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भारतीय अर्थव्यवस्था

पर्सपेक्टिव: गिग इकॉनमी

  • 29 Jul 2022
  • 17 min read

चर्चा में क्यों?

वैश्विक स्तर पर रोज़गार के रुझान में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव का कारण गिग इकॉनमी का उदय है। बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के गिग वर्कफोर्स में सॉफ्टवेयर, साझा सेवाओं और पेशेवर सेवाओं जैसे उद्योगों में कार्यरत 1.5 मिलियन कर्मचारी शामिल हैं।

  • साझा सेवाएँ: यह व्यवसाय संचालन का समेकन है जो एक ही संगठन के कई हिस्सों द्वारा उपयोग किया जाता है।
  • व्यावसायिक सेवाएँ: यह एक अमूर्त उत्पाद है जिसे एक ठेकेदार या उत्पाद विक्रेता ग्राहक को अपने व्यवसाय के एक विशिष्ट हिस्से का प्रबंधन करने में मदद करने के लिये बेचता है।

विभिन्न 'कॉलर' नौकरियाँ क्या हैं?

  • ब्लू-कॉलर कार्यकर्त्ता: ये ऐसे मज़दूर हैं जो शारीरिक श्रम करते हैं और घंटे के हिसाब से मज़दूरी प्राप्त करते हैं।
  • व्हाइट-कॉलर कार्यकर्त्ता: ये वेतनभोगी पेशेवर हैं, जो आमतौर पर सामान्य कार्यालय के कर्मचारियों और प्रबंधन को देखते हैं।
  • गोल्ड-कॉलर कार्यकर्त्ता: इसका उपयोग अत्यधिक कुशल ज्ञान वाले लोगों को संदर्भित करने के लिये किया जाता है जो कंपनी हेतु अत्यधिक मूल्यवान हैं।  उदाहरण: वकील, डॉक्टर, शोध वैज्ञानिक आदि।
  • ग्रे-कॉलर कार्यकर्त्ता: यह सफेद या नीले-कॉलर के रूप में वर्गीकृत न किये गए नियोजित लोगों के संतुलन को संदर्भित करता है।
  • हालाँकि ग्रे-कॉलर उन लोगों का वर्णन करने के लिये प्रयोग किया जाता है जो सेवानिवृत्ति की आयु से परे काम करते हैं। उदाहरण: अग्निशामक, पुलिस अधिकारी, स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर, सुरक्षा गार्ड आदि।
  • ग्रीन-कॉलर कार्यकर्त्ता: ये ऐसे कार्यकर्त्ता हैं जो अर्थव्यवस्था के पर्यावरणीय क्षेत्रों में कार्यरत हैं।
    • उदाहरण: वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों जैसे- सौर पैनल, ग्रीनपीस, वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर आदि में काम करने वाले लोग।
  • पिंक-कॉलर कार्यकर्त्ता: ये ऐसी नौकरी में संलग्न लोग है जिसे पारंपरिक रूप से महिलाओं का काम माना जाता है और अक्सर कम वेतन दिया जाता है।
  • स्कारलेट-कॉलर कार्यकर्त्ता: यह एक ऐसा शब्द है जिसका इस्तेमाल अक्सर पोर्नोग्राफी उद्योग में काम करने वाले लोगों, विशेष रूप से इंटरनेट पोर्नोग्राफी के क्षेत्र में महिला उद्यमियों के लिये किया जाता है।
  • रेड-कॉलर कार्यकर्त्ता: सभी प्रकार के सरकारी कर्मचारी।
  • ओपन-कॉलर वर्कर: ये ऐसें वर्कर हैं जो घर से कार्य करते हैं, खासकर इंटरनेट के ज़रिये।

गिग इकॉनमी क्या है?

