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सामाजिक न्याय

द बिग पिक्चर: हाथ से मैला ढोने (मैनुअल स्केवेंजिंग) की समस्या का समाधान

  • 12 Jul 2018
  • 12 min read

परिचर्चा के प्रमुख बिंदु

  • मैनुअल स्केवेंजिंग और इस समस्या की गंभीरता
  • शहरी क्षेत्र में संलग्न हाथ से मैला ढोने वालों के साथ दुर्घटनाएँ 
  • पर्याप्त कानूनी प्रावधानों के बावजूद योजना के बेहतर क्रियान्वयन का अभाव
  • जागरूकता तथा भागीदारी का अभाव
  • इस क्षेत्र में तकनीकी नवाचार का अभाव
  • समस्या का संभावित समाधान 

संदर्भ एवं पृष्ठभूमि

एक तरफ अंतरिक्ष क्षेत्र में  उन्नत विज्ञान और तकनीकी की बदौलत हम चाँद और मंगल पर पहुँचने की बात करते हैं तो वहीं दूसरी तरफ, सफाई व्यवस्था से संबंधित तकनीकी शून्यता के कारण आज भी हमारे देश में सदियों पुरानी हाथ से मैला ढोने की कुप्रथा बदस्तूर जारी है। स्वच्छ भारत अभियान के साथ भारत में शौचालयों के निर्माण में तीव्र गति से विकास हुआ, किंतु सेप्टिक टैंकों या सीवर की सफाई के लिये कोई कारगर तकनीक अभी तक विकसित नहीं की जा सकी है।

  • हाल ही में राजधानी दिल्ली से लगे शहरी इलाके गाज़ियाबाद में एक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में सफाई करने के दौरान 3 मज़दूरों की ज़हरीली गैसों की वज़ह से मौत हो गई। पिछले वर्ष भी दिल्ली में कुछ सफाई कर्मियों की मौत सफाई कार्य के दौरान हुई थी।
  • सफाई के लिये सेप्टिक टैंकों और नालियों में मानव प्रवेश को समाप्त करने के उद्देश्य से आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा व्यक्तियों और गैर-सरकारी संगठनों को उपयुक्त समाधान सुझाने के लिये 'प्रौद्योगिकी चुनौती' की शुरुआत की गई है।
  • मंत्रालय के अधिकारियों को इन समस्याओं पर विस्तृत रूपरेखा स्पष्ट करने का निर्देश दिया गया है। मंत्रालय के अनुसार, इस समस्या से संबंधित तकनीकी और व्यावसायिक नवाचारों की पहचान करना उसके मुख्य उद्देश्यों में से एक है।

क्या है हाथ से मैला ढोना (मैनुअल स्केवेंजिंग)?

किसी व्यक्ति द्वारा शुष्क शौचालयों या सीवर से मानवीय अपशिष्ट (मल-मूत्र) को हाथ से साफ करने, सिर पर रखकर ले जाने, उसका निस्तारण करने या किसी भी प्रकार से शारीरिक सहायता से उसे संभालने को हाथ से मैला ढोना या मैनुअल स्केवेंजिंग कहते हैं। इस प्रक्रिया में अक्सर बाल्टी, झाड़ू और टोकरी जैसे सबसे बुनियादी उपकरणों का उपयोग किया जाता है। इस कुप्रथा का संबंध भारत की जाति व्यवस्था से भी है जहाँ तथाकथित निचली जातियों द्वारा इस काम को करने की उम्मीद की जाती थी।

