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भारतीय अर्थव्यवस्था

गिग इकॉनमी

  • 14 Apr 2022
  • 20 min read

चर्चा में क्यों?

हाल ही में जोमेटो ने केवल 10 मिनट में भोजन पहुँचाने के लिये एक पायलट प्रोजेक्ट की घोषणा की जो गुरुग्राम में शुरू होगा। इसके बाद लोगों ने इस कदम की आलोचना करते हुए कहा कि यह उनके डिलीवरी पार्टनर के जीवन को खतरे में डाल देगा क्योंकि वे लक्ष्य को पूरा करने के लिये जल्दबाजी में रहेंगे।

गिग इकॉनमी क्या है?

  • गिग इकॉनमी एक मुक्त बाज़ार प्रणाली है जिसमें सामान्य रूप से अस्थायी पद होते हैं और संगठन अल्पकालिक जुड़ाव के लिये स्वतंत्र श्रमिकों या कार्यकर्ता के साथ अनुबंध करते हैं।
  • बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के गिग वर्कफोर्स में सॉफ्टवेयर, साझा और पेशेवर सेवाओं जैसे उद्योगों में 1.5 मिलियन कर्मचारी कार्यरत हैं।
  • इंडिया स्टाफिंग फेडरेशन की वर्ष 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका, चीन, ब्राज़ील और जापान के बाद भारत वैश्विक स्तर पर फ्लेक्सी-स्टाफिंग में पाँचवाँ सबसे बड़ा देश है।

भारत के गिग सेक्टर की क्षमता क्या है?

  • भारत में अनुमानित 56% नए रोज़गार गिग इकॉनमी कंपनियों द्वारा ब्लू-कॉलर और व्हाइट-कॉलर कार्यबल दोनों में उत्पन्न किये जा रहे हैं।
  • जबकि भारत में ब्लू-कॉलर नौकरियों के लिये गिग इकॉनमी प्रचलित है, व्हाइट-कॉलर नौकरियों जैसे- परियोजना-विशिष्ट सलाहकार, विक्रेता, वेब डिजाइनर, सामग्री लेखक और सॉफ्टवेयर डेवलपर्स में गिग श्रमिकों की मांग भी उभर रही है।
  • गिग इकॉनमी भारत में गैर-कृषि क्षेत्रों में 90 मिलियन नौकरियाँ दे सकती है, जिसमें "दीर्घावधि" में सकल घरेलू उत्पाद में 1.25% जोड़ने की क्षमता है।
  • जैसा कि भारत वर्ष 2025 तक 5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के अपने घोषित लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, आय और बेरोज़गारी की खाई को पाटने में गिग इकॉनमी एक प्रमुख भूमिका होगी।

विभिन्न 'कॉलर' नौकरियाँ क्या हैं?