  • गिग इकॉनमी एक मुक्त बाज़ार प्रणाली है जिसमें सामान्य रूप से अस्थायी पद होते हैं और संगठन अल्पकालिक जुड़ाव के लिये स्वतंत्र श्रमिकों या कार्यकर्त्ता के साथ अनुबंध करते हैं।
  • बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के गिग वर्कफोर्स में सॉफ्टवेयर, साझा और पेशेवर सेवाओं जैसे उद्योगों में 1.5 मिलियन कर्मचारी कार्यरत हैं।
  • इंडिया स्टाफिंग फेडरेशन की वर्ष 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका, चीन, ब्राज़ील और जापान के बाद भारत वैश्विक स्तर पर फ्लेक्सी-स्टाफिंग में पाँचवाँ सबसे बड़ा देश है।
  • गिग वर्कर्स को मोटे तौर पर प्लेटफॉर्म और नॉन-प्लेटफॉर्म-आधारित वर्कर्स में वर्गीकृत किया जा सकता है।
  • प्लेटफॉर्म कर्मचारी: ये वे कर्मचारी हैं जिनका काम ऑनलाइन सॉफ्टवेयर ऐप या डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे फूड एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म, Zomato, Swiggy, Ola, और अन्य पर आधारित है।
  • नॉन-प्लेटफॉर्म कर्मचारी: ये श्रमिक आम तौर पर अंशकालिक या पूर्णकालिक रूप से लगे पारंपरिक क्षेत्रों में केजुअल वेतन और ऑन-अकाउंट (Own-Account) के कर्मचारी होते हैं।

गिग सेक्टर के प्रमुख चालक क्या हैं?

  • कहीं से भी कार्य करने का लचीलापन: डिजिटल युग में कार्यकर्त्ता को एक निश्चित स्थान पर बैठने की आवश्यकता नहीं होती है- कार्य कहीं से भी किया जा सकता है, इसलिये नियोक्ता किसी परियोजना के लिये उपलब्ध सर्वोत्तम प्रतिभा का चयन स्थान से बँधे बिना कर सकते हैं।
  • कार्य के प्रति बदलता दृष्टिकोण: लगता है कि मिलेनियल जेनरेशन का करियर के प्रति काफी अलग नज़रिया है। वे ऐसा करियर, जिससे उनको संतुष्टि नहीं प्राप्त हो, बनाने के बजाय ऐसा कार्य करना चाहते हैं जो उनकी पसंद का है।

व्यापार प्रतिदर्श एवं तकनीक

  • गिग कर्मचारी विभिन्न मॉडल पर काम करते हैं जैसे कि निश्चित शुल्क (अनुबंध की शुरुआत के दौरान तय), समय और प्रयास, वितरित किये गए कार्य की वास्तविक इकाई एवं परिणाम की गुणवत्ता। फिक्स्ड-फीस मॉडल सबसे प्रचलित है। हालाँकि समय और प्रयास मॉडल एक-दूसरे के करीब आते हैं।
  • तकनीक में सकारात्मक परिवर्तन ने अनुबंध को बहुत आसान बना दिया है जिससे श्रमिकों के लिये काम ढूँढना संभव हो गया है और कंपनियों के लिये उन लोगों के साथ मिलकर काम करना संभव हो गया है जो कर्मचारी नहीं बल्कि कांट्रेक्टर हैं।

स्टार्ट-अप कल्चर का उदय:

  • भारत में स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र तेज़ी से विकसित हो रहा है।
  • स्टार्ट-अप के लिये पूर्णकालिक कर्मचारियों को काम पर रखने से उच्च निश्चित लागत की आवश्यकता होती है और इसलिये गैर-मुख्य गतिविधियों के लिये संविदात्मक फ्रीलांसर काम पर रखे जाते हैं।
  • स्टार्ट-अप अपने तकनीकी प्लेटफाॅर्मों को मज़बूती प्रदान करने के लिये इंजीनियरिंग, उत्पाद, डेटा विज्ञान और एमएल जैसे क्षेत्रों में कुशल प्रौद्योगिकी फ्रीलांसर (प्रति परियोजना के आधार पर) को काम पर रखने पर भी विचार कर रहे हैं।

संविदा कर्मचारियों की बढ़ती मांग:

  • बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ महामारी के बाद परिचालन खर्च को कम करने के लिये विशेष रूप से विशिष्ट परियोजनाओं हेतु फ्लेक्सी-हायरिंग विकल्प अपना रही हैं।
  • यह प्रवृत्ति भारत में गिग संस्कृति के प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।

