

    नीतिगत समर्थन: चावल और गेहूँ के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) किसानों को इन फसलों की ओर अधिक आकर्षित करता है।

    सरकारी पहलेंः

    राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM): दालों और तिलहनों के उत्पादन को बढ़ाने के लिये विस्तार और उत्पादकता वृद्धि पर बल देता है।

    मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (MIDH): बागवानी क्षेत्र के समग्र विकास को बढ़ावा देता है।

    मेरा पानी मेरी विरासत (हरियाणा): जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में धान की जगह कम पानी वाली फसलों को प्रोत्साहन देने हेतु प्रोत्साहन प्रदान करता है।

    निष्कर्ष

    सरकारी पहलों, निजी क्षेत्र की भागीदारी और सामुदायिक प्रयासों के समन्वय से भारत फसल विविधीकरण के लाभों को पूर्ण रूप से प्राप्त कर सकता है।

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