हाथ से मैला ढोने के संबंध में कानूनी प्रावधान

  • “मैनुअल स्केवेंजर्स का रोज़गार और शुष्क शौचालय का निर्माण (निषेध) अधिनियम, 1993” के तहत भारत में हाथ से मैला ढोने की प्रथा को प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसमें एक साल तक का कारावास और जुर्माने का प्रावधान किया गया है।
  • वर्ष 2013 में “मैनुअल स्केवेंजर्स के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013" के रूप में एक नया ऐतिहासिक कानून पारित किया गया जो सभी रूपों में हाथ से मैला ढोने पर प्रतिबंध को मज़बूत करने की कोशिश करता है और अनिवार्य सर्वेक्षण के माध्यम से हाथ से मैला ढोने वाले लोगों की पहचान करके इनके पुनर्वास की पुष्टि करता है।
  • मैनुअल स्केवेंजर्स (हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों) के पुनर्वास की योजना (एसआरएमएस) के तहत हाथ से मैला ढोने वाले लोगों को 40,000/- रुपए की एकबारगी नकद सहायता, रियायती ब्याज दर पर 15.00 लाख रुपए तक की स्व-रोज़गार परियोजनाओं को शुरू करने के लिये ऋण; 3,25,000/- रुपए तक क्रेडिट लिंक्ड बैक-एंड कैपिटल सब्सिडी तथा प्रतिमाह 3000/- रुपए के वजीफे सहित दो वर्ष तक कौशल विकास प्रशिक्षण प्रदान करने का प्रावधान किया गया है।

(टीम दृष्टि इनपुट)

समस्या की गंभीरता

  • भारत में लगभग 8000 शहरी क्षेत्र और 6 लाख से अधिक गाँव हैं तथा एक बहुत बड़ी आबादी इनमें निवास करती है। ग्रामीण स्तर पर सीवर प्रणाली का इतना विकास नहीं हुआ है, अतः मैनुअल स्केवेंजिंग की समस्या मुख्यतः शहरी या अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में ही व्याप्त है। इससे संबंधित दुर्घटनाएँ अधिकतर शहरी क्षेत्रों में ही होती हैं जहाँ सीवर में फँसकर या गैस रिसाव आदि के कारण लोगों की जान चली जाती है।
  • बड़े शहरों में 30-40% आबादी झुग्गी/बस्ती इत्यादि में रहती है जहाँ मूलभूत सुविधाओं के अभाव में मानवीय अपशिष्ट या अव्यवस्थित कचरे का निस्तारण सीधे सीवर प्रणाली में कर दिया जाता है जो कि सीवर प्रणाली में व्यवधान उत्पन्न करता है जिसके लिये मानवीय हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ती है।
  • कुछ शहरों में रेस्तराँ और होटलों के बचे हुए कचरे, अप्रयुक्त निर्माण सामग्री और कार्यालयी कचरे का निपटान भी सीधे सीवर के नालों में कर दिया जाता है और अवरोध उत्पन्न होने की स्थिति में मजबूरन इस समस्या का समाधान मानवीय सहायता से किया जाता है।
  • भारत के शहरी और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में 7000 किलोमीटर से भी अधिक लंबी सीवर लाइन तथा 26 लाख से भी अधिक शुष्क शौचालय हैं जिनकी सफाई के लिये हाथ से मैला ढोने वाले लोगों की आवश्यकता होती है।
  • सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना 2011 के अनुसार, भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में 1,82,505 तथा शहरी क्षेत्रों में 12,226 हाथ से मैला ढोने वाले मौजूद हैं। लेकिन इनकी वास्तविक संख्या वर्तमान में इससे कहीं ज़्यादा हो सकती है।