भारत में गिग इकॉनमी की स्थिति

  • भारत में अनुमानित 56% नए रोज़गार गिग इकॉनमी कंपनियों द्वारा ब्लू-कॉलर और व्हाइट-कॉलर कार्यबल दोनों में उत्पन्न किये जा रहे हैं।
    • जबकि भारत में ब्लू-कॉलर नौकरियों के लिये गिग इकॉनमी प्रचलित है, व्हाइट-कॉलर नौकरियों जैसे- परियोजना-विशिष्ट सलाहकार, विक्रेता, वेब डिज़ाइनर, सामग्री लेखक और सॉफ्टवेयर डेवलपर्स में गिग श्रमिकों की मांग भी उभर रही है।
  • गिग इकॉनमी भारत में गैर-कृषि क्षेत्रों में 90 मिलियन नौकरियाँ दे सकती है, जिसमें "दीर्घावधि" में सकल घरेलू उत्पाद में 1.25% जोड़ने की क्षमता है।
  • जैसा कि भारत वर्ष 2025 तक 5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के अपने घोषित लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, आय और बेरोज़गारी की खाई को पाटने में गिग इकॉनमी एक प्रमुख भूमिका होगी।
  • हाल ही में नीति आयोग ने 'इंडियाज बूमिंग गिग एंड प्लेटफॉर्म इकॉनमी' शीर्षक से एक रिपोर्ट भी लॉन्च की।
  • रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2029-30 तक भारत के गिग वर्कफोर्स के 2.35 करोड़ तक बढ़ने की उम्मीद है।
  • रिपोर्ट का अनुमान है कि वर्ष 2020-21 में 77 लाख (7.7 मिलियन) कर्मचारी गिग इकॉनमी में शामिल थे। उन्होंने भारत में गैर-कृषि कार्यबल का 2.6% या कुल कार्यबल का 1.5% का योगदान दिया।

गिग इकॉनमी के संबंध में चुनौतियाँ और समाधान क्या हैं?

  • चुनौतियाँ:
    • नौकरी की सुरक्षा का अभाव, अनियमित वेतन और अनिश्चित रोज़गार की स्थिति
    • अनिश्चितता के कारण बढ़ता तनाव उपलब्ध कार्य और आय में नियमितता से जुड़ा है।
    • इंटरनेट और डिजिटल तकनीक तक सीमित पहुँच
    • प्लेटफॉर्म के मालिक और गिग वर्कर के बीच संविदात्मक संबंध बाद के कई कार्यस्थल पर उलब्ध अधिकारों तक पहुँच से इनकार करते हैं।
    • एल्गोरिथम प्रबंधन प्रथाओं और रेटिंग के आधार पर प्रदर्शन मूल्यांकन के दबाव के कारण तनाव।
  • संभावित समाधान:
    • प्लेटफॉर्म वर्कर्स और अपने स्वयं के प्लेटफॉर्म स्थापित करने में रुचि रखने वालों के लिये संस्थागत ऋण तक सुगम पहुँच।
    • युवाओं को रोज़गार योग्य बनाने के लिये उनका कौशल विकास।
    • सरकार सामाजिक सुरक्षा संहिता के माध्यम से प्लेटफॉर्म कार्यकर्त्ताओं का सार्वभौमिक कवरेज सुनिश्चित कर सकती है।
    • प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था में पहली बार उधारकर्त्ताओं को दिये गए असुरक्षित ऋणों को प्राथमिकता-प्राप्त क्षेत्र को उधार के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है
    • प्लेटफॉर्मों से जुड़े छोटे व्यवसायों और उद्यमियों का समर्थन करना।

गिग इकॉनमी के लिये लेबर कोड क्या है?

  • मौजूदा विधान:
    • मज़दूरी संहिता, 2019 गिग श्रमिकों सहित संगठित और असंगठित क्षेत्रों में सार्वभौमिक न्यूनतम मज़दूरी व न्यूनतम मज़दूरी का प्रावधान करती है।
  • सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 गिग श्रमिकों को एक नई व्यावसायिक श्रेणी के रूप में मान्यता देती है।
  • यह गिग वर्कर को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित करती है जो पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंधों के बाहर काम करता है या कार्य व्यवस्था में भाग लेता है और ऐसी गतिविधियों से आय अर्जित करता है।

सुरक्षा संहिता में संबद्ध मुद्दे:

  • लाभ की कोई गारंटी नहीं: सामाजिक सुरक्षा विधेयक, 2020 संहिता में प्लेटफॉर्म कार्यकर्त्ता अब मातृत्व लाभ, जीवन और विकलांगता कवर, वृद्धावस्था सुरक्षा, भविष्य निधि आदि जैसे लाभों के लिये पात्र हैं।
    • हालाँकि पात्रता का मतलब यह नहीं है कि लाभ की गारंटी है।
    • कोई भी प्रावधान सुरक्षित लाभ नहीं देता है, जिसका अर्थ है कि केंद्र सरकार समय-समय पर कल्याणकारी योजनाएँ बना सकती है जो व्यक्तिगत और कार्य सुरक्षा के इन पहलुओं को कवर करती हैं, लेकिन उनकी गारंटी नहीं है।
  • कोई निश्चित ज़िम्मेदारी नहीं: कोड केंद्र सरकार, प्लेटफॉर्म एग्रीगेटर्स और श्रमिकों की संयुक्त ज़िम्मेदारी के रूप में बुनियादी कल्याण उपायों के प्रावधान को बताता है।
  • हालाँकि इसमें यह नहीं बताया गया है कि वेलफेयर के लिये कौन सा हितधारक ज़िम्मेदार है।

आगे की राह

  • पेड लीव्स, हेल्थ एक्सेस और बीमा: प्लेटफॉर्म व्यवसायों द्वारा उन सभी कर्मचारियों के लिए, जो वर्ष भर उनके प्लेटफॉर्म से कार्य में संलग्न रहते हैं, कोविड -19 महामारी द्वारा उत्पन्न चुनौतियों को कम करने हेतु शुरू किये गए उपायों की तर्ज पर, बीमारी के लिये अवकाश, स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच और बीमा के उपायों को उनके कार्यस्थल के एक हिस्से के रूप में प्लेटफॉर्मों द्वारा अपनाया जा सकता है।
    • इन फर्मों द्वारा जुड़े प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा कवर की पेशकश से सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
  • व्यावसायिक रोग और कार्य दुर्घटना बीमा: प्लेटफॉर्म भारत भर में सभी डिलीवरी और ड्राइवर भागीदारों, और अन्य प्लेटफॉर्म कर्मचारियों को दुर्घटना बीमा प्रदान करने के लिये मॉडल अपना सकते हैं।
    • इन्हें निजी क्षेत्र या सरकार के सहयोग से पेश किया जा सकता है, जैसा कि सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के तहत परिकल्पित है।
  • सेवानिवृत्ति/पेंशन योजनाएँ और अन्य लाभ: ऐसी नीतियों को अपनाने की आवश्यकता है जो वृद्धावस्था/सेवानिवृत्ति योजनाओं और लाभों की पेशकश करती हैं और आकस्मिक घटनाओं के लिये अन्य बीमा कवर प्रदान करती हैं जैसे कार्य करने के दौरान उत्पन्न चोट जिससे रोज़गार और आय का नुकसान हो सकता है।
  • काम की अनियमितता की स्थिति में कामगारों को सहायता: गिग और प्लेटफॉर्म फर्म कामगारों को आय सहायता प्रदान करने पर विचार कर सकते हैं।
    • काम में अनिश्चितता या अनियमितता के कारण होने वाली आय की हानि से सुनिश्चित न्यूनतम आय और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में यह एक महत्त्वपूर्ण कदम होगा।
  • कॉरपस फंड से आकस्मिकता कवर: ऑटो-रिक्शा, कैब और टैक्सी ड्राइवरों को उनकी आय पर लॉकडाउन के प्रभावों को कम करने के लिये एक मोबिलिटी प्लेटफॉर्म ने 20 करोड़ रुपए का एक कोष बनाया, जिसे "ड्राइव द ड्राइवर" कहा जाता है।
    • कॉरपस फंड से सामाजिक सुरक्षा कवर देने जैसे उपायों से आकस्मिकता के मामले में गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स तथा सेक्टर से जुड़े अन्य स्व-नियोजित व्यक्तियों को सहायता मिल सकती है।

निष्कर्ष

  • "गिग इकॉनमी" फ्रेशर्स, अर्द्ध-कुशल और अकुशल कार्यबल के लिये रोज़गार पैदा करने का एकमात्र तरीका है। इसलिए, इस क्षेत्र को विनियमित करने और इसे आगे बढ़ने में मदद करना महत्त्वपूर्ण है। हमें ऐसी नीतियों और प्रक्रियाओं की आवश्यकता है जो इस क्षेत्र के कार्य करने के तरीके को स्पष्ट करें।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

 Q. भारत में महिला सशक्तीकरण की प्रक्रिया में 'गिग इकॉनमी' की भूमिका का परीक्षण कीजिये।

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