  • ब्लू-कॉलर कार्यकर्ता: ये ऐसे मज़दूर हैं जो शारीरिक श्रम करते हैं और घंटे के हिसाब से मज़दूरी प्राप्त करते हैं।
  •  व्हाइट-कॉलर कार्यकर्ता: ये वेतनभोगी पेशेवर हैं, जो आमतौर पर सामान्य कार्यालय के कर्मचारियों और प्रबंधन का जिक्र करता है।
  •  गोल्ड-कॉलर कार्यकर्ता: इसका उपयोग अत्यधिक कुशल ज्ञान वाले लोगों को संदर्भित करने के लिये किया जाता है जो कंपनी हेतु अत्यधिक मूल्यवान हैं।  उदाहरण: वकील, डॉक्टर, शोध वैज्ञानिक आदि।
  •  ग्रे-कॉलर कार्यकर्ता: यह सफेद या नीले-कॉलर के रूप में वर्गीकृत न किये गए नियोजित लोगों के संतुलन को संदर्भित करता है।
  • हालाँकि ग्रे-कॉलर उन लोगों का वर्णन करने के लिये प्रयोग किया जाता है जो सेवानिवृत्ति की आयु से परे काम करते हैं। उदाहरण: अग्निशामक, पुलिस अधिकारी, स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर, सुरक्षा गार्ड आदि।
  • ग्रीन-कॉलर कार्यकर्ता: ये ऐसे कार्यकर्ता हैं जो अर्थव्यवस्था के पर्यावरणीय क्षेत्रों में कार्यरत हैं।
    •  उदाहरण: वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों जैसे- सौर पैनल, ग्रीनपीस, वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर आदि में काम करने वाले लोग।
  • पिंक-कॉलर वर्कर: ये ऐसी नौकरी में संलग्न लोग है जिसे पारंपरिक रूप से महिलाओं का काम माना जाता है और अक्सर कम वेतन दिया जाता है।
  • स्कारलेट-कॉलर वर्कर: यह एक ऐसा शब्द है जिसका इस्तेमाल अक्सर पोर्नोग्राफी उद्योग में काम करने वाले लोगों, विशेष रूप से इंटरनेट पोर्नोग्राफ़ी के क्षेत्र में महिला उद्यमियों के लिये किया जाता है।
  • रेड-कॉलर कार्यकर्ता: सभी प्रकार के सरकारी कर्मचारी।
  • ओपन-कॉलर वर्कर: ये ऐसें वर्कर हैं जो घर से कार्य करते हैं, खासकर इंटरनेट के ज़रिये।

गिग सेक्टर के प्रमुख चालक क्या हैं?

  •  कहीं से भी कार्य करने का लचीलापन:
    •  डिजिटल युग में कार्यकर्ता को एक निश्चित स्थान पर बैठने की आवश्यकता नहीं होती है- कार्य कहीं से भी किया जा सकता है, इसलिये नियोक्ता किसी परियोजना के लिये उपलब्ध सर्वोत्तम प्रतिभा का चयन स्थान से बँधे बिना कर सकते हैं।
  • कार्य के प्रति बदलता दृष्टिकोण:
    • लगता है कि मिलेनियल जेनरेशन का कैरियर के प्रति काफी अलग नज़रिया है। वे ऐसा कैरियर, जिससे उनको संतुष्टि नहीं प्राप्त हो, बनाने के बजाय ऐसा कार्य करना चाहते हैं जो उनकी पसंद का है।

व्यापार प्रतिदर्श:

  • गिग कर्मचारी विभिन्न मॉडल पर काम करते हैं जैसे कि निश्चित शुल्क (अनुबंध की शुरुआत के दौरान तय), समय और प्रयास, वितरित किये गए कार्य की वास्तविक इकाई एवं परिणाम की गुणवत्ता। फिक्स्ड-फीस मॉडल सबसे प्रचलित है। हालांकि समय और प्रयास मॉडल एक-दूसरे के करीब आते हैं।

स्टार्ट-अप कल्चर का उदय:

  • भारत में स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र तेज़ी से विकसित हो रहा है।
  • स्टार्ट-अप के लिये पूर्णकालिक कर्मचारियों को काम पर रखने से उच्च निश्चित लागत की आवश्यकता होती है और इसलिये गैर-मुख्य गतिविधियों के लिये संविदात्मक फ्रीलांसर काम पर रखे जाते हैं।
  • स्टार्ट-अप अपने तकनीकी प्लेटफाॅर्मों को मज़बूती प्रदान करने के लिये इंजीनियरिंग, उत्पाद, डेटा विज्ञान और एमएल जैसे क्षेत्रों में कुशल प्रौद्योगिकी फ्रीलांसर (प्रति परियोजना के आधार पर) को काम पर रखने पर भी विचार कर रहे हैं।

संविदा कर्मचारियों की बढ़ती मांग:

  • बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ महामारी के बाद परिचालन खर्च को कम करने के लिये विशेष रूप से विशिष्ट परियोजनाओं हेतु फ्लेक्सी-हायरिंग विकल्प अपना रही हैं।
  • यह प्रवृत्ति भारत में गिग संस्कृति के प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।

गिग सेक्टर से संबद्ध चुनौतियाँ क्या हैं?