मैनुअल स्केवेंजिंग के दौरान दुर्घटनाओं को रोकने हेतु संभावित समाधान

  • सीवर प्रणाली या सेप्टिक टैंकों की सफाई हेतु नई और स्थानिक तकनीकी के विकास पर जोर दिया जाना चाहिये ताकि मानवीय संलग्नता को इस क्षेत्र से कम किया जा सके।
  • जैव तकनीकी के विकास के साथ कुछ ऐसे पौधे या बैक्टीरिया का विकास किया जाना चाहिये जो सीवर प्रणाली या सेप्टिक टैंकों के अपशिष्ट का निपटान उचित ढंग से कर सकें और यह पर्यावरण के अनूकूल हो।
  • स्वच्छ भारत अभियान में परंपरागत शौचालयों के स्थान पर जैव शौचालयों के निर्माण को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिये जिससे सेप्टिक टैंकों के अपशिष्ट के निस्तारण में पुनः मानवीय सहयोग की आवश्यकता न पड़े।
  • तकनीकी विकास की सहायता से रोबोटिक्स के ज़रिये सीवेज कर्मियों का प्रतिस्थापन किया जाना चाहिये तथा उन्हें बेरोज़गारी से बचाने हेतु इस नई तकनीक के उपयोग में उन्हें दक्ष बनाया जाना चाहिये। 
  • केरल में इस दिशा में सराहनीय प्रयास शुरू किया गया है जहाँ केरल जल प्राधिकरण तथा स्टार्टअप कंपनी जेनरोबोटिक्स द्वारा विकसित रोबोट का हाल में प्रायोगिक तौर पर इस्तेमाल किया गया जो सीवर की सफाई में इंसानों की जगह इस्तेमाल किया जाएगा।
  • जल बोर्ड एवं विद्युत बोर्ड के समान सीवेज प्रबंधन हेतु एक अलग नियामक संस्था यथा- सीवेज बोर्ड आदि का गठन किया जाना चाहिये ताकि सीवर प्रणाली का विकास और उसका रख-रखाव अलग-अलग संस्थाओं द्वारा किया जा सके।

आगे की राह

  • मैनुअल स्केवेंजिंग के कारण हो रही दुर्घटनाओं को रोकने के लिये त्वरित कदम उठाते हुए सफाई कर्मियों की सुरक्षा संबंधी चिंताओं पर विशेष ध्यान देना होगा। उन्हें सेफ्टी किट मुहैया कराकर उसके प्रयोग के लिये प्रोत्साहित करना होगा।
  • नगर निगम/नगर पालिका के कार्य क्षेत्र और अधिकारों को विस्तृत किया जाना चाहिये तथा उनके कार्य क्षेत्र में राजनीतिक हस्तक्षेप को सीमित किया जाना चाहिये। राज्य तथा केंद्र सरकार को इसमें सहायक की भूमिका अदा करनी चाहिये।
  • सरकार को इस दिशा में आवश्यक शोध कार्य किये जाने हेतु बेहतर प्रयत्न करने होंगे तथा देश की प्रमुख संस्थाओं को भी इस क्षेत्र में आवश्यक भागीदारी हेतु आगे आना चाहिये।
  • जागरूकता और सामाजिक भागीदारी को बढ़ावा दिया जाना चाहिये ताकि इस कार्य से जुड़े लोग खुद को उपेक्षित महसूस न करें।
  • रोबोटिक्स के संभावित उपयोग से मानवीय रोज़गार पर विपरीत प्रभाव न पड़े इसके लिये सरकार को समुचित प्रबंध करना होगा।

निष्कर्ष: भारत में मैनुअल स्केवेंजिंग की समस्या की गंभीरता बहुत अधिक है किंतु इस दिशा में किये जाने वाले प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। कानूनी प्रावधानों के तहत मानव द्वारा हाथ से मैला ढोना दंडनीय अपराध है फिर भी अभी तक यह कार्य लगातार जारी है जो कि हमारे कानून की लचर प्रक्रिया को प्रदर्शित करता है। कानूनों के बेहतर क्रियान्वयन, बेहतर योजना निर्माण तथा तकनीकी सहयोग के माध्यम से इस समस्या का समाधान किया जा सकता है। इस क्षेत्र से जुड़े लोगों को जातिगत भेदभाव का भी सामना करना पड़ता है जिससे निपटने के लिये शिक्षा और जागरूकता का प्रसार व्यापक ढंग से करना होगा। इसके अतिरिक्त इस समस्या के समाधान हेतु सरकार के साथ-साथ जनता को भी प्रत्यक्ष भागीदारी निभाते हुए सम्मिलित प्रयास करना होगा।

इस बारे में और अधिक जानकारी के लिये इस लिंक पर क्लिक करें:

आवश्यक है हाथ से मैला ढोने (मैनुअल स्कैवेंजिंग) की प्रथा का उन्मूलन

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