  • अनियमित प्रकृति: गिग इकॉनमी में बड़े पैमाने पर अनियमितता है। इसलिये नौकरी में सुरक्षा और लाभ कम होता है।
    • हालाँकि कुछ लोगों का तर्क है कि श्रमिकों को कोई सामाजिक सुरक्षा, बीमा आदि नहीं मिलना, भारत में गिग इकॉनमी के रूप में अनौपचारिक श्रम का विस्तार है, जो लंबे समय से प्रचलित है और अनियंत्रित है।
  • कौशल की आवश्यकता: एक कार्यकर्ता के पास पर्याप्त होना आवश्यक है। जब तक कोई व्यक्ति अत्यंत प्रतिभाशाली नहीं होगा, उसकी सौदेबाज़ी की शक्ति अनिवार्य रूप से सीमित होगी।
    •  जबकि कंपनियाँ नियमित रूप से कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने में निवेश करती हैं, एक गिग इकॉनमी कार्यकर्ता को अपनी लागत पर अपने कौशल का उन्नयन करना होगा।
  • बेमेल मांग-आपूर्ति: नौकरियों की तुलना में पहले से ही कई अधिक संभावित ऑनलाइन स्वतंत्र कर्मचारी हैं और यह मांग-आपूर्ति का संतुलन समय के साथ बिगड़ता जाएगा जिससे मज़दूरी निराशाजनक होगी।

महामारी ने गिग इकॉनमी को कैसे प्रभावित किया?

  • कोविड-19 के कारण व्यवसाय बाधित हो गए और लोग आय के स्रोत की तलाश में थे, इससे गिग वर्कर्स की मांग में महामारी के कारण तेज़ी आई।
  • उदाहरण के लिये अगस्त 2020 में Google ने नौकरी चाहने वालों को ऑन-डिमांड व्यवसायों, खुदरा और आतिथ्य जैसे उद्योगों में अवसरों से जोड़ने के लिये अपने Kormo Jobs एप को लॉन्च करने की घोषणा की।
  • हालाँकि पिछले कुछ वर्षों में गिग श्रमिकों की संख्या बढ़ी है, विशेष रूप से उपभोक्ता इंटरनेट कंपनियों जैसे- ज़ोमैटो, स्विगी, उबर, ओला, अर्बन क्लैप आदि के साथ श्रमिकों ने अपनी आय में गिरावट की शिकायत की है।
  • संविदात्मक श्रम पारिस्थितिकी तंत्र पर इसके दो महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़े हैं:
    • सबसे पहले, इसने ऑन-डिमांड स्टाफिंग की बढ़ती आवश्यकता को पूरा करने के लिये नए व्यवसाय मॉडल बनाए हैं।
    • दूसरे, इसने एक बार फिर उन श्रम संहिताओं पर प्रकाश डाला है जो गिग श्रमिकों की पहचान करती हैं और एक सार्वभौमिक न्यूनतम मज़दूरी प्रदान करती हैं।

महिलाओं के लिये गिग इकॉनमी में कार्य करने के फायदे और नुकसान क्या हैं?

फायदे:

  • घर और काम के बीच संतुलन स्थापित करने में मदद:
    • गिग रोज़गार अंशकालिक काम और लचीले कामकाजी घंटों की अनुमति देता है जो महिलाओं को रोज़गार और अपनी पारंपरिक भूमिकाओं (गृहिणी और देखभाल) के बीच संतुलन स्थापित करने मदद करता है।
  • महिलाओं के लिये सुरक्षित कार्य वातावरण:
    • वर्क फ्रॉम होम (WFH) और प्रौद्योगिकी द्वारा पूरक गिग रोज़गार ने यात्रा एवं रात की पाली के दौरान सुरक्षा के मुद्दे को संबोधित किया है। साथ ही टियर 2 और 3 शहरों में महिलाओं के लिये रोज़गार के नए अवसर सामने आए हैं।
  • मांग पर कार्य प्राप्त होना:
    • यह महिलाओं को उनकी मर्जी के अनुसार बिना मांग के काम करने और कार्य को छोड़ने की अनुमति प्रदान करता है।
  • अतिरिक्त आय अर्जित करने में सहायता:
    • गिग रोज़गार महिलाओं को अतिरिक्त आय अर्जन में मदद करता है, उनके आत्मविश्वास को बढ़ाता है और निर्णय लेने की शक्ति देता है जो महिला सशक्तीकरण के महत्त्वपूर्ण घटक हैं।

 नुकसान:

  • श्रम बाज़ार में पहले से मौजूद समस्याओं को कायम रखता है:
    • गिग इकॉनमी में महिला भागीदारी के लिये प्रवेश संबंधी गंभीर बाधाएँ हैं क्योंकि यह श्रम बाज़ार में पहले से मौजूद समस्याओं जैसे- लिंग के अधर पर वेतन में अंतर, पक्षपाती एल्गोरिदम, लिंग रूढ़िवादिता और डिजिटल विभाजन को कायम रखती है।
    • यह डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र में इन अंतर्निहित संरचनात्मक मुद्दों को पहचानना और उनका समाधान करना आवश्यक बनाता है।
    •  पुरुषों और महिलाओं के बीच डिजिटल विभाजन गिग वर्क में महिलाओं की भागीदारी के लिये एक गंभीर बाधा है। GSMA मोबाइल जेंडर गैप रिपोर्ट 2020 के अनुसार, भारत में केवल 21% महिलाएँ मोबाइल इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं, जो प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था में संलग्न होने के लिये आवश्यक डिजिटल तकनीकों तक असमान पहुँच बनाती हैं।
    • हालाँकि देश में गिग वर्कर्स पर कोई व्यापक डेटाबेस उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह देखा गया है कि प्लेटफॉर्म पर लैंगिक रूढ़ियों के आधार पर व्यावसायिक अलगाव है।
    •  जबकि महिलाएँ ज़्यादातर सौंदर्य और कल्याण सेवाओं के साथ-साथ औपचारिक घरेलू एवं देखभाल के काम में संलग्न होती हैं, पुरुष अधिकतर परिवहन और वितरण का कार्य करते हैं।
  • वैतन में असमानता:
    • गिग इकॉनमी में वेतन में असमानताएँ देखने को मिलती हैं।
    • महामारी पूर्व की रिपोर्टों से पता चलता है कि भारत में पुरुष और महिला  गिग वर्कर्स की आय के बीच 8%-10% का अंतर था।
    • वास्तव में अध्ययनों से पता चलता है कि पूर्व से चली आ रही असमानता के कारण महिलाएँ खुद को क्षमता को कम आँकती हैं और कम वेतन वाली नौकरियों में संलग्न होती हैं, जिससे गिग इकॉनमी में पहले से ही प्रचलित वेतन असमानता और बढ़ जाती है।
  • महिलाओं के खिलाफ पक्षपात:
    • अलग-अलग प्लेटफॉर्म अक्सर महिलाओं के खिलाफ उनके "ऑन-डिमांड" कार्य शेड्यूल और प्रोत्साहन तंत्र के कारण पक्षपाती होते हैं।
    • घरेलू और चाइल्ड कैयर ज़िम्मेदारियों में व्यस्तता अक्सर महिलाओं को पीक आवर्स का लाभ उठाने की अनुमति नहीं देती है, जिसमें मांग और मज़दूरी दोनों अधिक होती हैं।
    • इसके अलावा वैतनिक और अवैतनिक कार्य मिलाकर उनके दैनिक कार्य के घंटे पुरुषों की तुलना में इतने अधिक होते हैं कि उनके पास समय की कमी होती है। 

गिग इकॉनमी के लिये लेबर कोड क्या है?

  •  मौजूदा विधान:
    • मज़दूरी पर संहिता, 2019 गिग श्रमिकों सहित संगठित और असंगठित क्षेत्रों में सार्वभौमिक न्यूनतम मज़दूरी व न्यूनतम मज़दूरी का प्रावधान करती है।
  • सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 गिग श्रमिकों को एक नई व्यावसायिक श्रेणी के रूप में मान्यता देती है।
  • यह गिग वर्कर को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित करती है जो पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंधों के बाहर काम करता है या कार्य व्यवस्था में भाग लेता है और ऐसी गतिविधियों से आय अर्जित करता है।

सुरक्षा संहिता में संबद्ध मुद्दे:

  • लाभ की कोई गारंटी नहीं: सामाजिक सुरक्षा विधेयक, 2020 संहिता में प्लेटफॉर्म कार्यकर्ता अब मातृत्व लाभ, जीवन और विकलांगता कवर, वृद्धावस्था सुरक्षा, भविष्य निधि आदि जैसे लाभों के लिये पात्र हैं।
    • हालाँकि पात्रता का मतलब यह नहीं है कि लाभ की गारंटी है।
    • कोई भी प्रावधान सुरक्षित लाभ नहीं देता है, जिसका अर्थ है कि केंद्र सरकार समय-समय पर कल्याणकारी योजनाएं बना सकती है जो व्यक्तिगत और कार्य सुरक्षा के इन पहलुओं को कवर करती हैं, लेकिन उनकी गारंटी नहीं है।
  • कोई निश्चित ज़िम्मेदारी नहीं: कोड केंद्र सरकार, प्लेटफॉर्म एग्रीगेटर्स और श्रमिकों की संयुक्त ज़िम्मेदारी के रूप में बुनियादी कल्याण उपायों के प्रावधान को बताता है।
    • हालाँकि इसमें यह नहीं बताया गया है कि वेलफेयर के लिये कौन सा हितधारक ज़िम्मेदार है।

गिग कार्यकर्ता की स्थिति में सुधार कैसे किया जा सकता है?

  • गिग कार्यकर्ता को सशक्त बनाने की आवश्यकता:
    •  एक अम्ब्रेला यूनियन बनाकर गिग कार्यकर्ता को सशक्त बनाने की आवश्यकता है जो उन्हें सामूहिक सौदेबाज़ी की शक्ति प्रदान करेगी।
    • औपचारिक मान्यता और सूचना की समरूपता उन्हें प्लेटफाॅर्मों के खिलाफ पैर जमाने में मदद करेगी।
  • प्लेटफॉर्म कार्यकर्ता को अनिवार्य कवरेज देने की ज़रूरत:
    • जबकि श्रम संहिता में गिग श्रमिकों को मान्यता प्रदान करने से सकारात्मक स्तर पर आशा बँध रही है, उनकी सामाजिक सुरक्षा की शर्तें बिना किसी नियामक प्राधिकरण के निर्धारित नहीं हैं।
    • इस प्रकार प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना जैसी केंद्र प्रायोजित योजनाओं के तहत प्लेटफॉर्म श्रमिकों को अनिवार्य कवरेज प्रदान करने की आवश्यकता है।
    • इसे एग्रीगेटर्स के माध्यम से सुगम बनाया जा सकता है ताकि महिला गिग वर्कर्स की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके, जो प्लेटफॉर्म इकॉनमी में अधिक कमज़ोर होती हैं।
  • सही भौतिक और सामाजिक बुनियादी ढाँचे के निर्माण की आवश्यकता:
    • सही भौतिक और सामाजिक बुनियादी ढाँचे के निर्माण की आवश्यकता है जो गिग वर्क में महिलाओं की भागीदारी का समर्थन करेगा।
    • उन सामाजिक मानदंडों को बढ़ावा देना जो पुरुषों को समान रूप से अवैतनिक देखभाल और घरेलू काम करने के लिये प्रोत्साहित करते हैं तथा सार्वजनिक देखभाल के बुनियादी ढाँचे को विकसित करने से महिलाओं के आंदोलन को गिग वर्क में सुविधा होगी।
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